बारिश की हल्की बूंदें सड़क पर गिर रही थीं। हवा में मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू थी। आकाश अपनी आदत के मुताबिक किताबों की दुकान में दाखिल हुआ और दर्शन तथा इतिहास की किताबें टटोलने लगा। उसे किताबों की दुनिया में खो जाना पसंद था, क्योंकि यहाँ उसे कोई समझाने या साबित करने की जरूरत नहीं होती थी। दूसरी तरफ, सृष्टि भी वहाँ आई थी। उसे कविताएँ और प्रेम कहानियाँ बेहद पसंद थीं। उसकी नजर एक किताब पर पड़ी—गुलजार की नज़्में। उसने धीरे से किताब उठाई, लेकिन तभी दूसरी तरफ से एक और हाथ उसकी ओर बढ़ा।
"ओह, सॉरी!" आकाश ने घबराते हुए हाथ पीछे खींच लिया।
सृष्टि ने भी एकदम से हाथ हटा लिया और हल्की हंसी दबाते हुए बोली, "नहीं-नहीं, आप लीजिए।"
आकाश थोड़ा झेंप गया। उसने किताब की तरफ देखा, फिर सृष्टि की तरफ, और बोला, "अ-आपको गुलजार पसंद हैं?"
सृष्टि ने सिर हिलाया, "बहुत... उनकी लिखी हर बात में जैसे कोई अनकही कहानी छुपी होती है।"
आकाश हल्की मुस्कान के साथ बोला, "हाँ... लेकिन... मुझे दर्शन ज्यादा पसंद है। बस यूँ ही किताब देख रहा था।"
सृष्टि ने आँखें संकरी कीं, जैसे कुछ सोच रही हो, फिर हल्के मज़ाकिया लहजे में बोली, "ओह, तो आप उन लोगों में से हैं जो तर्क को भावनाओं से ऊपर रखते हैं?"
आकाश ने तुरंत सिर हिलाया, "नहीं-नहीं! म-मतलब, मैं तर्क और भावनाओं दोनों को समझने की कोशिश करता हूँ।"
सृष्टि हल्का मुस्कुराई, उसकी आँखों में एक चमक थी।
"अच्छा, फिर एक डील करते हैं। आप ये किताब लीजिए, लेकिन मुझे वादा करना होगा कि इसे ध्यान से पढ़ेंगे और मुझे बताएंगे कि आपको कैसा लगा।"
आकाश थोड़ा असहज हो गया। वादे उसे हमेशा गंभीर लगते थे। लेकिन सृष्टि की आँखों में जो उम्मीद थी, उसे तोड़ने की हिम्मत उसमें नहीं थी। उसने हल्के से सिर हिलाया, "ठीक है... मैं पढ़ूँगा।"
मोहब्बत की चुपचाप दस्तक
इसके बाद किताबों की दुकान उनकी मुलाकातों की जगह बन गई। कभी-कभी वे एक ही किताब पर चर्चा करते, कभी-कभी अपनी-अपनी पसंद की किताबें एक-दूसरे को पढ़ने के लिए देते।
लेकिन उनके बीच एक अजीब-सी झिझक बनी रहती। वे दोनों एक्सट्रोवर्ट थे, दुनिया के सामने बेझिझक बोलने वाले, लेकिन जब वे आपस में बात करते, तो शब्द संभाल-संभाल कर कहते। कभी एक-दूसरे की आँखों में झाँकने से बचते, कभी मुस्कुराकर बात टाल देते।
एक दिन, वे दोनों एक कॉफी शॉप में बैठे थे। बारिश हो रही थी। सृष्टि ने धीरे से कहा, "आकाश, क्या तुम्हें कभी किसी से... मतलब, कभी प्यार हुआ है?"
आकाश चौंक गया। उसके हाथ में पकड़ी कॉफी का कप थोड़ा हिला। उसने जल्दी से नज़रें झुका लीं और होंठ सिकोड़े, "म-मतलब... प-प्यार?"
सृष्टि उसकी झिझक देखकर हल्का हंसी, लेकिन तुरंत खुद को संभाल लिया।
"हाँ, मतलब... कभी ऐसा महसूस किया कि कोई तुम्हारे बिना अधूरा-सा लगे?"
आकाश कुछ देर चुप रहा। उसकी उंगलियाँ कॉफी कप के किनारे पर चल रही थीं। फिर उसने धीमे से कहा, "शायद... मैं खुद नहीं जानता कि प्यार क्या होता है।"
सृष्टि ने हल्के से सिर हिलाया, जैसे उसकी बात समझ रही हो। फिर धीरे से मुस्कुरा कर बोली, "प्यार वही होता है, जो हम महसूस कर रहे हैं... जिसे नाम देने की जरूरत नहीं होती, जो बस होता है..."
आकाश ने एक पल के लिए उसकी आँखों में देखा। वहाँ कुछ था—एक अनकही कहानी, एक अनकहा इकरार। लेकिन उसने फिर से नज़रें हटा लीं।
बिछड़ने की आहट
समय बीतता गया। वे दोनों एक-दूसरे की आदत बन चुके थे। लेकिन ज़िंदगी हमेशा वही नहीं देती जो हम चाहते हैं।
सृष्टि को अपने करियर के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा, और आकाश को भी अपने काम के लिए दूर जाना था।
स्टेशन पर दोनों खड़े थे। चारों तरफ हलचल थी, लेकिन उनके बीच बस खामोशी थी।
सृष्टि ने धीरे से कहा, "अगर मैं कहूँ कि मैं तुम्हें बहुत याद करूँगी, तो क्या तुम मुझे गलत समझोगे?"
आकाश ने नज़रें उठाईं, उसकी आँखों में नमी थी, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
"अगर मैं कहूँ कि तुम्हारे बिना अधूरा महसूस करूँगा, तो क्या तुम मुझे गलत समझोगी?"
सृष्टि ने हल्के से सिर हिलाया, जैसे कुछ कहने के लिए शब्द तलाश रही हो, लेकिन फिर कुछ कह नहीं पाई।
कुछ देर बाद, उसने धीरे से आकाश का हाथ पकड़ा और कहा, "हम जो महसूस करते हैं, वही सबसे सच होता है। यह हमेशा हमारे साथ रहेगा, भले ही हम साथ न हों।"
आकाश ने उसका हाथ हल्के से दबाया, फिर धीरे से छोड़ दिया।
ट्रेन चल पड़ी।
सृष्टि खिड़की से बाहर देख रही थी। आकाश वही खड़ा था—शांत, स्थिर, जैसे कोई मूरत।
उसने एक आखिरी बार सृष्टि को देखा, और हल्के से मुस्कुरा दिया।
कोई आँसू नहीं थे, कोई शिकायत नहीं थी।
वे जानते थे कि उनका प्यार सच्चा था, और सच्चे प्यार को हमेशा साथ रहने की जरूरत नहीं होती।
उन्होंने एक-दूसरे को खोया नहीं था, बल्कि एक खूबसूरत एहसास को हमेशा के लिए अपने दिल में सहेज लिया था।
और यही तो असली मोहब्बत थी।