शीर्षक: मैं तुलसी, तेरे आँगन की।
अपने स्नेह की आगर से
स्वयं सींचोगी रोज तुम मुझे,
क्योंकि इसके बाद
जब-जब भी जन्म लूँगी मैं—
पनपती रहूँगी
उसके हृदय में सदा,
जैसे पनप जाती है तुलसी
बिना खाद, बिना पानी के।
और बना देती है
सर्वस्व मिट्टी से भरी
धरती के हृदय को पावन—
ठीक वैसे ही लौट कर आऊंगी,
मैं तुलसी, तेरे आँगन की।
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