Shuny se Shuny tak - 70 in Hindi Love Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | शून्य से शून्य तक - भाग 70

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शून्य से शून्य तक - भाग 70

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लिखते-लिखते अनन्या की कलम रुक गई| कमाल ही थी वह?उसने सोचा जो वह आजकल अक्सर सोचने लगती थी कि आखिर वह किस बलबूते और अधिकार से मनु को अपने पिता की सार-संभाल के लिए कहकर आई थी?मन कभी भी धड़कने लगता लेकिन वह जैसे अपने मन को मुट्ठी में भींच लेती| उसके मन से रक्त टपकने लगता जैसे लेकिन स्वीकार करना तो उसने कभी जाना ही नहीं था | उसे पता तो चल ही गया था कि मनु अनन्या के साथ बहुत घुल-मिल गया था लेकिन न जाने कैसे अनन्या के गर्भ का उसे अभी तक कैसे पता नहीं चल था| शायद उसके किसी मुखबिर ने या तो उसे सही सूचना नहीं दी थी या वह स्वयं भी इससे भिज्ञ नहीं था| खैर---

बहुत दिनों बाद एक दिन उसने मनु को फ़ोन कर दिया जिसकी मनु को कल्पना भी नहीं थी| उसे फ़ोन?आशी ने?उसका दिल धड़कने लगा, क्या आशी के मन में मेरे लिए कोई भावना जागृत हो गई है?मनु ने मन ही मन सोचा| क्या करेगा वह?कैसे उसे बताएगा?कैसे उसके साथ किए हुए व्यवहार को न्याय दे सकेगा?उनके बीच चाहे जो भी कुछ न हो, पति तो था ही, वह उसका अपराधी तो था ही !

“हाँ, मैं आशी बोल रही हूँ मनु, पापा ठीक हैं न, उनका ध्यान रख रहे हो न ?” उसका स्वर तो अब भी सपाट था| वह अपनी किसी भी गलती को मानने वाली कहाँ थी, वह तो उसे आदेश देने वाली उसकी मालकिन जैसी ही थी| आशी के स्वर व बात करने के सलीके ने उसके मन में बेबसी भर दी---

मनु दीना जी का बहुत ध्यान रखता डॉक्टर से उनकी जाँच करवाता रहता| डॉक्टर का कहना था कि वे अपनी भावनाओं पर कंट्रोल करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं किन्तु यदि वे नहीं कर पाए तो डिप्रेशन के कारण कहीं ‘सिज़ोफ्रेनिया’ का शिकार न हो जाएं| मनु उनसे कोई भी ऐसी बात साझा नहीं कर सकता था जिससे उबहेब और पीड़ा पहुँचे | 

मनु दीना अंकल या डैडी के लिए पहले ही बहुत परेशान था| जब भी मनु उन्हें अंकल कहता, उनका चेहरा उतर जाता फिर उसको तुरंत ही अपनी गलती का ख्याल आ जाता और वह तुरंत उन्हें डैडी कहकर पुकारता| दीना के चेहरे पर एक तसल्ली सी पसर जाती जैसे---

रेशमा सब बातें देख व समझ रही थी, वह आशिमा से भी चर्चा करती रहती| वह और अनिकेत भी उसे अपने साथ ही खड़े मिलते| वे दोनों इधर चक्कर लगाते तो रहते थे लेकिन हर दिन आना संभव नहीं था| रेशमा को ही माधो के साथ मिलकर उनका ध्यान रखना पड़ता| वह अंकल के पास अधिक से अधिक समय बनी रहती| अकेलेपन से उबरने के लिए मनु उन्हें ऑफ़िस ले  जाता| वहाँ भी वे अधिकतर सूनी आँखों से न जाने क्या देखते रहते| ऑफ़िस में उनका बहुत सम्मान था, जब भी कुछ ऐसा लगता कि सेठ जी असहज हैं, कोई न कोई उनका मूड बदलने उनके पास थोड़ी देर के लिए आ जाता चाहे उनसे किसी काम के बारे में सलाह लेने के बहाने से ही सही, सब उनका बहुत ध्यान रखते !

“हाँ, मनु---मैं तुमसे ही बात कर रही हूँ, तुम जवाब क्यों नहीं दे रहे हो?”मनु अपनी स्थिति में डूबा था कि फ़ोन पर फिर से सपाट आवाज़ सुनाई दी| वह चौंक उठा| वह जानता था कि आशी ने अपने प्रेम के स्वीकार या संबंधों के लिए फ़ोन नहीं किया था | फ़ोन तो उसने पिता के लिए भी शायद नहीं किया था| उसने अपना बड़प्पन और अहं दिखाने के लिए और हाँ, शायद उससे उसकी अनन्या के साथ संबंधों के बारे में जानने के लिए फ़ोन किया था| अगर पिता की या उसकी चिंता होती तब क्या वह इतने लंबे दिनों तक चुप बनी रहती?

“आशी  ! अगर तुम्हें इतनी चिंता है तो तुम्हें यहाँ अपने पिता के पास आकर रहना चाहिए---“आज वह भी भिन्नाया  हुआ था| आखिर किस बात की धौंस दिखा रही थी वह?उसका नौकर नहीं था वह और जानता, समझता था कि उसकी क्या ड्यूटी है और उसे क्या करना चाहिए| 

शायद उधर से कुछ कटु संवाद आता, मनु ने फ़ोन बंद कर दिया| आशी को आज भी याद है, वह कैसी उखड़ गई थी| कुछ देर बाद उसने फिर से मनु से बात करनी चाही लेकिन मनु ने फ़ोन ही नहीं उठाया और झल्लाकर आशी ने अपना फ़ोन पलंग पर फेंक मारा था | कैसी शोध की आग उसके भीतर सुलगने लगी थी | आशी का अपमान !!