Bramhdaitya - 5 in Hindi Horror Stories by mayur pokale books and stories PDF | ब्रम्हदैत्य - 5

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ब्रम्हदैत्य - 5

भाग  5– हमला

शाम के लगभग पाँच बज चुके थे। आसमान पर सूरज ढलने लगा था और हलकी नारंगी रोशनी सड़क पर बिखर गई थी। रिया, उसकी माँ सुनीता, भाई आयुष और राहुल अब कार में बैठ चुके थे। रामपुर गाँव दिल्ली से क़रीब 100 किलोमीटर दूर था। समय कम था, और रात होने से पहले उन्हें वहाँ पहुँचना ज़रूरी था।

राहुल कार ड्राइव कर रहा था। वह ज़्यादा बातूनी नहीं था, मगर चुप रहना भी उसे पसंद नहीं था। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने एक नज़र रिया की तरफ डाली और पूछा, “रिया, अब तक तुमने बताया ही नहीं — हम तुम्हारे गाँव क्यों जा रहे हैं? और तुम्हारी मॉम इतनी परेशान क्यों हैं?”

रिया ने गहरी साँस ली और कहा, “सच कहूँ तो मुझे भी नहीं पता। मॉम कुछ नहीं बता रहीं। लेकिन याद है, मैंने कहा था कि मैं तुम्हें सबूत दूँगी — उस भूतिया चीज़ का जो मैंने देखा था? तो आज मैं वही दिखाने वाली हूँ।”

राहुल थोड़ा चौंका, “तुम सीरियस थी?”

रिया ने मुस्कुराते हुए अपने पर्स में हाथ डाला और मोबाइल निकाला। “अब देखो,” उसने कहा और मोबाइल की स्क्रीन राहुल की तरफ घुमा दी।

उसने वीडियो प्ले किया। शुरुआत में कमरे का सन्नाटा दिखा। एक सामान्य सा दृश्य — खाली कमरा, हल्का-हल्का झूमता परदा।

राहुल ने भौंहें चढ़ाईं और कहा, “व्हाट इज़ दिस, रिया? मज़ाक कर रही हो क्या? यह तो तुम्हारे घर का ही साइलेंट वीडियो लग रहा है!”

रिया ने कुछ नहीं कहा, बस उसे स्क्रीन की तरफ इशारा किया।

तभी अचानक दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा। खटखट-धड़ाम की आवाजें आने लगीं। वीडियो में कुछ ऐसा था जिसने राहुल को चुप कर दिया। उसने आँखें चौड़ी कीं और स्क्रीन की ओर झुक गया।

पीछे की सीट पर बैठे आयुष और सुनीता भी उत्सुकता से आगे की ओर झुके।

अब वीडियो में दरवाज़ा जैसे किसी बहुत भारी ताकत से हिल रहा था। कुछ पल बाद दरवाज़ा चरमराता हुआ खुला — और वहाँ एक आकृति खड़ी थी।

लगभग 6-7 फुट लंबा, डरावना कद-काठी, पूरे शरीर पर लंबे उलझे हुए बाल, पैने नुकीले नाखून और गहरे काले पैर जो ज़मीन को जैसे दबा रहे हों।

वो आकृति कमरे में अंदर आई और कुछ देर तक स्थिर खड़ी रही। फिर उसने इधर-उधर देखा, मानो किसी चीज़ को सूंघ रही हो।

जब वह आकृति मुड़ी, तो उसका चेहरा साफ दिखाई दिया — आधा चेहरा बुरी तरह सड़ा हुआ, आँख एकदम लाल और बाहर निकली हुई, जैसे किसी मृत प्राणी का चेहरा हो जो अधूरा सड़ चुका हो।

सभी की साँसें थम गईं। रिया ने बिना कुछ कहे मोबाइल नीचे कर लिया। गाड़ी में अब सन्नाटा था। हवा भी जैसे थम गई हो।

राहुल ने कुछ पल बाद धीरे से कहा, “ये... ये क्या था?”

रिया ने फुसफुसाते हुए कहा, “मैंने तुमसे कहा था, वो चीज़ सच में थी।”

राहुल ने फिर से पूछा, “इस चीज़ का नाम है क्या? कोई पहचाना है इसे?”

पीछे से एक गंभीर आवाज़ आई — “ब्रह्मदैत्य।”

राहुल और रिया दोनों ने पलटकर देखा। सुनीता, रिया की माँ, ने यह कहा था। उनका चेहरा गंभीर था, आँखों में चिंता की गहराई साफ दिख रही थी।

“ब्रह्मदैत्य?” राहुल ने दोहराया, “नाम जितना भारी, उतना ही डरावना भी है।”

रिया ने माँ की तरफ देखा, “मॉम, आपको इसका नाम कैसे पता?”

आयुष बीच में बोल पड़ा, “मैंने यूट्यूब पे देखा है इसके बारे में! एकदम खतरनाक, और जिनके पीछे लग जाए उनका...”— वह बोलते-बोलते रुक गया।

सुनीता ने उसकी बात बीच में काटते हुए गहरी आवाज में कहा, “वो भूत नहीं है… वो दैत्य है। तुम लोगों ने भूत, आत्माएँ और चुड़ैलें सुनी होंगी। मगर ये अलग हैं। ये कोई इंसान से बनी हुई आत्मा नहीं है। दैत्य एक अलग प्रजाति हैं — जैसे इंसान एक प्रजाति हैं। मगर ये इंसानों से हज़ार गुना ज़्यादा ताक़तवर, क्रूर और निर्दयी होते हैं।”

गाड़ी में कुछ पलों का मौन छा गया। तभी राहुल का मोबाइल बज उठा।


---

इधर रामपुर में:

अजय, चंदू और कब्बू पुरानी संदूक को लेकर एक बड़ी हवेली के सामने आकर रुके। हवेली गाँव के पुराने नेता संजय सिंह — जिन्हें सब 'ताऊजी' कहते थे — की थी।

गाँव का एक नाममात्र सरपंच ज़रूर था, लेकिन असल में जब भी कोई बड़ा फ़ैसला लेना होता, लोग ताऊजी के पास ही आते। गाँव की असली सत्ता वही थे — अनुभवी, ज्ञानी और सम्मानित।

हवेली बड़ी, ऊँचे छज्जों वाली, पुरानी मगर भव्य बनावट की थी। दीवारों पर बेलबूटों की नक्काशी और खिड़कियों पर लोहे की जालियाँ इतिहास का एहसास कराती थीं।

अजय संदूक को सावधानी से पकड़े खड़ा था। तभी एक नौकर बाहर आया और बोला, “ताऊजी ने अंदर बुलाया है।”

तीनों ने सिर हिलाया और हवेली के अंदर चले गए। अंदर एक लंबा-सा हॉल था, जिसमें दीवारों पर पुराने राजाओं की तस्वीरें और तलवारें टंगी थीं।

ताऊजी एक भारी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे थे, आँखों पर चश्मा और हाथ में अख़बार। जब उन्होंने अजय और उसके साथियों को आते देखा, तो मुस्कुरा दिए।

“आ गए तुम लोग। लगता है आख़िरकार वो संदूक मिल ही गया,” ताऊजी बोले।

अजय ने संदूक सामने रखते हुए कहा, “जी ताऊजी। मगर आप बताएँगे इसमें ऐसा क्या है जो आपने हमें इतनी खुदाई करवाने भेजा?”

ताऊजी ने अख़बार मोड़कर मेज़ पर रखा और गहरी आवाज़ में बोले, “ये संदूक सिर्फ लकड़ी और लोहे का नहीं है, बेटा। ये हमारे खानदान की विरासत है। इसमें वो राज़ हैं जिन्हें बरसों से छिपाकर रखा गया है।”

“इसमें क्या है?” अजय ने उत्सुकता से पूछा।

“पहले कोष्ठ में एक किताब है — हमारे पूर्वजों की लिखी हुई। और दूसरे कोष्ठ में… उसके बारे में मुझे पूरी जानकारी नहीं। मगर मेरे पिता कहा करते थे कि उसमें कोई ऐसी चीज़ है, जो बुरी शक्तियों को काबू कर सकती है।”

चंदू और कब्बू एक-दूसरे को देखने लगे। उन्हें ये सब समझ नहीं आ रहा था।

“मगर ये संदूक खुल नहीं रहा,” अजय ने कहा, “इस पर कोई ताला भी नहीं है, फिर भी ढक्कन टस से मस नहीं हो रहा।”

ताऊजी कुछ देर चुप रहे। फिर गहरी साँस लेते हुए बोले, “इसी सवाल का जवाब तो मुझे भी चाहिए… शायद ये संदूक तब तक न खुले जब तक इसकी सच्ची आवश्यकता ना हो। या फिर किसी विशेष मंत्र या यंत्र की ज़रूरत हो।”

अजय ने संदूक को गौर से देखा। उस पर कुछ रहस्यमयी चिन्ह खुदे हुए थे, जैसे किसी प्राचीन भाषा में कुछ लिखा गया हो।

“क्या हम किसी पंडित या तांत्रिक को दिखाएँ?” उसने पूछा।

ताऊजी ने आँखें मिचका कर कहा, “अभी नहीं। सही समय आने दो। ये संदूक तब खुलेगा, जब इसका राज़ बाहर आने को तैयार होगा।”

कमरे में मौन छा गया। हवेली के बाहर अब अंधेरा घिरने लगा था…

।।।।।।जारी…........



Story by ___mayur pokale