पुर्जा-पुर्जा मन
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ये कोई नयी बात नहीं है ,न उसके और न किसी और के लिए । मन तो मन ही होता है चाहे वह किसी का भी क्यों न हो। वह प्रफुल्लित होता है,दुखी होता है,टूटता है,जुड़ता है।अंधेरों में -उजालों में सरगोशियाँ करता है । कभी गुब्बारे सा फुलाया जाता है तो कभी भीगे तौलिये सा निचोड़ा जाता है । कभी उस पर पीली हल्दी सा रंग चढ़ जाता है तो अगले ही पल वह सिंदूरी हो उठता है ।देखा है क्या किसी ने मन को ? सब करते हैं मन की बात पर मन आखिर है क्या? प्रश्नों की क़तार में एक और प्रश्न का जुड़ जाना उसे सदा ही नागवार गुजरता रहा है । मन --मन है---- और क्या?
नहीं ---ऐसा नहीं है । अक्सर वह अपने प्रश्नों के उत्तर स्वयं खोजती रहती है , उसे किसी के उत्तर से संतोष ही प्राप्त नहीं होता । वह ही केवल इतनी समर्थ है क्या?स्वयं पर वह बुक्का फाड़कर हंस भी सकती है,अपनी मजाक स्वयं भी बना सकती है!पर--- स्वयं के अंधेरों में छिपे हुए प्रश्नों के उत्तर तलाशती वह टूटने -बिखरने लगती है और अपने उस अनदेखे मन को साँसों की मुट्ठी में कैद करके लंबी साँसें भरने लगती है। उसका मन किसी मकड़जाल में कैद निरीह मकड़ी की भाँति छटपटाने लगता है,और वह कसमसाती हुई प्रश्नों के मकड़जाल से निकल भागने के लिए शायद मौका तलाशती रहती है ।
है क्या उसका अस्तित्व? एक और निरीह प्रश्न उसके समक्ष खड़ा होकर खिलखिलाता है और वह झेंप जाती है । ठीक ही तो कहते हैं सब उसके लिए ---"ये ज्यादा पढ़ा-लिखा होना भी आदमी को 'सिनिकल' बना देता है । बेकार की बातों में उलझने से ज़िंदगी के व्यवहारिक प्रश्न हल होते हैं क्या? अरे भई जीवन मिला है खाओ-खेलो। दूसरे के फटे में टाँग अड़ाओगे तो उल्टे मुंह ही गिरोगे न!"
वह किसी की बात का उत्तर नहीं देती ,आवश्यकता ही कहाँ है ? जो व्यक्ति समाज में रहकर अपने सामाजिक कर्तव्य से भी सचेत न हो ,वह आखिर उसकी बात कहां से समझ सकेगा ? हाँ ---उसने मन देखा नहीं है पर उसका मन सदा उसे झकझोरता रहता है,अहसास करवाता रहता है कि वह जिंदा है,उसका भले ही कोई आकार उसने न देखा हो पर उसका अस्तित्व तो जरूर महसूस करती है,बिना किसी भ्रान्ति के है---मन।
यही मन उसे बरसों पूर्व के पृष्ठों की धूल झाड़कर रेलगाड़ी की छुक-छुक की आवाज़ में लपेटकर उसके समक्ष कुछ खोखले प्रश्न परोसने लगता है--कभी भी । वास्तव में वह उसे कभी भी चुनौती देने लगता है।दो लंबे दशक -----एक चक्कर की भाँति उसके समक्ष गोल दायरे में घूमने लगते हैं और रेलगाड़ी की अजीब सी 'छुक-छुक' आवाज़ में मन का गुम हो जाना उसे हड़बड़ाकर सोते से उठाकर बैठा देता है । आँखें फाड़े वह अपने चारों ओर देखने लगती है।अपने रिश्तों से घिरी वह एक अजनबी की भाँति स्वयं को तटस्थ करने का प्रयास करने लगती है।उसके समक्ष दो युवा लडकियाँ सहमी कबूतरी की भाँति उसकी 'बर्थ' पर घुसने की नाकाम सी कोशिश करती नज़र आने लगती हैं ।
उस दिन बहुत देर लगी थी उसे यह सब कुछ समझने में आखिर वह है कहाँ और हो क्या रहा है ? उसके एक ओर उसकी देवरानी और दूसरी ओर उसकी ननद बैठी थी।ये अजीब सी धक्का-मुक्की आखिर क्यों और क्या हो रही है? उसने आँखें मलते हुए सोचा था और फिर से एक बार अपने चारों ओर दृष्टि घुमाकर वातावरण को समझने की नाकाम सी चेष्टा करने लगी थी । उसकी दृष्टि अपने पति पर भी पड़ी जो गुमसुम से अपने सामने होते हुए डिब्बे में होने वाले कार्य-कलाप को अपलक दृष्टि से देख रहे थे ।पूरा डिब्बा गुम था मानो किसी भी यात्री के मुख में जबान ही न हो । कितनी गहरी नींद सोई हुई थी वह पर अचानक ही होने वाली धक्का-मुक्की से उसकी आँखें खुल गई थीं । उसके सम्मुख दो युवा लडकियाँ थीं जो उसके पैरों की तरफ जबरदस्ती अजीब तरह से घुसी हुई सी बैठी थीं,उन लड़कियों को तीन-चार कॉलेज के से दिखने वाले लड़कों ने घेर रखा था।अजीब सी धक्का-मुक्की में लिप्त लड़के, लड़कियों पर छा जाने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे । इन दोनों लड़कियों के सीट पर बैठने के प्रयत्न में ही उसे उठकर बैठ जाना पड़ा था और बामुश्किल अपनी नींद से उबरने का प्रयत्न करना पड़ा था ।लड़कियों को एक 'सीट' में ठुंसने की क्रिया देखकर उसे ऐसा लग रहा था मानो एक म्यान में दो तलवारें जबरदस्ती घुसने का प्रयत्न कर रही हों।परन्तु वे तलवारें नहीं थीं और अगर थीं भी तो ज़ंग लगी हुई तलवारें थीं वर्ना उन बेहूदे से लगने वाले लड़कों के पेट में घुसकर उन्हें फाड़ न देतीं !उसकी आँखें कभी गोल-गोल घूमने और कभी सिकुड़ने लगी थीं और मन में कुछ अजीब सी हलचल होने लगी थी । इस अजीब माहौल से उसके मन में चिंता और असमंजस आँखों के कटोरों में भर गया था।लड़कियों को घेरकर खड़े होने वाले लड़के लगातार उन सहमी हुई कबूतरियों के ऊपर गिर-पड़ रहे थे और खींसे निपोरकर अपनी असभ्यता तथा बेशरमाई का प्रदर्शन करने में स्वयं को किसी बेताज बादशाह से कम नहीं समझ रहे थे ।लड़कियाँ धक्के खाकर और उसकी ओर सरकती जा रही थीं और उसकी झुंझलाहट की हद का अतिक्रमण होने की घड़ी पास आती जा रही थी।
"ये क्या ---कर क्या रहे हो तुम लोग---?" अचानक ही उसकी झुंझलाहट ने दायरा तोड़ दिया और उसने देखा कि न जाने कितनी जोड़ी आँखें उसकी ओर ऐसे घूम गईं जैसे उसने कोई भयंकर अपराध कर डाला हो !
उसकी नींद न जाने 'कंपाटमेंट 'के किस कोने में दुबक गई और उसे लगा उसकी आँखें अंगारे उगलने लगी हैं ,गर्म-गर्म अंगारे । मन के किसी कोने में उलझन गुलझटें बनकर उसे उद्वेलित करने लगी थीं और नपुंसक सा वातावरण अग्नि-शिखा में परिवर्तित होकर उसकी शिराओं को उबालने का भरसक प्रयत्न करने लगा था।लगभग कांपते शरीर और आवाज़ से उसने एक बार पुन: उद्दण्ड लड़कों से उन लड़कियों के पास से हट जाने को कहा परन्तु इसका प्रतिकार लड़कों ने एक और ज़ोरदार बेशर्म सा धक्का देकर खिलखिलाकर किया ।क्षण भर के लिए उसने लड़कियों की ओर देखा जिनकी आँखों में उसे याचना स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी । कुल मिलाकर वातावरण भयंकर बोझिल था और उसके मन की घुटन उसे सहज नहीं रहने दे रही थी।लड़कों की ऑंखें बेहयाई से भरी हुई थीं और अब उसे घूरने लगी थीं । हाँ,वे चार ही तो थे और गाड़ी के झटकों का बहाना लेकर लड़कियों पर आगे-पीछे गिरने-पड़ने का बहाना कर रहे थे । अचानक उनमें से एक लड़के ने एक लड़की के गाल पर हाथ फेर दिया और फिर दूसरी के वक्षस्थल पर हाथ दे मारा । अब सीमा पार हो गई थी , उसके मन ने उसे ज़ोरदार हिकारत से झकझोरा था --" बदतमीज़ ----क्या कर रहे हो तुम लोग---?"
सारे नपुंसक वातावरण में बेजान लोगों के बीच एक वही जीवित शेरनी है क्या? उसके मन ने एक बार सोचा और फिर उत्तेजित होकर वह अपनी सीट से खड़ी हो गई । उसने लड़के के मुह पर तमाचा रसीद करने के लिए अपना हाथ बढ़ाया पर उसके हाथ को जैसे किसी ने लोहे के शिकंजे की भांति जकड़ लिया ।उसका सीधा हाथ थप्पड़ रसीद करने की तैयारी में कैद हो चुका था तो बायाँ हाथ पीछे से खींचा जा रहा था । यानि उसको चुप रहने का संकेत किया जा रहा था ।
"स्टॉप ---दिस नॉनसेंस ---"उसने कसमसाते हुए अपना हाथ छुड़ाने की चेष्टा करते हुए कहा ।
" आंटी ---चुपचाप बैठी रहो अपनी सीट पर -----"उसके हाथ को और भी कसते हुए वह लड़का लगभग चिल्लाते हुए बोला जो शायद बदतमीजों का 'लीडर' था।सारे लड़के कुछ इस प्रकार ठहाका मारकर हंसने लगे जैसे वे कोई राक्षस हों और कबूतारियाँ उनकी पनाहगाह में मौज-मस्ती ले लिए लाई गई हों जिसमें कोई खलल डालने की चेष्टा कर रहा हो । हाँ,कम्पार्टमेंट को उन्होंने किला ही तो बना रखा था जिसमें सारे यात्री मूक सिपहसालार या फिर द्वारपाल जैसे बने हुए थे , जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था।
"लेकिन---ये सब---?"उसने अपने हाथ को एक बार फिर से छुड़ाने का प्रयत्न करते हुए कुछ कहने का प्रयत्न किया और महसूस किया कि वह भीतर से बहुत भयभीत है और उसका पूरा शरीर काँपने लगा है।उसकी आवाज़ का दमखम अधमरी चुहिया सा छटपटाने लगा था।
"आप समझ नहीं रही हो----अब अगर आप जरा भी बोलीं तो देखना ---आप बड़ी हो --मैं आपकी इज्ज़त कर रहा हूँ ----बैठो अपनी सीट पर और अगर देखा नहीं जा रहा तो मुह घुमा लो----"उस लीडर ने अचानक अपना हाथ ढीला छोड़कर उसे बर्थ पर धक्का देते हुए उसकी इज्ज़त कर डाली थी। वह हकबकाई हुई सी अपनी ननद की गुदगुदी गोदी में आ गिरी थी । गदबदी पर छुईमुई सी ननद के मुह से आवाज़ निकलते- निकलते भय के मारे शायद मुख में ही चिपककर कैद हो गई थी।उसका स्वयं का पहलवान शरीर ! वह जानती थी कि शन्नो दीदी पिचककर रह गई होंगी । किसी न किसी प्रकार वह अपनी असहाय हुई स्थिति से मुक्त होने की चेष्टा करती हुई उनकी गोदी से निकलकर ,स्वयं को संभालती हुई अपनी 'बर्थ' पर अपनी देवरानी और ननद के बीच में जा घुसी थी ।मन की दशा का जायजा लेते हुए अपमान तथा भय से उसके गाल और कान बजने लगे थे , शरीर तथा मन के अंदर जैसे सुरसुरी सी चलने लगी थीं । उसने अपने दुपट्टे के एक भाग को हाथ में लेकर बेमतलब ही अपने मुह पर फिराया और महसूस किया कि उसका पूरा चेहरा पसीने से तरबतर है । अपने भीतर वह बेहद बैचैनी तथा गालों एवं कानों में सरसराहट महसूस कर रही थी।कनखियों से देखने पर उसे पता चला कि उसका हाथ पकड़ने वाला लड़का फिर से अपनी औकात पर उतर आया था,उसके लिए जैसे वहां कोई उपस्थित ही नहीं था और न ही उसे उस घटना का कोई क्षोभ था।
कुछ देर बाद उसकी दृष्टि अपने पति की दृष्टि से जा मिली जो न जाने कबसे उसकी ओर आँखें तरेर कर कुछ कहने का मौन प्रयास कर रहे थे।उनकी आँखों में अजीब क्रोध उमड़ा हुआ था ,उसने अपनी नजरें घुमा लीं । उसकी आँखों में अपमान का पानी उतर आया था।
कुछ देर बाद गाड़ी को झटके लगने शुरू हो गए थे और चारों लड़कों को सहमी हुई लड़कियों पर गिरने-पड़ने का और भी शुभ अवसर मिल गया था।उनकी हरकतों से यात्रियों की नजरों में लज्जा तथा हिकारत स्पष्ट दिखाई दे रही थी पर मुख में न तो जबान थी और न ही शरीरों में हरकत ! उसे लगा वह किसी मुर्दाघर में साँस ले रही है।पटरी बदलती हुई गाड़ी की 'छुकर-छुकर' प्लेटफार्म के शोर में समाने लगी थी।कर्नाटक के किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकने को थी । बाहर से 'मेंदुवड़ा ','इडली',चाय -कॉफी का शोर डिब्बे में भरने लगा था।परन्तु गाड़ी की रफ्तार अभी बहुत कम नहीं हुई थी । लडकियाँ लड़कों लगभग धक्का देते हुए कम्पार्टमेंट के दरवाजे की ओर बढ़ रही थीं।पीछे -पीछे लड़कों का दल भी ठहाके लगता हुआ भीड़ में से निकलने की चेष्टा करते हुए उन लड़कियों के समीप जाने की चेष्टा कर रहा था।अचानक दोनों लड़कियों में से एक के पैर में पीछे चलते हुई लड़कों में से किसी ने अडंगी लगाईं और लड़की डिब्बे में से निकलते हुई उछलकर प्लेटफार्म पर जा पड़ी । अब कम्पार्टमेंट के मुर्दाघर में हलचल होने लगी थी और बैठे हुए यात्री ऊंचे हो-होकर लंबी साँसे भरते हुए खिड़कियों से बाहर की ओर एक-दूसरे को धक्का-मुक्की करते हुए दुर्घटना के बारे में जानने की चेष्टा करने लगे थे।
बाहर प्लेटफार्म पर भीड़ एकत्रित हो चुकी थी और वहाँ लोगों की सरगर्मी बढ़ने लगी थी।लड़की को संभालने वाले कितने ही लोग एकत्रित हो चुके थे और हाथ बढ़ाकर उसे उठाने की चेष्टा में संलग्न थे । उसके साथ वाली लड़की भीड़ के पीछे छिप सी गई थी। अचानक चारों लड़के एक दिशा की ओर सरपट भागते नज़र आये।वहीं पर दो पुलिस वाले भी खड़े थे जो लड़कों के पीछे भागे।कुछ मिनटों के बाद गाड़ी ने सीटी दी और पूरी प्रकार घटना का आँखों देखा हाल जाने बिना ही सब यात्रियों को अपनी-अपनी 'बर्थ' पर समा जाना पड़ा।उसने कनखियों से अपने पति की ओर देखा था जो उचक-उचककर बाहर का हाल जानने की चेष्टा कर रहे थे।संभवत: वे उन बदमाश लड़कों के बारे में जानना चाहते थे।कुछ देर बाद गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली और लोगों में हलचल शुरू हो गई जैसे वे किसी कैदखाने से छूटकर आए हों।अब पति की आँखों के प्रश्न उनके मुख से बाहर निकलने लगे थे ।
"तुम चुप नहीं रह सकती थीं ?" वे क्रोध में थे ,उनकी दृष्टि चुगली खा रही थी ।
"तुम कैसे रह सके चुप?" उसने पति के प्रश्न का उत्तर प्रश्न परोसकर दिया ।
"किसी दिन मरवाओगी बिना बात ही,शांत तो रह ही नहीं सकती तुम ------!" उन्होंने भुनभुनाकर कहा।
कैसे रह सकती थी वह चुप?उसकी अपनी बेटी की उम्र की थीं वो लड़कियाँ !क्या सदा चुप रह जाना किसी भी भयानक समस्या का समाधान निकला है?शांत रहने का समय था क्या वह? कोई एक आवाज़ तो उठती!
" मैं तो सोच रही हूँ तुम कैसे रह पाए शांत ?'न चाहते हुए भी उसके मुह से दूसरी बार निकल ही तो गया।
" तो क्या करता ---? बहादुरी वहाँ दिखाई जाती है जहाँ ज़रुरत हो ---तुम तो हर जगह बाहें चढ़ाकर तैयार हो जाती हो ---हद है ---बहुत पढ़े-लिखे होने का घमंड है तुम्हें---"उन्होंने यह कहते हुए एक हिकारत भरी नज़र उस पर फैंकी और उसे सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि हाल में घटी हुई घटना और अधिक पढ़े-लिखे में कहाँ साम्य था ?
सरेआम उसकी शिक्षा को चुनौती मिल गई थी,यूं तो अक्सर मिलती ही रहती है पर अब आदत पड़ चुकी थी सो----- । उसकी आँखें परनाला हो आईं । अगल-बगल बैठे उसके रिश्तों ने भी उससे सहानुभूति दिखाने की कोई कोशिश तक नहीं की । वह अपना चेहरा घुमाकर फफकती रही मानो अपने भीतर के सारे कचरे को आँखों के रास्ते बाहर निकालकर फेंक देना चाहती हो ।
" अमको भी अच्चा नईं लगता है दीदी --वो लोग तो गुंडे हैं ।अम तो रोज़ उनको देकता है ,वो किसी का बी इन्सल्ट कर सकता है--और --वो लडकियाँ!" "उसके पति के पास बैठे हुए एक कन्नड़भाषी ने उसे सांत्वना देने का टूटा-फूटा प्रयत्न किया।
'हाँ, आज भी सब वही न--'उसके मन ने सोचा । लडकियाँ तो कभी ठीक हो ही नहीं सकतीं --जो कुछ भी है शायद उसी में निहित है कि लडकियाँ होती ही क्यों हैं ?पर मूर्ख तुम कहाँ से टपक गए हो?'
पर--वह बोली कुछ नहीं --हाँ, उस आदमी की बातों पर ध्यान देने के लिए उसकी सुबकियाँ रुक गईं मगर अपने बहते आंसुओं पर वह कोई बाँध न लगा सकी।सामने वाले यात्री ने कुछ इस प्रकार बताया था कि इस ट्रेन में हर रोज़ ही यह नाटक होता रहता है एक बार किसी भले आदमी ने लड़कों को रोकने का प्रयास भी किया था पर उन अभद्र लडकों ने उसे ही पीट डाला । पुलिस भी उनसे मिली रहती है ,पीछे भागने का तो बहाना भर होता है । ये लडकियाँ भी हर रोज़ इसी ट्रेन में जाती हैं और ये लडके भी । दो वर्ष से तो वह स्वयं भी देख रहा है,वह दूसरे शहर नौकरी करने जाता है न ! ---अगर लड़कियों को कोई ऐतराज़ होता तो वे किसी न किसी प्रकार अपना समय बदलतीं या कुछ और उपाय भी कर सकती थीं।इनकी यह यात्रा लगभग एक घंटे की होती है और ये सब लोग आरक्षित कूपे में चढ़कर उत्पात मचाते रहते हैं ।अब उसे भी लगा हाँ,लडकियाँ कुछ और उपाय क्यों नहीं सोच सकती थीं ? उसे अपना चेहरा पिटा हुआ सा लगने लगा।अब तक उसके आंसू बंद हो चुके थे और वह आँखें फाड़े उस सहयात्री की सब बातें सुन रही थी।
"टेक इट इज़ी दीदी -----दिस इज लाइफ़ ---ऑल द बेस्ट -----"सहयात्री का स्टेशन आ गया था और वह उतरने की तैय्यारी करने लगा था।
गाड़ी की रफ्तार धीमी होती जा रही थी ,वह यात्री उसके पति से हाथ मिलाकर अब कम्पार्टमेंट के दरवाजे की ओर बढ़ रहा था।उसने मुस्कुराते हुए उसकी ओर भी अपने दोनों हाथ जोड़े थे ,नमस्कार की मुद्रा में । असभ्यता के तमगे से बचने के लिए उसने उतरने वाले यात्री की ओर धन्यवाद के रूप में एक झीनी मुस्कान पहुंचा दी थी।वह इतनी मायूस हो चुकी थी कि उसके मन के भाव पुर्जा-पुर्जा होकर उसके सामने उड़ने लगे थे और वह अपने अनदेखे मन को पहचानने का प्रयास करने की चेष्टा में पसीने से तरबतर हुई जा रही थी ।कभी-कभी उसे अपने ऊपर बहुत तरस आता है जब वह एक शिक्षित महिला होने का अपना कर्तव्य नहीं निभा पाती है।उसका मन उसे कोसता है क्या केवल कॉलेज की चारदीवारी में सिमटकर रह जाने के लिए ही उसने इतनी शिक्षा प्राप्त की थी ?इस समाज के प्रति उसका कोई कर्तव्य नहीं था?
Dr.Pranava Bharti
pranavabharti@gmail.com