Shuny se Shuny tak - 77 in Hindi Love Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | शून्य से शून्य तक - भाग 77

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शून्य से शून्य तक - भाग 77

77===

  आशिमा भी आशी को देख चुकी थी और जल्दी से भाई के कमरे में जाकर उसने भाई, भाभी को बता दिया था| सब जैसे अचानक सकते में आ गए| अनन्या इतनी घबरा गई थी कि उसके मुँह पर हवाइयाँ उड़ने लगीं, वह खड़ी थी, कुर्सी पर बैठ गई| उसकी मम्मी भी तैयार होकर अनन्या के कमरे में आ गईं थीं | मनु ने अनन्या के कंधे पर सांत्वना से हाथ रखा और दीना जी के कमरे की ओर बढ़ आया| 

“आशी ! तुम?” दीनानाथ चौंक उठे| 

“अरे भूत नहीं आपकी बेटी हूँ—आशी----”उसने अपनी टोन में कहा| 

“ओ ! हैलो मनु, कैसे हो?” मनु ने जैसे ही दीना जी के कमरे में प्रवेश किया आशी उसकी ओर घूमकर बोली| 

“ऑल गुड?” आशी ने मनु से पूछा जिसका उत्तर उसके मुँह में ही भरा रह गया| 

“भैया!जल्दी आइए---” आशी की आवाज़ थी| 

  मनु अपने कमरे की ओर भागा जहाँ अनन्या और उसकी मम्मी भी थीं| अनन्या की तबियत अचानक अधिक बिगड़ने लगी थी| मनु ने उसकी दशा देखकर जल्दी से डॉक्टर को फ़ोन किया कि वे घर आ जाएं लेकिन डॉक्टर ने कहा कि वे लोग आ ही तो रहे थे, उन्हें क्लीनिक ही आ जाना चाहिए जिससे कोई ज़रूरत पड़े तो वहीं उसे देख लिया जाए| 

आशी आशिमा की घबराई हुई आवाज़ सुनकर चौंक उठी थी| 

“आशिमा भी यहाँ आई हुई है?”आशी ने चौंककर कहा | 

“क्यों माधो?”माधो ने आशी की ओर हाँ में गर्दन हिला दी| 

डॉक्टर के पास जाने के लिए मनु अनन्या को सहारा देकर नीचे ले जाने लगा| अनन्या ने अस्पताल जाने से पहले दीना अंकल के कमरे में जाने के लिए कहा| 

“पर---”

“प्लीज़---” 

  मनु और अनन्या की मम्मी उसे दीना जी के कमरे की ओर ले चले| दीना जी माधो के साथ लॉबी में आ गए थे| आशी भी किंकर्तव्यविमूढ़ सी उन लोगों के पीछे-पीछे चल दी| अनन्या अपनी मम्मी और मनु के साथ उधर की तरफ़ ही आ रही थी| उसने आकर झुककर उनके पैर छूने की कोशिश की तो उन्होंने उसे बीच में ही थाम लिया और उसके माथे को चूम लिया| 

“जाओ बेटा, भगवान का हाथ तुम्हारे सिर पर रहे| ”

“हैलो आशी!”अनन्या ने धड़कते दिल से कहा और उसकी तरफ़ देखकर मुस्काने की चेष्टा की| 

  आशी इतनी भौंचक थी कि उसके मुँह से कुछ भी नहीं निकला| आशिमा, रेशमा भी वहीं आ गईं थीं | पूरा सिनारियो ही बदला हुआ था| मनु आशी को लेकर नीचे चला, साथ में अनन्या की मम्मी और आशिमा, रेशमा भी थीं| 

“एक मिनट---” अनन्या ने मनु से कहा| 

“अब क्या?”

  वह कुछ नहीं बोली, पूजाघर की ओर मुड़ गई और भगवान को प्रणाम करके बाहर आ गई| रामसिंह ने गाड़ी अंदर तक लगा रखी थी| मनु उसको सहारा देकर गाड़ी में बैठा रहा था| घबराहट के कारण अनन्या की पीड़ा बढ़ती जा रही थी| उसने गाड़ी में बैठने से पहले एक बार ऊपर लॉबी की ओर देखा जहाँ दीना जी, आशी और माधो खड़े थे| उसने ऊपर की ओर देखकर हाथ जोड़ दिए| दीना जी ने अपने हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठाए| 

  अब गाड़ी गेट से बाहर निकल सड़क पर दौड़ने लगी थी| आशी के चेहरे पर अनेकों प्रश्नचिन्ह पसर गए| वह किसी से कुछ भी पूछने की स्थिति में नहीं थी| उसके पीछे तो सब कुछ बदल गया था| उसने अपने कमरे में जाकर फ़्रेश होना सोचा और अपने कमरे में आ गई| दीना जी माधो के साथ अपने कमरे में आ गए थे|