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नॉन रेजिडेंट बिहारी एक अच्छी पुस्तक है| यूपीएससी के ख्वाबों और माता पिता की उम्मीदों के बीच लेखक की शालू के साथ की प्रेम कहानी भी है| अगर आपने कभी प्रेम नही किया है तब भी पढ़ सकते है, उम्मीद है कि प्रेम करना सीख जाएंगे| कभी सिनेमा छोड़ कर किताब भी पढ़ लीजिये| कटिहार ज़िले का रहने वाला है लेखक| हमेशा किताब पढ़ने के लिए मत खरीदिये, कभी कभी लेखकों का हौंसला अफ़ज़ाई के लिए भी खरीद लीजिए|
पटना जंक्शन पर दोनों की आँखे नम हो चुकी थी| लड़का अपने शहर आने को उतावला था| मगर उसकी प्रेमीका चाहती थी कि कुछ दिन और ठहर जाए| साथ में आई सहेली भी बार बार फटकार दे रही थी 'अब चलो भी'| आस पास के लोग दोनो को ऐसे घुर् रहे थे जैसे परीक्षा देते हुए हम सब निरीक्षक को शुरुआत में घुरते हैं| आप भी घुरते होंगे| नहीं घुरते क्या| ठीक से याद कीजिये, घुरते ही होंगे| सम्पूर्ण क्रांति रेलगाड़ी का वक़्त हो चुका था| लड़का अपनी प्रेमीका के आत्मविश्वास को वापस लाने के लिए कहता है उदास मत हो बाबा| उदासी खूबसुरत नही होती है बाबु मोसाए | लड़की अपनी प्रेमी का हाथ ज़ोर से पकड़ लेती है और तभी गन्ने वाले भैय्या कुमार सानु की 'प्रेमी आशिक़ आवारा' गाना चला देते है | मौसम में बहार आ जाती है| लड़का हाथ ढीला कर के यह संकेत देना चाहता है कि अब लेट हो रहा है नही तो ट्रैन छूट जाएगी| प्रेमीका बहुत सहज कर पूछती है कुछ छूटा तो नही| लड़का कहता है हां छूटा है मगर नही ले जा सकता| कुछ थम कर लड़का कहता है यादें जो मेरे इश्क़ के शहर (पटना) में कैद है| और यह कह कर लड़का सम्पूर्ण क्रांति की बोगी नम्बर यस7 के सीट नम्बर 22 में अपनी नम आंखों, पटना ज़ू, इको पार्क , बुद्धा स्मृति पार्क, गांधी मैदान, डोमिनोज़ औऱ मोना सिनेमा हॉल के कुछ लम्हों के साथ बैठ जाता है|
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