Dwaraavati - 85 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | द्वारावती - 85

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द्वारावती - 85



85


“सब व्यर्थ। प्रकृति पर मानव का यह कैसा आक्रमण? हम उसे उसकी नैसर्गिक अवस्था में भी नहीं रहने देते हैं। ऐसा करने का अधिकार हमें किसने दिया?” केशव बोले जा रहा था। 
उत्सव ने उसे रोका, “कुछ कहोगे कि क्या हुआ? यूँ ही बोले जा रहे हो।”
“प्रशासन अंधा, बहेरा होता है ऐसा सुना था। किंतु असंवेदनशील भी होता है यह देख लिया।”
“अर्थात् वह समुद्र की मुक्ति हेतु सम्मत नहीं हैं। यही ना, केशव?” 
“हाँ, गुल। हाँ, उत्सव। समुद्र की निर्बाधता को बांध दिया है और उसके लिए उनके पास असंख्य कारण है।”
“असंख्य? इन कारणों में कोई तथ्य, कोई तर्क भी है क्या?” 
“तर्क?” केशव हंसने लगा, “प्रशासन की दृष्टि में सबसे तर्कपूर्ण जो कारण है वह मैं आप दोनों को बताता हूँ।”
“हंसते भी हो और तर्कपूर्ण भी बताते हो?” गुल ने पूछा। 
“सुनी। आप दोनों भी जब सुनोगे तो आप भी हंसते रह जाओगे।”
“कहो, कहो।मैं तो अधीर हो रहा हूँ। गुल, तुम?”
“वह कहते हैं कि आज हमने जिस प्रकार समुद्र के तट को सीमाओं में बांधा है ऐसा द्वारिकाधीश ने अपने समय में बांध लिया होता तो द्वारका नगरी समुद्र में कभी नहीं डूबती। अपने ऐसे तर्क पर वह अधिकारी हंसने लगा।”
“वह क्यों हंसने लगा?”
“अपनी मूर्खता पर।”
“और हम उसकी मूर्खता पर।” तीनों हंसने लगे।
“यदि इस प्रकार समुद्र को बांधने से समुद्र को रोका जा सकता तो विश्व में अनेक नगर समुद्र के प्रकोप से बच जाते। कई संस्कृतियों को नष्ट होने से बचाया जाता।” उत्सव ने कहा।
“जिस दिन समुद्र ने यह निश्चय कर लिया कि किसी नगर को अपने भीतर समा लेना है उस दिन समुद्र ऐसी सभी सीमाओं को अपनी एक ही प्रचंड लहर से तोड़ देगा। ऐसी सीमाएँ कभी समुद्र को रोक नहीं पाती।” केशव ने कहा।
“ऐसी मूर्खता से लड़ें भी तो कैसे?” गुल ने पूछा।
“हम प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर अपना पक्ष रखेंगे। साथ साथ उस अधिकारी की मूर्खता को भी प्रकट करेंगे। कोई न कोई स्तर पर कोई तो हमारी बात ….।”
केशव की बात उत्सव ने काटते हुए कहा, “यह भारत है, केशव। यहाँ ऐसा कुछ नहीं होगा। यहाँ के व्यवहार इतने भ्रष्ट हैं कि यदि कल को वह समुद्र को बेच भी दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।”
“यह क्रांतिकारी विद्यार्थी नेता उत्सव कह रहा है?”
“नहीं, केशव। उत्सव सत्य कह रहा है। वह सारी व्यवस्था को भली भाँति जानता है, जो सडी हुई है, जिसमें कोई संवेदना नहीं बची है।”
“तो क्या करें? कर्म किए बिना, प्रयास किए बिना उसे भूल जाएँ?”
उत्सव तथा गुल के पास कोई उत्तर नहीं था। 
“मैं अपने यथा सम्भव प्रयास करता रहूँगा।”
यह बात उस क्षण से तीनों के मध्य समाप्त हो गई किंतु केशव के लिए अभी जीवंत थी। उसने अनेक स्तर पर इस बात को उठाया। अपना पक्ष रखा। कहीं कहीं तो स्वप्न में समुद्र ने जो कहा था वह भी सुनाया। किंतु, सब व्यर्थ। कहीं से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिले, किसी ने इस बात को गम्भीरता से नहीं लिया। 
“यह कैसा देश है? कैसा प्रशासन है? हमारी क्रिया की कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दे रहा है। यहाँ तक कि प्रधान मंत्री कार्यालय ने भी कोई उत्तर नहीं दिया। प्रकृति की तरफ़ जितने असंवेदनशील है यह प्रशासन उतना ही असंवेदनशील हमारी बातों के प्रति भी है। हम ऐसे कैसे हो सकते हैं? क्या यह देश वास्तव में स्थितप्रज्ञ हो गया है। किसी को कोई बात से अंतर ही नहीं पड़ता।”
“केशव, हमारे कारण ही उस अधिकारी का द्वारका से स्थानांतरण हो गया है।” गुल ने कहा।
“यह हमारा उद्देश्य नहीं है, गुल। अधिकारी बदलने से स्थिति तो नहीं बदली। सोच नहीं बदली। सभी एक ही डाल के पंखी होते हैं।”
“केशव, तुम अपने सभी प्रयास कर चुके हो। आगे भी करते रहना। किंतु हमें हमारे मन की जिज्ञासा तथा उसके समाधान पर भी ध्यान देना होगा।”
“उत्सव, यह भी आवश्यक है। गुल, हमारे प्रश्नों पर तुम तो ध्यान दोगी ना? या तुम भी प्रशासन के अधिकारी की भाँति ….।”
“बस करो, केशव। प्रशासन अधिकारी में तथा मुझ में तुम्हें कोई अंतर नहीं दिख रहा?” गुल रुस गई। 
केशव तथा उत्सव को छोड़कर समुद्र की तरफ़ चली गई। केशव उत्सव ने एक दूसरे को देखा। दोनों वहीं बैठे रहे। गुल के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे। 
कुछ क्षण तक गुल समुद्र की तरफ़ चलती रही। सहसा पीछे मूडी। देखा तो दोनों वहीं अपने अपने स्थान पर बैठे थे। वह लौटकर आइ और बोली, “तुम दोनों मुझे मनाने क्यों नहीं आए?”
“गुल, रुषने मनाने के स्तर से तुम कहीं ऊपर उठ चुकी हो। तुम्हें ऐसी बातों की आवश्यकता कैसे होने लगी?”
केशव के इस उत्तर से गुल हंस पड़ी। 
“गुल, तुम मिथ्या क्रोध करना जानती हो?”
“नहीं, उत्सव।”
“तो ऐसी बातों का त्याग कर दो। और हमारे प्रश्नों का समाधान करो, गुल।”
“नहीं केशव, केवल गुल कहने से काम नहीं होगा। इसे पंडित गुल कहो। है ना पंडित गुल?”
“केशव, इतने दिनों तक धीर गम्भीर रहने वाला उत्सव तुम्हारे संग में व्यंग करने लगा है। ऐसे संग का प्रभाव ठीक नहीं है, उत्सव।” 
अपने शब्दों पर गुल हंस पड़ी। केशव तथा उत्सव ने हंसने में गुल का साथ दिया।