ध्वनि:अंतश्चेतना के बोध

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बैंगलोर, एक ऐसा शहर जो कभी पूरी तरह सोता नहीं है। दूर सड़क पर किसी ट्रक के चलने की आवाज़ और बीच-बीच में कुत्तों के भौंकने को छोड़ दें, तो उस मोहल्ले में गहरा सन्नाटा पसरा था। अपने कमरे में श्राव्या गहरी नींद में थी। खिड़की के पर्दों की दरारों से स्ट्रीट लाइट की धुंधली रोशनी कमरे में घुसकर फर्श पर अजीबोगरीब परछाइयां बना रही थी। पास की मेज पर रखी डिजिटल घड़ी में लाल रंग के नंबर चमक रहे थे: 3:23. अचानक श्राव्या की नींद खुल गई। लेकिन, यह कोई सामान्य जागना नहीं था। उसकी पलकें अभी भी बंद थीं। लेकिन उसका दिमाग पूरी तरह से जाग चुका था। यहाँ तक कि कमरे में पंखे के चलने की आवाज़, दीवार घड़ी की 'टिक-टिक' सब कुछ स्पष्ट सुनाई दे रहा था। "उठो श्राव्या," उसने खुद को आदेश दिया।

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ध्वनि:अंतश्चेतना के बोध - 1

बैंगलोर, एक ऐसा शहर जो कभी पूरी तरह सोता नहीं है। दूर सड़क पर किसी ट्रक के चलने की और बीच-बीच में कुत्तों के भौंकने को छोड़ दें, तो उस मोहल्ले में गहरा सन्नाटा पसरा था।अपने कमरे में श्राव्या गहरी नींद में थी। खिड़की के पर्दों की दरारों से स्ट्रीट लाइट की धुंधली रोशनी कमरे में घुसकर फर्श पर अजीबोगरीब परछाइयां बना रही थी। पास की मेज पर रखी डिजिटल घड़ी में लाल रंग के नंबर चमक रहे थे: 3:23.अचानक श्राव्या की नींद खुल गई। लेकिन, यह कोई सामान्य जागना नहीं था।उसकी पलकें अभी भी बंद थीं। लेकिन उसका ...Read More