उजाले की ओर.... संस्मरण
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स्नेहिल सुभोर प्रिय मित्रो
बहुत से दोस्त मुझसे पूछते है:
"आप हर समय हँसती क्यों रहती हैं? "
मुझे उनकी बात पर फिर हँसी आ जाती है.। मुझे मअहसूस होता है कि अगर कोई हँसे तो अधिक अच्छा है बनिस्पत मुँह लटकाने के!बात यह है कि हम चुनाव किसका करते हैं?
जीवन सबको अवसर देता है, हँसने, रोने दोनों के! कई बार बहुत बड़ी बात भी नहीं होती और हम दुखी हो जाते हैं और कई बार खुशी की बात होती है तब भी हम नहीं हँस सकते जाने क्यों? जबकि होना तो यह चाहिए कि परिस्थिति कोई भी क्यों न हो, हम उसे सहज रूप से ले सकें। जब हम हर परिस्थिति में अपनी मानसिक स्थिति को समझौता कर सकने योग्य बना सकें तब हम स्वयं स्थितप्रज्ञ की स्थिति में रह सकेंगे।
जब हम स्कूल जाते हैं, हमारी दुनिया छोटी हो दुनिया छोटी होती है —
हमारी दुनिया में होते हैं कुछ भोले दोस्त, कुछ मासूम बातें, और मन में मासूम प्रश्न!
लेकिन जैसे ही हम बड़े होने लगते हैं, स्कूल से कॉलेज पहुँचते हैं,हमें
नई दुनिया, नए लोग, नए दोस्त घेर लेते हैं, ज़िंदगी में बदलाव आने लगते हैं।
हम बहुतों से मिलते हैं,हमारा सर्किल बहुत बड़ा होता जाता है।
पर हम यह नहीं समझ पाते कि कौन हमारे लिए अच्छा है, और कौन धीरे-धीरे हमें गलत दिशा में ले जा रहा है।
एक गलत दोस्त, एक गलत सलाह,
हमारे विवेक पर परछाई डाल सकती है, और हमें रास्ते से भटका सकती है।
ऐसी ही गलती की थी — महारानी कैकेयी ने।
वह तो बुद्धिमान, वीरांगना और प्रेममयी रानी थीं।उन्होंने युद्धभूमि में राजा दशरथ का जीवन बचाया था।
वह श्रीराम से अत्यंत स्नेह करती थीं,
और पूरी अयोध्या उनका आदर करती थी।पर उनकी एक भूल हो गई —
उन्होंने मंथरा जैसी स्त्री को अपने मन में जगह दे दी।
मंथरा ने मीठे शब्दों में उनके मन में ज़हर भरा —
"अगर राम राजा बने तो भरत दास बन जाएगा।”
बस, इस एक वाक्य ने इतिहास बदल दिया।
कैकेयी जो राम के बिना कभी नहीं रह सकती थीं, वही राम को वनवास भेजने की माँग करने लगीं। अयोध्या का उजाला जैसे सूर्यग्रहण से ढक गया —
राजा दशरथ की मृत्यु हो गई,
और सबसे बड़ा, प्यारा परिवार बन गया शोक का परिवार!
सीख:
हम सबके जीवन में हर किसी के पास एक मंथरा होती है —
जो सलाह के रूप में आती है, जो मीठा बोलती है लेकिन धीरे-धीरे हमारे राम को वनवास भेज देती है।
इसलिए अपनेज़रूरी है कि हम अपने मन को मंदिर की तरह पवित्र बनाकर रखें।
हर दोस्त को दिल में जगह देने से पहले परखें।
गलत संगत, सही इंसान को भी गलत बना देती है।
सावधान रहें — अपनी ज़िंदगी की मंथरा को पहचानने से पहले, हम उसे पहचान लें।
हम सबका हर दिन सपरिवार, सरल, सुंदर, मंगलमय, विवेकशील, सार्थक रहे। तथास्तु!
मंगलकामनाओं सहित
आप सबकी मित्र
डॉ. प्रणव भारती