जो चलना छोड़ दे, वो साँस लेता हुआ भी
धीरे-धीरे थक जाता है,
जो सवाल नहीं करता,
उसका जवाब समय खुद लिख जाता है।
रास्ते अगर पैरों से नहीं गुजरें,
तो सपने आँखों में सड़ने लगते हैं,
किताबें अगर हाथ न छुएँ,
तो शब्द भी चुप्पी सीख लेते हैं।
ज़िंदगी अगर सुनी न जाए,
तो शोर भी बेआवाज़ हो जाता है,
और जब कोई नाराज़ न हो आपसे,
तो समझो आपसे कुछ छूट जाता है।
यात्रा, किताब, ध्वनि और टकराव—
यही तो जीवन की धड़कन हैं,
इनसे दूर रहकर जीना
असल में धीरे-धीरे मर जाना है।
आर्यमौलिक