मैं भी इंसान हूँ..." 🌧️🕊️
हर रोज़ मुस्कुराता हूँ, पर कभी-कभी रोता भी हूँ,
भीड़ में सबसे मिलता हूँ, पर अंदर से खोता भी हूँ।
हर चेहरे पे हँसी बाँटता हूँ,
पर अपने ग़म किसी से नहीं कहता,
क्योंकि मैंने सीखा है —
हर सवाल का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता।
मैं पत्थर नहीं…
जो ठोकरें खा के भी आवाज़ न करे,
मैं भी इंसान हूँ…
जो कभी-कभी टूटकर खुद से ही माफ़ी माँग ले।
कभी किसी की जीत में तालियाँ बजाईं,
तो कभी खुद की हार पे चुपचाप सिर झुकाया।
मैंने रिश्तों को बचाने में खुद को खोया,
पर कभी किसी को ये एहसास तक नहीं होने दिया।
लोग कहते हैं —
"तू तो मजबूत है यार..."
पर कोई नहीं जानता —
मजबूती की इस दीवार के पीछे
एक थका हुआ दिल हर रात बिखरता है।
मैं दिखता हूँ शांत समंदर सा,
पर अंदर ज्वार उठते हैं — रोज़… हर लम्हा।
कभी-कभी जी चाहता है —
कि कोई पूछे...
"तू ठीक तो है ना?"
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