Meri rang birangi Holi in Hindi Short Stories by Deepa shimpi books and stories PDF | मेरी रंग बिरंगी होली

Featured Books
  • इश्क दा मारा - 79

    यश यूवी को सब कुछ बता देता है और सब कुछ सुन कर यूवी को बहुत...

  • HOW TO DEAL WITH PEOPLE

                 WRITERS=SAIF ANSARI किसी से डील करने का मतल...

  • Kurbaan Hua - Chapter 13

    रहस्यमयी गुमशुदगीरात का समय था। चारों ओर चमकती रंगीन रोशनी औ...

  • AI का खेल... - 2

    लैब के अंदर हल्की-हल्की रोशनी झपक रही थी। कंप्यूटर स्क्रीन प...

  • यह मैं कर लूँगी - (अंतिम भाग)

    (भाग-15) लगभग एक हफ्ते में अपना काम निपटाकर मैं चला आया। हाल...

Categories
Share

मेरी रंग बिरंगी होली

मेरी रंग-बिरंगी होली

गाँव में होली की तैयारियाँ जोरों पर थीं। हर गली में गुलाल की सुगंध, मिठाइयों की खुशबू और ढोल-नगाड़ों की गूंज थी। मैं, राघव, हर साल की तरह इस बार भी अपने दोस्तों के साथ खूब होली खेलने के लिए उत्साहित था।

सुबह होते ही हम रंग, पिचकारी और गुब्बारों के साथ बाहर आ गए। जैसे ही मैंने पहला गुलाल उड़ाया, हवा में रंगों की बौछार हो गई। दोस्त हँसी-ठिठोली कर रहे थे, बच्चे दौड़-दौड़कर एक-दूसरे को रंग रहे थे, और बड़े-बुजुर्ग प्यार से गले मिल रहे थे। लेकिन मेरी नज़र मोहल्ले के कोने में खड़ी छोटी सी लड़की, सुमि पर पड़ी।

सुमि सात साल की एक मासूम बच्ची थी, जो हाल ही में अपने माता-पिता के साथ गाँव में रहने आई थी। वह बस चुपचाप हमें देख रही थी, लेकिन खुद होली में भाग नहीं ले रही थी। मैं उसके पास गया और पूछा, "तुम खेल क्यों नहीं रही हो?"

उसने सिर झुका लिया और धीरे से कहा, "मुझे किसी ने रंग नहीं लगाया। मुझे डर लगता है कि कोई मुझे पसंद नहीं करेगा।"

मुझे यह सुनकर बहुत अजीब लगा। होली तो सभी के लिए होती है, फिर वह अकेली क्यों थी? मैंने हल्के से उसके गाल पर गुलाबी गुलाल लगाया और मुस्कुराकर कहा, "अब तुम हमारी होली का हिस्सा हो!"

सुमि की आँखों में चमक आ गई। पहले तो उसने हिचकिचाते हुए अपनी छोटी सी पिचकारी से पानी डाला, फिर धीरे-धीरे पूरी तरह से रंगों में घुल गई। कुछ ही देर में वह सबसे ज्यादा हँसने और दौड़ने वाली बच्ची बन गई थी।

शाम तक पूरा गाँव रंगों में सराबोर था। जब सब थककर बैठे, तो दादीजी ने गुजिया और ठंडाई बांटते हुए कहा, "होली का असली रंग तभी चढ़ता है जब हम किसी के जीवन में खुशी के रंग भर दें।"

मैंने सुमि को देखा, जो अब खुशी से चहक रही थी। मुझे लगा, इस बार की मेरी रंग-बिरंगी होली सबसे खास थी—क्योंकि इस बार मैंने न सिर्फ खुद खेला, बल्कि किसी और की होली को भी खूबसूरत बना दिया था।
मेरी रंग-बिरंगी होली

गाँव में होली की तैयारियाँ जोरों पर थीं। हर गली में गुलाल की सुगंध, मिठाइयों की खुशबू और ढोल-नगाड़ों की गूंज थी। मैं, राघव, हर साल की तरह इस बार भी अपने दोस्तों के साथ खूब होली खेलने के लिए उत्साहित था।

सुबह होते ही हम रंग, पिचकारी और गुब्बारों के साथ बाहर आ गए। जैसे ही मैंने पहला गुलाल उड़ाया, हवा में रंगों की बौछार हो गई। दोस्त हँसी-ठिठोली कर रहे थे, बच्चे दौड़-दौड़कर एक-दूसरे को रंग रहे थे, और बड़े-बुजुर्ग प्यार से गले मिल रहे थे। लेकिन मेरी नज़र मोहल्ले के कोने में खड़ी छोटी सी लड़की, सुमि पर पड़ी।

सुमि सात साल की एक मासूम बच्ची थी, जो हाल ही में अपने माता-पिता के साथ गाँव में रहने आई थी। वह बस चुपचाप हमें देख रही थी, लेकिन खुद होली में भाग नहीं ले रही थी। मैं उसके पास गया और पूछा, "तुम खेल क्यों नहीं रही हो?"

उसने सिर झुका लिया और धीरे से कहा, "मुझे किसी ने रंग नहीं लगाया। मुझे डर लगता है कि कोई मुझे पसंद नहीं करेगा।"

मुझे यह सुनकर बहुत अजीब लगा। होली तो सभी के लिए होती है, फिर वह अकेली क्यों थी? मैंने हल्के से उसके गाल पर गुलाबी गुलाल लगाया और मुस्कुराकर कहा, "अब तुम हमारी होली का हिस्सा हो!"

सुमि की आँखों में चमक आ गई। पहले तो उसने हिचकिचाते हुए अपनी छोटी सी पिचकारी से पानी डाला, फिर धीरे-धीरे पूरी तरह से रंगों में घुल गई। कुछ ही देर में वह सबसे ज्यादा हँसने और दौड़ने वाली बच्ची बन गई थी।
दीपांजलि (दीपाबेन शिम्पी )
शाम तक पूरा गाँव रंगों में सराबोर था। जब सब थककर बैठे, तो दादीजी ने गुजिया और ठंडाई बांटते हुए कहा, "होली का असली रंग तभी चढ़ता है जब हम किसी के जीवन में खुशी के रंग भर दें।"

मैंने सुमि को देखा, जो अब खुशी से चहक रही थी। मुझे लगा, इस बार की मेरी रंग-बिरंगी होली सबसे खास थी—क्योंकि इस बार मैंने न सिर्फ खुद खेला, बल्कि किसी और की होली को भी खूबसूरत बना दिया था।