Trikaal - 3 in Hindi Adventure Stories by WordsbyJATIN books and stories PDF | त्रिकाल - रहस्य की अंतिम शिला - 3

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त्रिकाल - रहस्य की अंतिम शिला - 3

पूर्व कथा:
आर्यन एक असाधारण लेकिन दिशाहीन युवा है जिसे प्रोफेसर ईशान वर्मा द्वारा चुना गया है एक गुप्त प्रयोग का हिस्सा बनने के लिए। वेदिका, रहस्यमयी और ज्ञान में पारंगत युवती, आर्यन की गाइड बनती है। पहले दो अध्यायों में, आर्यन ने 'ध्वनि ज्योति' नामक मंत्र प्रणाली से परिचय प्राप्त किया और त्रैलोक्य विज्ञान के पहले द्वार की झलक देखी।

कथा प्रारंभ:

आर्यन की आंखें अभी भी बंद थीं, लेकिन उसका मन त्रिकाल के कंपन से भर चुका था। वह अब सिर्फ शरीर नहीं था — वह एक स्पंदन था, एक ऊर्जा जो समय और स्थान की सीमा को छू रही थी।

प्रोफेसर ईशान की आवाज़ धीरे-धीरे गूंजने लगी —
"अब समय है, त्रिलोक सिंक्रोनाइज़र को सक्रिय करने का।"

आर्यन की पलकें खुलीं। उनके सामने एक विशाल गोलाकार कक्ष था — "त्रिकाल यंत्रकक्ष"। यह स्थान कोई साधारण प्रयोगशाला नहीं था। इसकी दीवारों पर प्राचीन लिपियों से ढंके हुए यंत्र लगे थे, जो जीवित प्रतीत हो रहे थे। बीचों-बीच एक त्रिभुजाकार मंच था, जिसके किनारों पर तीन आयामी ऊर्जा-द्वार कंपन कर रहे थे।

वेदिका मंच के एक कोने पर खड़ी थी। उसके हाथों में एक चमकती हुई ताम्र-मुद्रा थी, जिस पर ऋग्वेद के बीजाक्षर खुदे हुए थे।

"यह है त्रिलोक सिंक्रोनाइज़र," वेदिका ने कहा,
"तीनों लोकों—भूत, भविष्य और वर्तमान—को एक क्षण में जोड़ने वाला यंत्र। लेकिन इसे सक्रिय करने के लिए तीन तत्वों की अनुकूलता चाहिए — चेतना, स्पंदन और श्रद्धा।"

आर्यन ने धीरे से पूछा, “मेरी भूमिका क्या है इसमें?”

प्रोफेसर ईशान आगे आए।
"तुम वही हो जिसे 'त्रय-संयोजक' कहा गया है वेदों में — एक ऐसा मनुष्य जो तीनों तत्वों को संतुलित कर सके। न तो पूरी तरह वैज्ञानिक, न पूरी तरह आस्तिक — परंतु दोनों का संगम।”

आर्यन को अपनी उंगलियों में जलन महसूस हुई। अचानक उसकी हथेली से नीली रोशनी निकली, मानो भीतर की ऊर्जा किसी पहचान की प्रतीक्षा में हो।

वेदिका ने तीनों द्वारों की ओर इशारा किया।
**"प्रत्येक द्वार एक लोक है —

पहला द्वार: भूतकाल की स्मृति,

दूसरा: वर्तमान की चेतना,

तीसरा: भविष्य की संभावना।
इन तीनों को एक क्षण में सिंक्रनाइज़ करने से ही ‘त्रिलोक विन्यास’ संभव है।”**

आर्यन मंच पर चढ़ा।
वह मध्य बिंदु पर खड़ा हुआ।
त्रिलोक-सिंक्रोनाइज़र के ऊपर नीले-स्वर्णिम धागों की जाली बनने लगी। एक कंपन उसके कानों में गूंजने लगा:

"ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्…"

यह मंत्र सिर्फ शब्द नहीं थे — ये ऊर्जा की कुंजी थे।

प्रोफेसर ईशान ने तीसरी मुद्रा उठाई और बोले:
“आर्यन, अपना चित्त स्थिर करो। केवल वही देखो, जो भीतर छिपा है। बाहर कुछ नहीं मिलेगा।”

आर्यन ने आंखें बंद कीं, और एक गहरी सांस ली।

(अब आरंभ होता है आर्यन का त्रिलोकिक अनुभव)

पहला द्वार खुला — भूतकाल।
वह अपने बचपन के दृश्य में प्रवेश करता है। माँ की आवाज़, पिता की डांट, और वो क्षण जब उसने पहली बार तारे गिनने की कोशिश की थी।
एक टूटी साइकल की घंटी की आवाज़ उसके कानों में गूंजी — और वो दृश्य विलीन हो गया।

दूसरा द्वार खुला — वर्तमान।
वह खुद को प्रयोगशाला में देखता है — पर अलग दृष्टिकोण से, मानो आत्मा शरीर से बाहर होकर सब कुछ देख रही हो। प्रोफेसर ईशान की आँखों में चिंता थी, वेदिका के चेहरे पर आशंका।
वह समझ गया — अब निर्णय उसी का है।

तीसरा द्वार खुला — भविष्य।
यहां सब कुछ धुंधला था, पर एक छवि स्पष्ट थी — एक मंदिर के भग्नावशेषों में खड़ा आर्यन, उसके चारों ओर अग्नि और युद्ध। पर उसके हाथ में वही ताम्र मुद्रा थी जो अभी वेदिका के पास थी।

एक तेज़ कंपन हुआ —
त्रिलोक सिंक्रोनाइज़र सक्रिय हो गया।

[कक्ष में रोशनी बिखर गई। तीनों द्वार बंद हो गए।]

आर्यन ज़मीन पर गिरा पड़ा था, लेकिन उसकी सांस स्थिर थी।

प्रोफेसर ईशान ने धीमे स्वर में कहा:
"सिंक्रोनाइज़ेशन सफल रहा… अब आरंभ होगा अगला चरण — 'मानस यात्रा'।"

वेदिका ने आर्यन का सिर अपनी गोद में रखा और आंखें बंद कीं।

"अब यात्रा भीतर से बाहर होगी… और बाहर से परे।”

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हमारा उद्देश्य है—भारतीय वेद, विज्ञान और कल्पना को एक नई कहानी में पिरोना।

पढ़ते रहिए — क्योंकि रहस्य अभी बाकी है...
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