दिल की मोहब्बत
अब तो सिर्फ़ मोहब्बत जिस्म की है, दिल की नहीं,
रूहें प्यास से जलती हैं, पर किसी को शर्म की नहीं।
लोगों ने इश्क़ को अब सौदों में तौलना सीख लिया,
मुस्कान बिकती है सस्ती, कोई कीमत दर्द की नहीं।
जिन्होंने चाहा बिना शर्त, बिना दिखावे के साथ,
उन्हें भीड़ ने सिखा दिया—ये दुनिया उनके हक़ की नहीं।
दिल की मोहब्बत करने वाले अक्सर अकेले रहते हैं,
क्योंकि भीड़ को आदत है सिर्फ़ रौनक, सन्नाटे की नहीं।
आज हर वादे पर शक का साया भारी रहता है,
सच्चे लफ्ज़ ढूँढ़ते हैं ठिकाना—किसी की जेब की नहीं।
जिसने निभाया रिश्ता रूह से, वो कहानी बन गया,
और जो खेल गया जज़्बात से, वही हस्ती कमीने की नहीं।
कहीं कोई आज भी चुपचाप दुआओं में बसाता है,
वो नाम जो आता है आँखों में—किसी तस्वीर की नहीं।
अगर दिल की मोहब्बत मर गई होती सच में,
तो ये शायरी पैदा ही क्यों होती, किसी तकलीफ़ की नहीं।
आर्यमौलिक