सीने में सजाकर के, जगता मैं सोता हूं,
आती हैं जब यादें ,घुट-घुट के रोता हूँ......
जब सामने आती है, मैं उसमें खोता हूं।
वो मुझमें होती है, मैं उसमें होता हूं।।
दूऽर हुए जब वोऽऽ, मशगूऽल रहेऽ थे हम।
कुछ वक्त रहे सोखे, फिर मन के साथी गम़।।
अहसासों कि माला, सांसों में पिरोता हूं।
मिलने कि चाहत में, तेरी राह जोहता हूं...आतीं हैं जब यादें.......
सीने में सजाकर के, जगता मैं सोता हूं,
आती हैं जब यादें ,घुट-घुट के रोता हूँ......
हैं वादे सारे तेरे, "मन" दिल दुनिया घेरे।
खुद के रहे ना हम, मुंह जो हमसे फेरे।।
जीने कि तमन्ना थी, सदियों का इरादा था।
इक ऐसा वादा था, गफलत का तकादा था।।
गर शौक़ अधूरे थे, पहले न बताया क्यों।
मंजूर किया रिश्ता, कैसी मजबूरी थी।।
सभी बीते यादों को, रख दिल में ढोता हूं...आतीं हैं जब यादें.....
सीने में सजाकर के, जगता मैं सोता हूं,
आती हैं जब यादें ,घुट-घुट के रोता हूँ......
सनातनी_जितेंद्र मन
#sanatani_jitendra_mann