प्यार, जो कभी सबसे खूबसूरत एहसास हुआ करता था, अब एक मजाक सा लगता है।
गढ़ गणेश जी जाते हुए तीन बुधवार हो गए। हर बार वहां एक लड़की से मुलाकात होती थी—रिया। आज पहली बार उसने मुझसे बात की। वह प्यारी थी, पर उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी। मैं शायद उससे वैसे बात नहीं कर पाया, जैसे कोई अच्छा दोस्त करता। मेरी चुप रहने की आदत अक्सर सही होती है, लेकिन आज शायद नहीं। हो सकता है, अगर मैं थोड़ा खुलकर बोलता, तो वह अपने मन का बोझ हल्का कर पाती। पर मैं चुप रहा... हमेशा की तरह।
घर लौटते वक्त दिमाग में एक ख्याल आया—अब तक जितने भी लोग मेरे दोस्त बने हैं, वे सभी किसी न किसी सच्चे प्यार में टूटे हुए मिले। और यही वजह है कि अब मुझे प्यार पर यकीन ही नहीं होता। हर बार जब किसी की कहानी सुनता हूँ, तो लगता है कि यह भी बस एक और अधूरी दास्तान है। प्यार, जो कभी सबसे खूबसूरत एहसास हुआ करता था, अब एक मजाक सा लगता है।