Dani ki kahani - 3 in Hindi Children Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | दानी की कहानी - 3

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दानी की कहानी - 3

आप झूठ क्यों बोले ?(दानी की कहानी )

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दानी की एक चचेरी बहन थीं शीलो जीजी (दीदी )जिनकी उम्र दानी की मम्मी के बराबर थी और बच्चे दानी से कोई छोटा ,कोई बड़ा |

जिनके बच्चों की दानी से प्रगाढ़ मित्रता थी यानि शैतानी वाली दोस्ती !

उनके घर भी आसपास थे अत: दानी उन बच्चों की मौसी होते हुए भी दोस्त अधिक थीं |

दानी अपनी बहन के बच्चों के साथ खूब उधम मचाती थीं |

जीजी के पति यानि दानी के जीजा जी कस्टम में कमिश्नर थे | भारी रौब-दाब !

हाँ ,उन दिनों ऐसे पदों पर बैठे हुए अधिकारियों का खूब रौब-दाब रहता था |

सरकारी गाड़ी ,सरकारी बावर्ची ,सरकारी ड्राइवर !

दो-चार लोग तो होते ही दिन भर काम करने के लिए यानि मज़े ही मज़े !

जो सरकारी न होते वो अफ़सर के रौब में वैसे ही उनके काम करते रहते |

उनके पास खूब गिफ्ट्स भी आया करते थे | दानी अक़्सर उनके यहाँ नई-नई चीज़ें देखतीं |

एक बार एक गलीचे वाला आया ,दानी की जीजी ने उसे घर के आँगन में बुला लिया और मोल-भाव करने लगीं |

गलीचे बेचने वाले ने पंद्रह सौ रूपये से बात शुरू की थी लेकिन अंत में साढ़े नौ सौ में गलीचा दे गया |

दानी की जीजी ने सब बच्चों की राय ली थी कि गलीचा कैसा लग रहा है ? दानी भी उन्हीं बच्चों में थीं |

दानी ने सारा मोलभाव देखा था ,उस समय उनकी उम्र लगभग दस वर्ष की रही होगी |

घर में हर समय रहने वाले सेवक मांडूराम राम के साथ मिलकर सब बच्चों ने बैठक(ड्रॉइंग-रूम ) में गलीचा बिछवाया |

सबको उस पर बैठकर बड़ा मज़ा आ रहा था ,फूलों वाला गलीचा सुन्दर होने के साथ ही गुदगुदा भी था |

प्रोग्राम बना उस दिन वहीं बैठकर कैरम खेला जाएगा,न जाने कब से कैरम खेला ही नहीं था बच्चों ने ,उस दिन गलीचे पर बैठने के लोभ में कैरम भी खेला जाएगा |

बच्चों की मम्मी यानि दानी की जीजी खुश थीं ,बच्चे न, जाने कितना सामान मँगवाकर घर में जमा कर लेते पर दो दिन बाद ऊब जाते |

चलो,इस बहाने निकालेंगे तो कैरमबोर्ड को !जीजी व जीजा जी ने सोचा |

मांडूराम से कहा गया कि स्टोर-रूम से कैरमबोर्ड निकाल लाएँ| बड़ी उम्र का बंदा था मांडूराम इसलिए उन्हें मांडू काका कहा जाता |

अभी मांडूराम स्टोर की तरफ़ जा ही रहा था कि किसीने गेट की घंटी बजा दी | स्टोर में जाने की जगह मांडूराम गेट खोलने पहुँच गया |

"आइये ---" गेट खोलते ही मांडूराम ने श्रीमती वर्मा को नमस्ते की और अंदर की ओर जीजी को बताने आए |

मांडूराम के पीछे-पीछे श्रीमती वर्मा भी अंदर आ गईं थीं | अभी तक सब वहीं खड़े गलीचे को देखकर खुश हो रहे थे |

श्रीमती वर्मा को देखकर जीजी ने उनका स्वागत किया |

अंदर आते ही श्रीमती वर्मा का ध्यान नए गलीचे पर पड़ा |

"बड़ा खूबसूरत है ,कहाँ से लिया ?" उनके मन में जानने कि इच्छा बलवती हो गई |

"अरे ! अभी ख़रीदा है ,थोड़ी देर पहले ही ---" श्रीमती वर्मा की आँखों में जिज्ञासा इसलिए अधिक थी ,शायद कहीं से गिफ़्ट मिल गया हो |

"बड़ा सुन्दर है ,कितने का ख़रीदा ?"उन्होंने तुरंत दूसरा प्रश्न दाग दिया |

"अरे मिसेज़ वर्मा ! वैलकम ---साब कहाँ रह गए ?"दानी के जीजा जी अचानक आकर बोले |

"अभी आ रहे हैं ,बस बाहर ही हैं ----"

जीजी समझ गईं ,बच्चों के लिए कुछ मिठाई-विठाई खरीदने हलवाई की दुकान पर गए होंगे |

पाँच/सात मिनट बाद बाहर गाड़ी रुकने की आवाज़ आई और कुछ सेकेंड्स में वर्मा साहब बैठक में तशरीफ़ ले आए |

"अरे वाह! क्या कार्पेट है साहब ---कितने का ख़रीदा ----?" उन्होंने जीजी को मिठाई का डिब्बा पकड़ाते हुए बैठने से पहले ही यह प्रश्न दाग दिया |

"अरे साब ! आइए ,बैठिए तो सही ---" जीजा जी ने उठकर उनका स्वागत किया |

दानी की जीजी मिठाई का डिब्बा हाथ में पकड़े अंदर की तरफ़ जाने लगीं ,उन्हें मेहमानों के लिए रसोईघर में कुछ तैयारी करवानी थी |

सरे बच्चे मिठाई के लोभ में उनके पीछे चलने को तत्पर हो गए कि दानी के कानों में फिर से आवाज़ आई |

"अरे यार ! बताइए भी कितने का लिया कार्पेट ---मैं तो लट्टू हो गया हूँ |"

"यही कोई हज़ार रूपये का ----" दानी के जीजा जी ने बड़े गर्व से कहा | उस समय हज़ार रुपए बड़ी बात होती थी |

दानी कमरे से बाहर निकल ही रहीं थी,जीजा जी की आवाज़ सुनकर अंदर आ गईं |

" जीजा ! जी आप झूठ क्यों बोले ?" बच्ची ने तुरंत विरोध किया |

" क्या झूठ बोला मैं बेटा?" वो चौंक गए थे |

"यही कि ये कार्पेट हज़ार रुपए का है ,अभी तो जीजी ने साढ़े नौ सौ में ख़रीदा है इसे |"

दानी की आवाज़ सुनकर जो लोग कमरे से बाहर निकल चुके थे ,वो फिर अंदर आ गए |

" सब बड़े एकसे ही होते हैं,हमें सिखाते हैं सच बोलना चाहिए ,खुद झूठ बोलते हैं ---"दानी नाराज़ थीं |

"सॉरी ---सॉरी बेटा ! --हाँ जी वर्मा जी ,साढ़े नौसौ का है ये कार्पेट ---"

और तो सब ठीक लेकिन दानी की बात से वर्मा जी आश्वस्त हो गए थे कि वह गलीचा गिफ़्ट में नहीं आया था |

डॉ.प्रणव भारती