मैं और मेरे अह्सास
औरत हूँ तो क्या
औरत हूँ तो क्या बे - जुबान नहीं हूँ l
एक स्वतंत्र इन्सान हूँ गुलाम नहीं हूँ ll
मेरे भी मुँह में जबान दी है ईश्वर ने l
तेरे हर सवालों का जवाब नहीं हूँ ll
खुद के गुनाह की सज़ा पाना चाहती हूँ l
इंसान हूँ ईश के जैसी महान नहीं हूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह