रंजीत की कहानी समाप्त होते ही अलाव की धीमी चटक सबसे तेज़ आवाज़ बन गई। कोई कुछ नहीं बोला। सबके चेहरों पर वही थरथराती नारंगी रोशनी, वही सिहरन, वही बेचैनी। जंगल की ठंडी हवा अब पहले से ज़्यादा भारी लग रही थी।
रंजीत धीरे-धीरे अपनी कॉफ़ी सिप कर रहा था, जैसे उसका हर घूँट पिछले किसी दर्द को पीछे छोड़ रहा हो।
जुही ने आख़िर चुप्पी तोड़ी। “रंजीत… तुम हम सबको उल्लू तो नहीं बना रहे हो न? ज़ॉम्बी, सीरियसली? मुझे तो लगा ज़ॉम्बी सिर्फ़ फ़िल्मों में होते हैं।”
रंजीत ने हल्की मुस्कुराहट दी। “ज़ॉम्बी तो बस एक नाम है। असलियत कहीं गहरी है। ऐसी चीज़ें… ऐसे जीव… हमेशा से रहे हैं। अलग-अलग संस्कृतियों में अलग नामों से—यहाँ हमारे देश में ही कहीं प्रेत, कहीं पिशाच, कहीं राक्षस कहा जाता है। इतनी लोककथाएँ और इतनी फ़िल्में यूँ ही नहीं बनीं। कुछ न कुछ सच्चाई तो ज़रूर रही होगी।”
विक्रम ने भौंह उठाई। “तुमने कभी डिपार्टमेंट में पूछा? वहाँ उस गाँव में आख़िर हुआ क्या था?”
रंजीत ने थोड़ी देर आग में देखते हुए कहा, “पूछा। पर चुप करा दिया गया। बड़े अफ़सरों ने कहा—शांत रहो, मीडिया से दूर रहो। एक साल बाद मुझे सीक्रेट ब्यूरो से हटाकर वन विभाग में डाल दिया गया। कुछ ही महीनों बाद मैंने रिटायरमेंट ले ली।”
राधिका ने उठकर अलाव में एक लकड़ी डाली। चिनगारियाँ हवा में उछलीं। “अब ये तो समझ में आ गया कि तुम अब हर जगह बाथरूम क्यों चेक करते हो… आज भी वही बाथरूम वाला आदमी ढूँढ रहे हो न?”
रंजीत ने सिर हिलाया। “नहीं। ये ‘सिचुएशन अवेयरनेस’ है—सीक्रेट सर्विस की ट्रेनिंग। लेकिन हाँ… उस दिन अगर मैंने अपने बेटे की बात पर विश्वास किया होता … और बाथरूम में झाँक लिया होता… तो शायद मेरी बीवी और बच्चों को उस नर्क से न गुज़रना पड़ता।”
सब फिर चुप।
बस हवा की सांय-सांय थी, और अलाव के लाल अंगारों की मंद साँसें।
कुछ पल बाद समीर ने अपना फ़ोन स्क्रॉल करते हुए कहा, “बाइ द वे… ये जमालीपुरा गाँव यहीं पहाड़ों में आसपास कहीं है न? मैप्स में तो पास ही दिखा रहा है।”
रंजीत ने ठंडी साँस ली। “यहाँ से कोई पचास-साठ कोस दूर होगा। गाँव क्या—खंडहर रह गया है। केमिकल लीक का बहाना देकर गाँव खाली कराया गया। अख़बारों में अगले दिन छोटी-सी ख़बर छपी थी। सुबह चाय की चुस्की लेते हुए इंसान इससे ज़्यादा नहीं सोचता।”
रोहन बोला, “ऐसे ही बस बात दब गई? वाह।”
रंजीत ने कंधे उचकाए। “एक रिपोर्टर ने कुछ छानबीन की थी, पर बाद में वो भी बंद हो गई।”
जुही ने अपनी जैकेट कस ली, जैसे अचानक उसे ठंड ज़्यादा लगने लगी हो। “पचास-साठ कोस कोई ज़्यादा दूर नहीं होता… अगर जमालीपुरा से कोई ज़ॉम्बी यहाँ तक आ पहुँचा तो?”
सब ठहाका मारकर हँस पड़े। उस हँसी में डर को ढँकने की कोशिश भी थी।
रोहन बोला, “तुमने यहाँ के रिसॉर्ट के बाथरूम तो चेक कर लिए न, रंजीत भाई?”
सब फिर हँस पड़े। माहौल हल्का हो गया—कम से कम ऊपर से।
लेकिन उसी समय, उनके पीछे घने झाड़ियों में—
एक हल्की-सी आहट हुई।
बहुत हल्की।
जैसे कोई पैर पत्तों पर धीरे से रखा गया हो।
जैसे किसी साँस ने हवा को काटा हो।
हँसी बीच में ही ठहर गई। सब एक-दूसरे को देखने लगे।
रंजीत ने कॉफ़ी का मग धीरे से ज़मीन पर रखा—और उसकी उँगलियाँ अनायास अपने कोट के भीतर हथियार की तरफ़ बढ़ीं।
झाड़ियों की आहट दो सेकंड रुकी।
फिर—टक… टक… जैसे कोई टहनी दबाकर आगे बढ़ा हो।
रोहन ने काँपती आवाज़ में कहा, “वो… क्या था?”
रंजीत ने कुछ नहीं कहा। बस उठकर आग से दो कदम पीछे हटा—आँखें झाड़ियों पर टिकाए।
हवा फिर चली।
झाड़ियों का सिरा हिला।
अँधेरे में कोई आकार… बहुत क्षीण… जैसे किसी ने सिर उठाया हो।
निशान पूरी तरह दिखा नहीं—पर इतना ज़रूर दिखा कि कोई वहाँ था।
रंजीत ने फुसफुसाया—“सब पीछे हट जाओ।”
और उस पल— कहानी खत्म नहीं हुई थी।
बस… फिर से शुरू हो रही थी।