मैं और मेरे अह्सास
हौसला
आज हौसलों के टूटे साज़ को जोड़ने चला हूँ l
दर्दभरे रास्ते महफिल की और मोड़ने चला हूँ ll
बस कुछ भी हो जाए ये सोचकर आगे बढ़ l
रीति,रस्मो रिवाजों की मटकी फोड़ने चला हूँ ll
चाहत की खुशी की ख़ातिर बिना मर्जी के l
आख़री बार ख़ुदा हाफ़िज़ बोलने चला हूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह