39 Days - 1 in Hindi Anything by Kishanlal Sharma books and stories PDF | 39 Days - 1

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39 Days - 1

कैसे भूल सकता हूँ ,उन दिनों को भूलना चाहूं, तो भी नही।ऐसे दिन भगवान किसी भी बाप को न दिखाए।
और माफ भी नही कर सकता उन लोगों को जो आदमी को कर्ज के जाल में फसाते है।सुना है कि हमारे भारत मे ही एक बार सूदखोर यानी साहूकार से कर्ज ले लिया तो पीढियां बीत जाती थी।ब्याज देते देते लेकिन मूलधन नही चुकता था।आज भी मिलती जुलती ही स्थिति है।बदले रूप में पहले गांवों में सेठ,साहूकार व इसी तरह के और लोग होते थे।जो गरीबो या जरूरतमंदों को उधार पैसा देते थे।और ये पैसे कभी भी नही चूकते थे।चुकाने के बावजूद कर्जा बढ़ता जाता था।और पीढ़ी दर पीढ़ी यह कर्ज चलता रहता था।और कर्ज न चुका पाने पर जबरदस्ती बंधक बनाकर बंधवा मजदूर बना लेते थे।पहले शहर आजकल की तरह नही होते थे।
पर आजकल शहरों का स्वरूप बदल गया है।आजकल शहर बड़े होते है और जो गांवों में साहूकार,सेठ निकलकर अब शहरों में प्रवेश कर चुके है।हा उनका स्वरूप बदल चुके है।शहरों में आपको जगह जगह प्रोपर्टीज के नाम से बोर्ड लगे मिल जाएंगे।इनका काम प्रॉपर्टी खरीदवाने या बेचने का काम है लेकिन ये लोग ब्याज पर पैसे देने का काम करते है।ब्याज भी हर महीने 5 से 10 परसेंट तक ब्याज लेते है।आखिर लोग ऐसे लोगो के पास जाते क्यो है क्योंकि बैंक से इन लोगो को आराम से लोन नही मिलता।अगर बैंक में इतनी ज्यादा फॉर्मलटी न हो तो लोग इनके पास क्यो जाए।
ये लोग भी पुराने साहूकारों की तरह अनाप सनाप ब्याज लेते है।जितना देते नही उससे कई गुना ज्यादा ब्याज वसूल लेते है और क़िस्त न चुका पाने पर आदमी को बाइज्जत करते है।इनके उत्पीड़न से तंग आकर कई लोग आत्महत्या तक कर लेते है।तब पुलिस जागती है लेकिन खाना पूरी करके कुछ दिनों तक अखबार की सुर्खियों में बने रहने के बाद शांत हो जाता है।और ये लोग उसी तरह धंधा करते रहते है।
ब्याज का धंधा करने के लिए नियम के अनुसार लाइसेंस के साथ रिजर्व बैंक से अनुमति लेनी पड़ती है लेकिन शायद एक प्रतिशत लोग ही ऐसा करते है।बाकी सब गैरकानूनी तरीके से यह काम करते है। और हर शहर और गांव में इस तरह के लोग मिल जाएंगे।ऐसे लोगो की जानकारी पुलिस प्रशासन को भी होती है लेकिन होता कुछ नही।
ऐसे लोगो के जाल में हमारे साहबजादे भी फस गए।हर पितां की तरह मैं भी चाहता था, बेटे की सरकारी नौकरी लग जाये।कुछ परीक्षाएं भी दी।पर नही हो पाया।फिर किसी बड़े कन्सर्न में कोशिश की पर बात नही बनी तब प्रेस में नौकरी कर ली।करीब एक साल से ज्यादा काम करने के बाद मेरे पास आगरा आ गया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने लगा।फिर काम छोड़कर अपने जीजा के पास चला गया।उनकी सलाह और आर्थिक सहयोग पर उसने आगरा में दुकान खोल ली बिजली की।
धीरे धीरे दुकान जम गई और अच्छी चल निकली।दुकान किराए की थी।और हम सोच रहे थे,जब इसे दुकान ही करनी है तो,दुकान दिला दी जाए।रिटायर होने पर मैने दुकान के लिए बीस गज जगह मेन चौराहे पर खरीद ली।
मैने कहा दुकान बनवा दू पर उसने मना कर दिया