अगर लेखक इमोशंस और भावनाएँ नहीं लिखते…
अगर कवि अपने शब्दों में आग नहीं भरते…
तो सच कह रही हूँ —
आज जो समाज में थोड़ा-बहुत बदलाव दिख रहा है,
वो बदलाव कभी नहीं आता।
तब सोच नहीं बदलती,
सिर्फ़ समय बदलता…
और स्त्रियाँ आज भी
उन्हीं पुरानी बेड़ियों में जी रही होतीं।
जो स्त्रियाँ आवाज़ उठातीं भी,
उनकी आवाज़ दबी रह जाती…
चार दीवारों में घुट जाती,
भीड़ में खो जाती।
लेकिन लेखक आए…
कवियों ने लिखा…
कहानियों ने सवाल खड़े किए…
टीवी, किताबें, मंच और आज की इंस्टा रील्स ने
दुनिया को सोचने पर मजबूर किया।
इन्हीं शब्दों ने स्त्री के संघर्ष को
कमज़ोरी नहीं, ताक़त बनाया।
इन्हीं कलमों ने
चुप्पी को आवाज़ दी।
इसलिए —
सलाम उन लेखकों को ✍️
सलाम उन कवियों को ✨
जिन्होंने स्त्री समाज को सिर्फ़ सहना नहीं,
- archana