मैं और मेरे अह्सास
महानगर
महानगर ने चुरा ली है जिंदगी मेरी l
यहाँ किसीने न देखी है बेबसी मेरी ll
नया मिला तो पुराना हुआ है याराना ll
चुराके दिल अब ठुकराई दोस्ती मेरी ll
जला दिया आशियाँ अपने हाथों से हमने l
खुदी को मार दिया देख सादगी मेरी ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह