अनकहा बोझ
एक वजन है जो सीने में दबा रहता है,
एक दरिया है जो चुपचाप बहा करता है।
होंठ मुस्कुराते हैं ज़माने के सामने,
पर भीतर कोई हर पल ढहा करता है।
शब्द कम पड़ जाते हैं उस दर्द के आगे,
जो रूह को धीरे-धीरे जकड़ता है।
पूछता है कोई हाल तो कह देते हैं 'ठीक हूँ',
पर वो 'ठीक' न होना, बस दिल समझता है।
आँखों के कोनों में सूखा है जो अश्क,
वो कहानी अपनी जुबां से कह नहीं पाता।
भारी है यह खामोशी लोहे के मानिंद,
जिसे उठा तो लेते हैं, पर सहा नहीं जाता।
- Fictional world