इनाम
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बहते हुए पानी में जैसे कोई छोटा बच्चा कागज़ की नाव चला दे, कुछ ऐसे ही उसने अपने जीवन की नाव को जीवन के समुद्र में बहने के लिए छोड़ दिया ।आख़िर कब तक लड़ सकता है कोई ? वैसे ही न जाने हर आदमी में कितने युद्ध भीतर ही भीतर चलते रहते हैं ! कोई न कोई परेशानी चुंबक बनी खींचती ही रहती है, न खींचे तो वह पुकारता है 'आ बैल ! मुझे मार ! '
ज़िंदगी कुछ लम्हों का नाम है या एक पल का या फिर एक युग का ,यह ज़िंदगी की क्वॉलिटी पर निर्भर करता है क्योंकि ऐसा तो होता ही नहीं कि हर आदमी की ज़िंदगी एक सी ही पटरी पर चलती है| मज़ेदार बात तो यह है ज़िंदगी की कि हर आदमी के लिए अलग-अलग पटरियाँ बनी हुई हैं और उसे उन पर ही चलना होता है किसी दूसरे के लिए बनाई गई पटरी पर तो वह चल ही नहीं सकता | अब इसे भाग्य कह लें या कुछ भी नाम दे लें ,क्या फ़र्क पड़ता है !
नाम की वंदना पर भाग्य की वेदना ! किस किस कोने में से निकल आती थी वेदना उसके लिए कि वह ताकती रह जाती और उसके भाग्य की पटरी पर वेदना आकर सो जाती | कितना छुड़ाती वह वेदना को लेकिन वह वंदना के चिपक ही तो जाती ,आख़िर वेदना को ही चिपकाए वंदना ने सारी ज़िंदगी गुज़ार दी ,गुज़ार क्या दी ,गुज़ारनी पड़ी | चॉयस थोड़े ही मिलती है किसी को इस दुनिया में ! हाँ, शायद एकाध अवसर मिलता है पर साहस न हुआ तो ठुस्स होकर रह जाना पड़ता है | वंदना ,उस ज़माने की लखपति पिता की एकमात्र लाड़ली संतान ब्याहकर आई एक ठेठ गाँव में ! ज़रुरत नहीं थी इसकी ,पिता इतने समर्थ थे कि पूरा गाँव ही खरीद लेते किन्तु भाग्य तो वंदना का था और उसे अपने जीवन की पटरियों पर ही अपने जीवन की रेल चलानी थी |
वंदना का ज़माना कोई आज का ज़माना तो था नहीं कि कुछ विरोध भी किया जाता | वंदना के पिता दिल्ली के अंग्रेज़ों के ज़माने के लखपति थे ,उनकी अंग्रेज़ों से खूब मित्रता और उन पर अंग्रेज़ी के वर्चस्व के कारण वंदना की माँ को पति के साथ उनके अंग्रेज़ मित्रों के साथ जाना पड़ता | बेशक वंदना की माँ की कार में पर्दे लगे रहते किन्तु जानकी देवी पर्दे वाली कार में भी अपनी साड़ी के ऊपर एक दुपट्टे से घूँघट सा करके चलतीं ,उनके पति खूब कुढ़ते लेकिन अपनी हवेली से जब वे कार में बैठतीं तब तो उनकी मंहगी बनारसी या कमखाबी साड़ी पर गोटे लगा हुआ एक दुपट्टा ज़रूर होता बेशक अपने घर से दूर आकर वे अपने उस दुपट्टे को गाड़ी में ही छोड़ देतीं और फिर पति के साथ जहाँ भी जाना होता जातीं |
अंग्रेज़ दोस्तों से खूब चिढ़तीं वंदना की माँ,क्या है ! कहीं भी चूमा चाटी करने बैठ जाते हैं !बेशर्म कहीं के ! जानती थीं पति का बस चलता तो उन्हें भी उसी बहाव में ले जाते वे पर उनके सामने दाल न गलती थी उनकी | सो,उनके साथ पत्नी बाहर जाने के लिए तैयार हो जाती हैं ,वो इसमें ही खुश हो जाते और पत्नी को अपने साथ चलने के लिए पटाते रहते |काफ़ी शौकीन मिज़ाज़ के वंदना के पिता परिवार की संस्था में विश्वास करते अत: कई बच्चों को खोने के बाद जीवित संतान वंदना को उन्होंने लड़कों से अधिक स्वतंत्रता दी थी ,उस ज़माने में खूब पढ़ाया-लिखाया ,यहाँ तक कि अंग्रेज़ी के अध्यापक से अंग्रेज़ी सिखवाई |
उनकी इच्छा थी कि वंदना अंग्रेज़ी पढ़े किन्तु वंदना संस्कृत की ओर ही झुकी रही और उसने संस्कृत में शास्त्री पास किया | उसके पिता नरेंद्र मोहन शर्मा ने उसे गुरु जी व लड़कों के साथ बनारस परीक्षा दिलवाने भेज दिया था | वंदना की माँ को तो इसमें भी बहुत आपत्ति थी किन्तु उन्हें चुप रह जाना पड़ा | न तो वे स्वयं न ही उनकी बिटिया वंदना घर के स्वामी के अनुसार पूर्ण रूप से चल पा रहे थे |माँ-बेटी दोनों को भारतीय संस्कृति से प्रेम था और गर्व भी |
शर्मा जी ने अपनी बेटी वंदना को कई ऐसे गाऊन लेकर दिए थे जैसे उनके अंग्रेज़ मित्रों की पत्नियाँ पहनती थीं ,उनकी पत्नी कभी ऐसे गाऊन की ओर आँख भी उठाकर देखेंगी ,इसका तो उन्हें पूरा इल्म था , बिटिया को वे ज़रूर पटा लेने की कोशिश में लगे रहते पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी अत: वे चुप लगा गए थे और समय जैसा बह रहा था ,उसके साथ ही ख़ुद भी बहने लगे थे |
शास्त्री की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने पर अब वंदना के लिए सजातीय वर तलाश करने में वंदना के पिता के पसीने छूट गए | शास्त्री पास कन्या के लिए वर भी तो उससे अधिक शिक्षित चाहिए था , साथ ही ऐसा भी कि उनके विभिन्न व्यवसायों को भी संभाल सके| खैर जो होना था ,जैसे होना था ---उन्हें एक युवक मिला जो अपने गाँव से सौतेली माँ के कारण भाग आया था और दिल्ली में रहकर अंग्रेज़ी में एम. ए कर रहा था | बस वंदना के लिए तो वर जैसे लपक लिया उन्होंने ! ट्यूशन करके अपनी शिक्षा का खर्चा निकालने वाले युवक को उन्होंने जैसे अपने बड़े से व्यक्तित्व के नीचे दबोच ही तो लिया था |
उन्होंने उस बुद्धिशाली लड़के को अपने घर के दामाद के रूप में चुनकर उसके लिए एक ऐसा कमरा लिया जिसमें उन्होंने सारी सुविधाएं उपलब्ध करवा दीं | बिना घर-बार के लड़के के रातों रात ठाठ बन गए ,उसकी शिक्षा के प्रति रूचि के कारण ! शर्मा जी बड़े प्रसन्न थे ,प्रसन्न वंदना की माँ जानकी देवी भी थीं पर उन्हें इस बात की बड़ी चिंता व नाराज़गी थी कि उनकी लड़की को कम से कम एक बार तो ब्याह करके ठेठ गाँव में जाना पड़ेगा और उस माँ के साथ रहना पड़ेगा जिसको उनका दामाद खराब व्यवहार के कारण छोड़ आया था,उसका घर-बार छूट गया था उससे !पर अगर घर-बार न छूटता तो वह उन्हें कैसे मिलता ? यह भी तो सोचने की बात थी |
मनुष्य का भाग्य सुनिश्चित होता है ,कितना भी इधर-उधर ढ़केल दो ,वो लुढ़ककर उसीके पास चला आता है जिसके हिस्से का होता है | वंदना को न तो कुछ कहना था ,न उसका साहस ही था कुछ कहने का और जिससे उसका ब्याह होने वाला था वह लड़का मदन अपना विवाह गाँव से ही करना चाहता था सो शर्मा जी मयपत्नी एक बार लड़के को साथ लेजाकर गाँव में उसके परिवार के लोगों से मिलकर आ गए थे | जानते ही थे कि परिवार उनकी बेटी के ज़रा सा भी योग्य नहीं था परन्तु लड़के की शिक्षा के प्रति रूचि ने उनके आँख-नाक बंद कर दिए थे |
"चलो ,कुछ दिनों की तो बात है ,कौनसा वंदना को वहीं रहना है ---" वंदना के पिता स्वयं को ,अपनी पत्नी को व बिटिया को दिलासा देते रहे |
गाँव में उन्होंने पूरा घर ही भर दिया था ,इतना कुछ पहुँचा दिया था | उन्हें पूरी उम्मीद थी कि यदि एकाध महीने उनकी बेटी को उन लोगों के साथ रहना भी पड़ा तो कोई अधिक परेशानी नहीं होगी | वैसे भी वंदना सच में ही वंदन के काबिल थी ,उस ज़माने में वैसे भी कहाँ लड़कियों की आवाज़ निकलती थी और वंदना तो न जाने कितने बच्चों में ,न जाने कितनी प्रार्थनाओं से उनकी झोली में आई बच्ची थी जिसके माँ-पिता के प्राण उसमें बसते थे |
समय पर वंदना का विवाह हो गया ,बारात का सारा खर्चा वंदना के पिता ने ही किया था |कोई कमी होने का कोई न तो कारण था और न ही कोई आधार ! बस एक बात थी कि वंदना को माह में दो-तीन बार चक्कर काटने थे अपनी ससुराल के ! जिसका सारा इंतज़ाम पिता ने कर रखा था | यहाँ तककि वंदना की आया को भी उसके साथ गाँव में भेजा गया था | परिवार के लोग उस आया से उम्मीद करते कि वो उनके बर्तन-भांडे मांजे किन्तु वह शक्य न था | उस आया ने साफ़ अंगूठा दिखा दिया था और धमकी भी दे डाली थी कि वो वंदना का काम करने के लिए है ,उससे कोई अपेक्षा न रखी जाए | सब सहम गए थे ---कहीं शर्मा जी को न पता चल जाए ,सब उसकी लल्लो-चप्पो करने लगे थे |
दो बार तो सब ठीक ही रहा ,वंदना ने भी कोशिश की कि सबको आदर व स्नेह दे सके और वह इस प्रयास में सफ़ल भी हो रही थी|हर बार सबके लिए उपहार भेजे जाते जबकि यह उनकी आदत में शुमार होता जा रहा था | छोटे दोनों सौतेले देवर उसके चारों ओर चक्कर काटने लगे थे | वंदना से ऎसी बातें सुनने में उन्हें बड़ा आनंद आने लगा था जो उन्हें किसी सपने जैसी लगती थीं |घर के पीछे वाले घर में रहने वाले चचिया श्वसुर की दो बिन ब्याही बेटियाँ उसके आगे-पीछे घूमती रहतीं |
सच तो यह था कि वंदना को इन सब लोगों के साथ मज़ा आने लगा था ,कैसे घेरकर बैठ जाते थे सब लोग उसे और वह बहुत कम बोलने वाली लड़की उन बच्चों के बीच रहकर बोलना सीखने लगी थी ,अपने घर की कहानियाँ सुना-सुनाकर ! वंदना ठठाकर हँसने लगती जब उसकी वे ननदें उसके सामने अपनी ऊँगली करती हुई कहतीं ;
"भाभी ,वो बीट वाला मंजन दो न---" पहले तो उसे कुछ समझ में ही नहीं आया था पर बाद में जब आया ने हँसते हुए समझाया था तब उसने आया से कहा था कि वह इस बार दिल्ली से उनके लिए पेस्ट की ट्यूब लाकर उन्हें दे दे |
उस दिन काफ़ी खुशनुमा सुबह थी ,बच्चे वंदना को खेतों में घुमाकर लाए थे | शर्मा जी ने बिटिया के लिए ड्राइवर सहित एक गाड़ी छोड़ रखी थी सो सारे उसमें लदकर घूमने निकल जाते | बस ,दादी ही ऐंठी रहती थीं ,उन्हें कहाँ पसंद था छोरियों का ऐसे घूमना ! उन्हें लगता कि यह पढ़ी-लिखी बहू उनके बच्चों को बिगाड़कर ही दम लेगी | पर इस रईस बाप की बेटी जिसने उनका घर दहेज़ से भर दिया था ,उसके सामने उनका कुछ कहाँ चलता था ? उस दिन जब सब खेतों से लौटे ,सब बड़े खुश थे | वंदना चहक रही थी |
"अरी ओ दिल्ली वाली !---" दादी वंदना को इसी तरह पुकारतीं |
"जी ---" वंदना ने बड़े अदब से उनकी बात का उत्तर दिया |
" सबको तो खुस कर देवै ,हमसे ही ना बात करे हैगी ---"
"जी,कहिए ----"
"पढ़ी-लिखी बहू हैगी तो हमारा तो कुछ काम न करके दिया हैगा तूने ?"दादी जैसे शिकायत का पोटला खोलकर बैठने की कोशिश कर रही थीं |
" आप कहिए तो दादी जी,बताइए आपके लिए क्या करूँ ?"वंदना ने मुस्कुराते हुए पूछा |
" ले,हमारी चिट्ठी ही लिख दे ,हम तो इसमें ही खुस हो जावेंगे ---"कितना-कितना तो देकर गए थे शर्मा जी ,घर की सबसे बड़ी महिला को | क्या खूबसूरत साड़ियाँ भिजवाईं थीं उन्होंने उनके लिए |खूब भारी सा सोने का हार ,कर्णफूल ,पौहंची उनके लिए गड़वाई थीं उन्होंने पर दादी माँ की लालसा बढ़ी ही जा रही थी|
"हाँ,जी लिख देती हूँ ---" वंदना ने हँसते हुए अपनी रज़ामंदी दिखाई |
आनन-फ़ानन में कलम-दवात मंगवाई गई और एक पोस्टकार्ड वंदना को थमा दिया गया | अब दादी बोल रही थीं और वंदना मोती से अक्षरों में उनकी संवेदनाएं उनके भैया के प्रति कलमबद्ध कर रही थी | यूँ तो दादी का सारा काम घर के बच्चे करते थे पर शायद दादी बहू की परीक्षा लेने के भयंकर मूड में थीं |
वंदना ने सुंदर शब्दों में चिट्ठी लिखकर दादी के हाथ में पकड़ा दी | दादी की आँखों की चमक वंदना की आँखों में पहुँची और उसने बड़े ही कोमल सुर में दादी को खुश करने के लिए कहा ;
"दादी जी ,अब इनाम दीजिए -" वंदना ने अपनी कोमल ,नाज़ुक सी हथेली दादी के आगे कर दी |
दादी की आँखों में अचानक चमक भर गई ,उन्होंने अपने मुँह में भरे हुए थूक को वंदना की नाज़ुक हथेली पर थूक दिया |
"ले इनाम ! तू भी क्या याद रखेगी " और सबके सामने ठठाकर हँस पड़ीं |
वहाँ खड़े सब लोग दादी की इस हरकत से सकते में आ गए ,आया की आँखों में वितृष्णा भर उठी और वंदना की आँखों में अपमान और असहायता के आँसू ! आख़िर दादी उससे कौनसा बदला ले रही थीं | दादी की आँखों में न जाने कौनसी जलन भभक रही थी। वंदना के साथ सभी तो हकबके रह गए थे |किसीको समझ ही नहीं आ रहा था और आया ---उसकी आँखें तो खून से भर आई थीं , उसका मन हो रहा था वह अभी दादी का मर्डर कर देगी |
वंदना अपनी हथेली पर पड़े हुए उस थूक के थक्के को घूरती रह गई ,अचानक उसकी आँखों से भरभराकर आँसुओं का सैलाब झरने सा झर-झर बहने लगा ,इतनी वितृष्णा हुई ,लगा हाथ काटकर फेंक दे | माँ के घर में जिस नज़ाकत से उसने जीवन गुज़ारा था ,उसका सौवाँ हिस्सा भी उसे मिलता तो वह नाच उठती लेकिन इस गंदी पीड़ा से उसका दिल भन्ना उठा और क्षण भर में उसने न जाने क्या-क्या सोच डाला , वहाँ से निकलने का मन बनाने लगी वह ! लेकिन कहाँ और कैसे ? उसके संस्कार उसके आड़े आकर खड़े हो गए और वह सोचने लगी कि विधाता ने उसके जीवन को चलने के लिए जो पटरियाँ दी हैं उसे कहीं तो उनमें फेर-बदल करना होगा !!
डॉ.प्रणव भारती
pranavabharti@gmail.com
डॉ.प्रणव भारती