"निर्वांतर: कालिमय सत्य।
ऐसा जी लगा है तुमसे...
बस निर्वांतर हो जाऊं।
ना धर्म का साफा ओढूँ,
ना कर्म की चादर ओढूँ।
ऐसी कौन सी माया तूने मुझको है लगायी,
मेरी एक नज़र ये दुनिया देखे...
उसमें हर एक में, मैं तुझको निहारूँ।
मुख पर ना चिंता रही,
ना शर्म, ना कर्म, ना धर्म...
रहा एक सत्य ही रह गया,
जो भयानक हो कर भी... किसी में छुपना बैठा।
मैं निर्वस्त्रा (अपने बुरे कर्म को उजागर किये)खड़ी हूँ तेरे द्वार पर अपने इसी 'सत्य' के साथ,
अब स्वीकारना या ठुकराना... ये सब तेरी मर्जी।
om shiv gorksh ❣️🌸
by:pinklotus.
मेरे नाथ गोरक्ष और मेरी काली के चरणो मे अर्पित।