Freelancer in Hindi Short Stories by JITENDRIYA books and stories PDF | कामचोर

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कामचोर

      फांसी की सजा से भी भयभीत कर देने वाली सजा लग रही थी - चलो सब बच्चे अपना होमवर्क चेक करवा लो। मिश्रा सर की आवाज कान में पड़ते ही कक्षा छठवीं की छात्रा सुनैना का दिल धाड़ धाड़ बजने लगा।अपनी लाइन में सबसे पीछे बैठी छोटी सुनैना होमवर्क कॉपी खोजने का नाटक कर रही थी। सब बच्चे अपनी होमवर्क की कॉपी लेकर मिश्रा सर की ओर बढ़ रहे थे और मासूम   छोटी सुनैना की  होमवर्क कॉपी मिल ही नहीं रही थी या यूँ कहिए कि वह उसे पाना ही नहीं चाहती थी। होमवर्क पूरा जो  नहीं था। पूरा क्या शुरू ही नहीं हुआ था। मिश्रा सर जो सुनायेंगे सो अलग मगर उसकी सहपाठी मीरा उसे हाथों में बेइज्जती की फूल माला लिये हुए खड़ी नजर आ रही थी। बच्चे होमवर्क चेक करवा रहे थे और सुनैना सिर झुकाए बैठी अपने बस्ते पर तरल मोतियों की बरसात कर रही थी।   

  तो बच्चों सबने होमवर्क चेक करवा लिया? चलो अब हम पढ़ते हैं अगला पाठ...  मिश्रा सर की आवाज सुनैना के कानों में सुनाई पड़ी। सुनैना की जान में जान आई। वह मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा करने लगी।

" सर! सुनैना ने अपना होमवर्क चेक नहीं करवाया है "मीरा की आवाज सुनैना के कान में पड़ी और उसका दिल फिर से धाड़ धाड़ बजने लगा।   

   सुनैना! खड़ी हो जाओ क्यों नहीं चेक करवाया तुमने होमवर्क? मिश्रा सर बोल रहे थे-कंप्लीट नहीं किया क्या?

सर झुका कर खड़ी सुनैना खुद को कटघरे में महसूस कर रही थी। उसके मुंह से कोई आवाज ही नहीं निकल पा रही थी गला रूँध सा गया था।  

मिश्रा सर-क्या हुआ कुछ बोलती क्यों नहीं?  

मीरा- क्या बोलेगी सर? यह स्कूल पढ़ने थोड़ी आती है, ये तो बस खाना खाने के लिए आती है। कामचोर कहीं की।सब बच्चे हंसने लगे। और सुनैना की अश्रुधारा तेज हो चली।

"नहीं बच्चों ऐसा नहीं बोलते" तब तक मिश्रा सर सुनैना के नजदीक पहुंच चुके थे। कुछ तो मजबूरी रही होगी सुनैना की, जो होमवर्क नहीं कर पाई है। हमें उसकी मजबूरी को समझना चाहिए और उसकी सहायता करनी चाहिए हमें कभी भी किसी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।बोलो बेटा क्यों नहीं कर पाई होमवर्क?

थरथराती आवाज में सुनैना बोली- समय नहीं मिल पाया सर।

क्यों बेटा क्या काम कर रही थी? कि तुम्हें समय नही मिल पाया- मिश्रा सर  

'खाना बना रही थी सर' थोड़ा गला खुला था सुनैना का मिश्रा सर के अच्छे बर्ताव के कारण।

क्यों बेटा घर में मम्मी खाना नहीं बनाती-मिश्रा सर 

'नहीं हैं सर।' फिर रूँध गया सुनैना का गला। 

     कोई बात नहीं बेटा समय निकाल कर अपना होमवर्क कर लेना। मिश्रा सर ने घाव को ज्यादा कुरेदना  उचित नहीं समझा।    

  मिश्रा सर सात वर्ष शहरी क्षेत्र में अध्यापन कार्य करने के पश्चात ग्रामीण क्षेत्र में पिछले दो वर्ष से कार्यरत थे और उन्होंने अपने जीवन काल में कभी भी ऐसी परिस्थिति नहीं देखी  थी कि किसी छठवीं क्लास में पढ़ने वाली बच्ची को घर का खाना बनाना पड़ता हो।     मिश्रा सर ने स्कूल के रसोईये से पता किया कि सुनैना के माता-पिता  एक वर्ष पहले ही एक वाहन दुर्घटना के शिकार हो गए थे।और अपने पीछे छोड़ गए थे 11 साल की सुनैना 7 साल की नेहा 4 साल के दीपक और एक बूढी मां को जो बिना डंडे के सहारे चल भी नहीं सकती थी। इन सब की जिम्मेदारी उठा रही थी बेचारी अकेली सुनैना।    रोज सुबह उठती दादी मां के लिए पानी गर्म करती दोनों बच्चों को ब्रश करवा कर नहलाती।और फिर दादी और दीपक के लिए चावल पकाती, दोनों को खिलाती। नेहा की चोटी बनाती और उसे लेकर स्कूल आ जाती। सुनैना और नेहा का खाना स्कूल में हो जाता था।जैसे ही छुट्टी से घर जाती बर्तन धोती और फिर से लग जाती चावल पकाने में, फिर सबको खिलाती और दोनों बच्चों को सुला कर खुद सो जाती। जिंदगी के इस दौड़ में पढ़ने के लिए उसके पास समय ही नहीं रहता।   

       कैसी हैं माँ जी? मिश्रा सर सुनैना के आंगन में खटिया में साथ बिठा कर उसकी दादी का हाल पूछ रहे थे।    इन तीन बच्चों की चिन्ता में.... मरी जा रही हूँ.... गुरजी-दादी लड़खड़ाती आवाज में अपना दुखड़ा सुना रही थी-मैं हूँ तो... कारड से मुफत में चावल मिल जाता है,.....दो चार सूखी लकड़ी बिन के..... ये लड़की उसे पका कर सबका पेट भर लेती है।....पता नहीं मेरे जाने के बाद ...क्या होगा।     

शुभ-शुभ बोलिये माँजी,आपको अभी कुछ नहीं होगा। जिसका कोई नहीं होता उसका ऊपर वाला होता है-मिश्रा सर हिम्मत दे रहे थे-वो जरूर मदद करेगा।     

"ऊपर वाला..ज्यादा ऊपर रहता है..गुरजी... हमारा दु:ख पड़ोसी को नहीं दिखता....उसे क्या दिखेगा? इन मुओं के घर से ...खाली खुशबू आती है ...अच्छे खाने की...खाना तो खाली... भात ही पड़ता है।" मन की वेदना मुखर हो रही थी।     

कोई बात नहीं माँ जी,भगवान के घर देर है,अंधेर नहीं। इतना कह कर मिश्रा सर ने विदाई ले ली।बच्चे बाहर तक छोड़ने आये थे। सर ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुये सुनैना को सौ रूपये दिये-बेटा आज कोई सब्जी भी बना लेना। सुनैना और नेहा की आँखें चमक उठीं, रूपये लेकर बच्चे अंदर चले गये।  

   दादी बडबड़ा रही थी-.ये मास्टर भी..आया और...भाषण मार गया..दो चार रूपये दे जाता ....तो उसका क्या ....कम हो जाता?       ये देखो दादी ,मिश्रा सर सौ रूपये देकर गये हैं-सुनैना चहकी।       "ए लड़की !... जा  कहीं से ...बड़ा समोसा...ले आ...खायेंगे। "दादी की जीभ की लालच बिखर गयी।        नहीं दादी! परसों रथयात्रा है, उस दिन नेहा के लिये हेयर बैण्ड बाबू के लिये खिलौना और सबके लिये समोसे ले आऊँगी-सुनैना की बात से दादी का मुँह फूल चुका था।   

    बाबू! अगले साल से तू भी स्कूल जाएगा ना, तो तुझे भी वहां भात के साथ दाल और सब्जी भी मिलेगी-नेहा दीपक के साथ खेल रही थी।       

हां... तुम भाई बहन तो ...खा लोगे... और मैं... भूखी मरूंगी ...अगले साल से - बुढ़िया हिना हिना उठी।      

तुम चिंता मत करो दादी ,तुम कौन सा अगले साल तक जिंदा रहोगी जो- नेहा की मासूमियत छलकी नहीं की दादी की ज्वालामुखी धधक उठी- हां ...मैं तो मर जाऊंगी.... तुम ही लोग जिंदा रहोगे... मेरे बेटे बहु को... खाके।      ऐसे नहीं बोलते नेहा- सुनैना ने ज्वालामुखी में पानी डाला। चलो दादी, अंधेरा होने को है आप पहले खा लो। कल सुबह ही मैं आपके लिए होटल से कुछ ले आऊंगी। मेरी प्यारी दादी। इस तरह उस 11 वर्ष की बच्ची ने दादी को मना लिया था।      

आज रथयात्रा का दिन था। गांव में मेले का माहौल था शाम के सवा पाँच बज रहे थे और सुनैना अपने हाथ में  एक प्लास्टिक की हेयर बैंड एक खिलौना कार और अखबार में लिपटे छै: समोसे लेकर खुशी-खुशी अपने घर  लौट रही थी कि तभी उसे रास्ते में मीरा ने रोक लिया।    

   क्या लेकर जा रही है तू कामचोर? सुनैना डरती थी मीरा से , क्योंकि मीरा झगड़ालू थी।गाँव में उसके पापा की इकलौती फैंसी की दुकान थी।इसलिए उसे बाकी बच्चों की अपेक्षा घर से ज्यादा ही पैसे मिलते थे।   ये गंदी सी हेयर बैण्ड कितने की ली तूने? मीरा हेयर बैण्ड छीनते हुये बोली।  ब..बीस रूपये की। सुनैना ने घबराते हुये कहा।"छी..इतनी गंदी हेयर बैण्ड बीस रूपये में,हमारी दुकान में तो इससे अच्छी मिल जाती तुझे।ये तो कमजोर भी है थोड़ा सा मोड़ दूँगी तो टूट जायेगी। ये देख" कहते हुये मीरा ने हेयर बैण्ड को तोड़ दिया।    सुनैना रो पड़ी,मेरे पास और पैसे नहीं हैं अब मैं नेहा के लिए नई हेयर बैंड कहाँ से लाऊंगी।    चुप कर कामचोर ,ये ले अपनी हेयर बैंड ,कामचोर की कमजोर  हेयर बैंड कहते हुए  मीरा अपने रास्ते निकल ली।   

    स्थिति तो सुनैना की बदल गई थी। पांच मिनट पहले चहकती सुनैना अभी चिंता में डूबी हुई थी।नेहा से बोल के आयी थी कि तेरे लिए हेयर बैंड ले कर आउंगी।अब करे तो क्या करे।चालीस रुपये के समोसे चालीस रुपये की कार और बीस रुपये की हेयर बैंड में सारे पैसे खर्च हो चुके थे।    बुझे मन से उसके कदम घर की ओर बढ़ रहे थे,तभी उसने एक फैसला लिया और पलट कर होटल की ओर बढ़ चली जहां से उसने समोसे खरीदे थे।सोच लिया था तीन समोसे वापस कर दूंगी तो बीस रुपये वापस मिल जाएंगे,उसी से एक नई हेयर बैंड ले लूँगी।बचे तीन समोसे तीनों में बाँट दूँगी और बोल दूँगी मैं तो खा कर आ गई हूँ।  

   कुछ ही दूर आगे बढ़ी थी कि सुनैना को पानी के जोर से हिलने की आवाज सुनाई दी। उसने ध्यान लगाकर सुना तो पास ही एक कुआं था और आवाज उस कुँए में से आ रही थी ।सुनैना दौड़ते हुए कुएं के पास गई उसने झांक कर देखा तो कोई लड़की कुँए में डूब रही थी। उसका सिर कभी पानी के ऊपर तो कभी अंदर हो रहा था। खुद को बचाने के लिए वह जोर से हाथ पैर मार रही थी।

   हे भगवान! इसे कैसे बचाऊं?यह सोचकर सुनैना ने नजर दौड़ाई तो पास ही कुँए की जगत के एंगल में बंधी रस्सी दिखाई दी जिसके दूसरे छोर में एक प्लास्टिक की बाल्टी बंधी हुई थी। सुनैना ने आव देखा न ताव बाल्टी कुएं में फेंक दी।इस तरह बाल्टी के साथ रस्सी भी उस लड़की तक पहुंच चुकी थी और लड़की ने अपने दोनों हाथों से रस्सी को पकड़ लिया। अब सुनैना उसे खींचकर बाहर लाने का प्रयास कर रही थी लेकिन वजन ज्यादा होने कारण वह उसे खींच नहीं पा रही थी।    

तभी उसे रोड में साइकिल से जाते हुए मिश्रा सर दिखाई दिए। सुनैना जोर से पुकारी- मिश्रा सर जल्दी आइये यहाँ कुएं में कोई डूब रहा है। मिश्रा सर तुरंत कुएं के पास पहुंचे और रस्सी पड़कर लड़की को बाहर खींच लिया। लड़की कोई और नहीं मीरा ही थी। मीरा बहुत घबराई हुई थी।उसकी आंखें फटी हुई थीं। वह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।

मिश्रा सर बोले- बेटा सुनैना! मीरा तो सदमे में है मैं इसे साइकिल में उसके घर छोड़ दूंगा तुम पैदल ही चली जाना।ठीक है सर - सुनैना बोली और मिश्रा सर मीरा को साइकिल में बिठाकर उसके घर की ओर निकल गए।  

   सुनैना के हाथ खाली थे और नजरें कार और समोसों को ढूंढ रही थीं।अचानक नजरों ने मंजिल पा ली ,पास ही चार बंदर समोसों की पार्टी कर रहे थे और उनके पास कार के कुछ टुकड़े बिखरे पड़े थे।अब ना सुनैना के हाथ में कोई सामान था और ना ही दिमाग में कोई युक्ति।वह भारी कदमों से घर की ओर चल पड़ी थी।   

अंधेरा होने को था दीपक भूख से रो रहा था और नेहा उसे चुप करा रही थी- चुप हो जा बाबू ,दीदी समोसे लेकर आ रही होगी। हम सब समोसे खाएंगे फिर तू चलाना अपनी कार और मैं लगाउंगी हेयर बैंड।     दादी बड़बड़ा रही थी-...ये लड़की भी ...जल्दी नहीं आ सकती....कितने महीनों बाद ....भात के अलावा कुछ...खाने को मिलेगा.... वो भी लगता है....मेरी लाश को ...खिलायेगी।    

   सुनैना आंगन में पहुंच चुकी थी । दोनो बच्चे उचक उचक के उसके पास पहुँच गए थे। दीदी लाओ न समोसे,बाबू बहुत भूखा है और मैं भी।हेयर बैंड और कार भी तो दो- नेहा सुनैना के चारों ओर घूम गई लेकिन दीदी की आंखों में आंसू के सिवा उसे कुछ न मिला।      

"क्या हुआ दीदी? तुम रो क्यों रही हो? समोसे नही मिले क्या? तो कोई बात नहीं भात ही बना दो वैसे भी हमें एकदम ज्यादा भूख नहीं लगी है। कार और हेयर बैंड भी उतने जरूरी नहीं हैं।"7 वर्ष की नेहा ने अंदाजा लगा लिया था। मगर 70 वर्ष की दादी को कौन समझाए। 

   दादी को तो शायद पहले से ही पता था कि ये लड़की कुछ भी लेकर नहीं आयेगी। वो तो बच्चों की ओर पीठ करके आँगन में ही खटिये में लेटी रही। सुनैना इंतजार कर रही थी कि कब दादी उसे खरी खोटी सुनाना चालू करेगी मगर दादी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं। सुनैना के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसे पता था प्रतिक्रिया जितनी देर में आयेगी उतनी ही दुःखदायी होगी। 

    तभी सुनैना के कानों में मोटर सायकल की आवाज पड़ी। उसने पलट कर देखा उसके घर के सामने मीरा के पिता गोविंद अपनी मोटर सायकल से मीरा एवं मिश्रा सर के साथ उतर चुके थे । मिश्रा सर के हाथों में एक बड़ी सी झिल्ली थी शायद उसमें कुछ खाने के सामान थे।

गोविंद दौड़ कर आये और सुनैना को अपने सीने से लगा लिया। सुनैना चौंक सी गयी उसे एहसास हुआ गोविंद जी रो रहे थे। उनके आँसू सुनैना के कंधे में महसूस हो रहे थे।    

   गोविंद जी थोड़ा पीछे हुए और सुनैना के चेहरे को अपने हाथों में भर लिया... "तुम तो देवी का रूप हो बेटी आज तुम नहीं होती तो मेरी तो दुनिया ही उजड़ जाती । मीरा के अलावा मेरा इस दुनिया में था ही कौन? मगर अब मेरी एक नहीं दो बेटियां और एक बेटा भी है। और हाँ एक माँ भी तो हैं।"

गोविंद जी सुनैना का हाथ थामे दादी के खटिये के पास पहुंचे।"माँ जी आपको पता है आज सुनैना ने मीरा की जान बचा ली, उस मीरा की जो उसे हमेशा परेशान ही करती थी। आज मीरा को पश्चाताप हुआ माँ जी और उसने मुझे सब बताया। चलिये मांजी चलिये अब से आप सब मेरे साथ ही रहेंगे, मिश्रा सर से आप सब के बारे में जानने के बाद मैं अपने आप को रोक नहीं पाया आप सबकी जिम्मेदारी अब मेरी होगी।"    

   मगर दादी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं। " माँ जी " गोविंद जी ने दादी के कंधे को थपथपाया।मगर कोई प्रतिक्रिया नहीं।गोविंद जी ने दादी को पलटाया, दादी बेसुध थी। मिश्रा सर ने  उँगलियाँ दादी के नाक के पास लगाकर देखीं। और गोविंद जी की ओर देखते हुये ना में सिर हिला दिया।

गोविंद जी ने तीनों बच्चों को अपने सीने से चिपका लिया और रोने लगे ।आज एक ही समय में दो स्थितियाँ निर्मित हुई थीं एक तरफ जहाँ बच्चों के सर से दादी का साया उठ गया वहीं दूसरी तरफ बच्चों को एक पिता के साये ने ढँक लिया था। वक्त ठहर सा गया था, इस ठहरे हुये वक्त में सुनैना के आँसू सूख चुके थे,नेहा व दीपक वर्तमान एवं भविष्य से अनजान थे। मिश्रा सर बच्चों के सर पर हाथ फेर रहे थे।उनकी आँखों में आँसू थे, मगर उन आँसुओं का रंग कुछ अलग था, शायद  दुःख मिश्रित खुशी के आँसुओं का रंग ऐसा होता होगा।                   

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