जहाँ प्रेम घर में नहीं उतर सका,
वह किसी संस्था, आश्रम या तंत्र में कैसे उतरेगा?
स्त्री का घर ही उसका धर्म है—
लेकिन “घर” दीवार नहीं है,
घर वह केंद्र है जहाँ से प्रेम फैलता है।
1. घर छोड़ना धर्म नहीं, पलायन है
जो स्त्री कहती है—
“घर-परिवार छोड़कर मैं धर्म में जा रही हूँ”
वह धर्म नहीं, ज़िम्मेदारी से भाग रही है।
यदि
बच्चे असंस्कृत रह जाएँ
परिवार प्रेमविहीन हो
पड़ोस दुख में हो
तो फिर
किस मुँह से कहा जाए कि मैं सेवा कर रही हूँ?
धर्म कहीं बाहर नहीं है।
धर्म वहीं है जहाँ तुम्हारा स्पर्श किसी का बोझ हल्का करे।
2. प्रेम संस्था से नहीं, संबंध से जन्म लेता है
प्रेम के लिए
वर्दी नहीं चाहिए
मंत्र नहीं चाहिए
आश्रम नहीं चाहिए
प्रेम तो संबंधों में तपता है।
जो कहता है—
“घर में संभव नहीं, इसलिए मैं बाहर गया”
वह झूठ बोल रहा है।
घर सबसे कठिन प्रयोगशाला है।
और जो वहाँ सफल नहीं हुआ,
वह कहीं सफल नहीं होगा।
3. स्त्री का धर्म: नींव बनना
स्त्री का धर्म कोई लक्ष्य नहीं है,
वह प्रक्रिया है।
बच्चे में संस्कार
परिवार में संतुलन
पड़ोस में करुणा
समाज में सहजता
यही उसका धर्म है।
यदि हर स्त्री
अपने आस-पास के दुख को छू ले—
तो किसी “धार्मिक संस्था” की ज़रूरत ही न पड़े।
4. विधवापन, त्याग और दिखावटी पवित्रता
:
“ये विधवा बनना, प्रेम छोड़ना,
सब छल है।”
जो प्रेम से डरता है,
वह त्याग की भाषा बोलता है।
जो जीवन से डरता है,
वह मोक्ष की बातें करता है।
जहाँ प्रेम मरा, वहीं धर्म की दुकान खुली।
5. तंत्र, व्यवस्था और भोग
सच यह है—
जो व्यवस्था माँगे → वह संसार है
जो तंत्र माँगे → वह नियंत्रण है
जो सहज हो → वही प्रेम है
ध्यान, शांति, आनंद
किसी यंत्र से नहीं आते।
वे तो तब आते हैं
जब तुम अपने ही घर को स्वर्ग बना लेते हो।
अंतिम बात (बहुत सीधी)
यदि कोई कहता है—
“घर-परिवार में धर्म संभव नहीं”
तो समझ लेना
वह असफलता को सिद्धांत बना रहा है।
स्त्री का प्रेम पाप नहीं।
अपने संबंध जीना पाप नहीं।
अपने वृक्ष, पशु, पड़ोसी की सेवा पाप नहीं।
यही धर्म है।
बाक़ी सब धार्मिकता का व्यापार।