शीर्षक - "गुड़िया"
तुम फूलों का ताज हो,
मैं खुद को ताज कैसे बना लूँ?
तुम फूल बन मेरे करीब आई हो,
फिर तुम्हारी महक क्यों चुरा लूँ?
मेरे बाग में तुम जैसी कलियां हैं,
फिर मैं खुद को काँटा कैसे बना लूँ?
फिदा तो ज़रूर हूँ,
तुम्हारी फूलों सी पंखुड़ियों पर।
उम्र की दूरी है,
वरना तुम मेरे भी बाग की शहज़ादी होतीं।
जब तुम्हें पहली बार देखा,
तुम्हारी आँखों में खो गया।
मैंने कभी नहीं सोचा था,
कि तुम मुझे अपना ताज बनाना चाहती हो।
जब तुमसे बातें कीं, तो समझा,
कि तुम भी मुझे ताज बनाना चाहती हो।
फूलों की महक!
तुम हर बाग में महकना,
बैठ जाना उस फूल के पास,
जिसके पास खुद की कोई महक नहीं।
मैं बस महक का हिसाब करता हूँ,
यूँ ही सबको बिखेर देता हूँ।
मैं फूलों के ज़ख्म की कहानी लिखता हूँ,
इसीलिए मैं हर किसी की महक बन जाता हूँ।
-कवि एसटीडी मौर्य ✍️
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