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GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

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स्वार्थ बन्ध में सब बँधे, यह दुनिया की रीति। फिर हमको कैसे मिले ?
इस दुनिया से प्रीति।।
दोहा --४१५
(नैश के‌दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

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यह ऋग्वेद का बहुत सुंदर मंत्र है। आइए इसे शब्दार्थ, भावार्थ और तात्त्विक अर्थ—तीनों स्तरों पर समझते हैं।
मंत्र
यो जागार कामयन्ते।
ऋग्वेद ५।४४।१४
शब्दार्थ
यः – जो
जागार – जागता है, सचेत रहता है, प्रमादरहित है।
कामयन्ते – चाहती हैं, उसकी कामना करती हैं।
(ऋचः / ऋचाएँ) – वैदिक ऋचाएँ, दिव्य ज्ञान-वाणी
👉 शब्दार्थ:
जो जाग्रत रहता है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं।
भावार्थ
जो मनुष्य आलस्य, प्रमाद, अज्ञान और असावधानी से मुक्त होकर जागरूक, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ रहता है—
वैदिक ज्ञान, दिव्य प्रेरणा और सत्य की वाणी उसी की ओर आकर्षित होती हैं।
दूसरे शब्दों में—
📜 वेद उसी को प्रकट होते हैं जो भीतर से जागा हुआ है।
तात्त्विक अर्थ (गूढ़ भाव)
यहाँ जागरण केवल नींद से उठना नहीं है, बल्कि—
आत्मचेतना में स्थित होना है।
इन्द्रियों पर संयम धर्म और सत्य के प्रति सजगता साधना में निरंतरता होनी चाहिए । ऋचाएँ पुस्तक में बंद नहीं होती हैं, बल्कि वे साधक की चेतना में अवतरित होती हैं।
🔔 जो जागता है वही वेद को “सुन” पाता है।
उपनिषद से प्रमाण--
(१) कठोपनिषद् (१।३।१४)
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
उठो, जागो और श्रेष्ठ जनों से ज्ञान प्राप्त करो।
२) भगवद्गीता २।६९
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
अर्थ--
जिस समय सब सोते हैं, संयमी जागता है।
(२) मुण्डकोपनिषद् ३।१।५
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
भावार्थ –
यह आत्मा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है।
👉 जो सजग जीवन जीता है, वही आत्मज्ञान का अधिकारी बनता है।
३- बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।२३
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
भावार्थ –
यह आत्मा केवल वाणी या बुद्धि से नहीं, बल्कि जाग्रत साधक को स्वयं प्रकट होती है।
👉 जैसे ऋचाएँ जाग्रत को चाहती हैं।
४-. कठोपनिषद् २।२।८
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि
मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टते
तामाहुः परमां गतिम्॥
भावार्थ –
जब इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि शांत होकर सचेत हो जाते हैं—
वही परम अवस्था है।
👉 यह पूर्ण जागरण की दशा है।
५-. ऐतरेयोपनिषद् १।३।१२
प्रज्ञानं ब्रह्म।
भावार्थ –
चेतना ही ब्रह्म है।
👉 जो प्रज्ञा में जाग्रत है, वही ब्रह्म को प्राप्त करता है।
६. माण्डूक्योपनिषद्
नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं …
शान्तं शिवं अद्वैतं।
भावार्थ –
न बाह्य जागरण, न स्वप्न—
बल्कि उनसे परे साक्षी-जागृति ही सत्य है।
👉 यही वैदिक जागरण का चरम रूप है।
७. छान्दोग्योपनिषद् ६।१४।२
तत्त्वमसि श्वेतकेतो।
भावार्थ –
जब शिष्य जाग्रत होकर सत्य को पहचानता है—
वही ज्ञान फलित होता है।
समन्वय (ऋग्वेद मंत्र से संबंध)
यो जागार कामयन्ते (ऋ. ५।४४।१४)
का तात्त्विक निष्कर्ष उपनिषदों में स्पष्ट है—
🔔 ज्ञान उसी को मिलता है जो भीतर से जागा हुआ है।
📜 वेद और उपनिषद—दोनों का स्वर एक ही है।
🌺 महाभारत से प्रमाण
1. महाभारत, उद्योगपर्व
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
भावार्थ –
आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
उद्यम और जागरूकता से किया गया कर्म कभी नष्ट नहीं होता।
👉 जो जाग्रत है, वही धर्म और ज्ञान का पात्र बनता है।
2. महाभारत, शांतिपर्व
प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि
सदा प्रमादं न प्रशंसन्ति सन्तः।
भावार्थ –
प्रमाद (असावधानी, अचेतन अवस्था) को मैं मृत्यु कहता हूँ।
सज्जन कभी प्रमाद की प्रशंसा नहीं करते।
👉 यह वही भाव है—“जो जागा है वही जीवित है”।
3. महाभारत, भीष्म-वचन
जाग्रतः सर्वधर्माणां लोपो नास्ति कदाचन।
भावार्थ –
जो जागरूक है, उसके धर्म का कभी नाश नहीं होता।
🌸 भागवत पुराण से प्रमाण
१- श्रीमद्भागवत 11।2।42
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिर्
अन्यत्र चैतस्य न जायते यावत्।
भावार्थ –
जब तक चेतना जाग्रत नहीं होती,
तब तक परम अनुभव और ज्ञान प्रकट नहीं होता।
👉 ज्ञान जागरण का फल है।
२-. श्रीमद्भागवत 3।33।7
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
भावार्थ –
जिसकी चेतना प्रभु-स्मरण में जाग्रत हो गई, वह सभी से श्रेष्ठ हो जाता है।
३-. श्रीमद्भागवत 1।2।18
नष्टप्रायेष्वभद्रेषु
नित्यं भागवतसेवया।
भगवत्युत्तमश्लोके
भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥
भावार्थ –
नित्य अभ्यास से जब अज्ञान नष्ट होता है, तब भक्ति और ज्ञान जाग्रत हो जाता है।
🌼 हितोपदेश से प्रमाण
1. हितोपदेश, मित्रलाभ
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ –
कार्य केवल इच्छा से नहीं, जाग्रत उद्यम से सिद्ध होते हैं।
जो सोया है, उसके मुख में शिकार स्वयं नहीं जाता है।
2. हितोपदेश
अप्रमत्तश्च यः कार्ये स सफलो न संशयः।
भावार्थ –
जो अपने कार्य में अप्रमाद (सजग) रहता है, वही सफल होता है।
🌿 चाणक्य (चाणक्यनीति) से प्रमाण
१- चाणक्यनीति
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
भावार्थ –
आलस्य मनुष्य के भीतर बैठा सबसे बड़ा शत्रु है।
👉 आलस्य = अज्ञान, जागरण = ज्ञान।
२- चाणक्यनीति
कार्येषु मन्त्रिणः शूराः
कार्यमध्ये विचक्षणाः।
भावार्थ –
जो कार्य के आरंभ, मध्य और अंत—तीनों में सचेत रहता है,
वही बुद्धिमान कहलाता है।
३-. चाणक्यनीति
सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां
विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम्।
सुखार्थिनः कुतो विद्या
कुतो सुखं विद्यार्थिनः॥
भावार्थ –
विद्या त्याग और जागरण से मिलती है,
सुखासक्ति और प्रमाद से नहीं।
🌸 भर्तृहरि (नीतिशतकम्) से प्रमाण
१- नीतिशतकम्
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
(यह श्लोक भर्तृहरि में भी प्रसिद्ध है)
भावार्थ –
सपने नहीं, जाग्रत प्रयास कार्य सिद्ध करता है।
२-. नीतिशतकम्
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥
भावार्थ –
क्षण-क्षण सजग रहकर ही विद्या और धन प्राप्त होते हैं।
👉 प्रमाद = क्षय, जागरण = वृद्धि।
३. वैराग्यशतकम् (संबद्ध भाव)
निद्रा तत्त्वविमोहिनी।
भावार्थ –
अज्ञानरूप निद्रा ही सत्य से विमुख करती है।

🌺 श्रीमद्भागवत पुराण से प्रमाण
1. श्रीमद्भागवत 11।9।29
प्रमत्तस्य हि संसारो
यथा स्वप्नोऽनुभूयते।
भावार्थ –
जो प्रमाद (अचेतन अवस्था) में है,
उसका संसार स्वप्न के समान है।
👉 अजागृति = बन्धन।
2. श्रीमद्भागवत 3।27।4
यदा मनः स्वं विरजं भवेत्
तदैव पुण्यं भजते महात्मा।
भावार्थ –
जब मन शुद्ध होकर सचेत हो जाता है,
तभी पुण्य और ज्ञान प्रकट होते हैं।
3. श्रीमद्भागवत 1।5।17
त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरेः
भजन्नपक्वोऽथ पतत्तो यदि।
यत्र क्व वा अभद्रमभूदमुष्य
किं को वाऽर्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः॥
भावार्थ –
ईश्वर-चेतना में जाग्रत व्यक्ति कभी नष्ट नहीं होता।
👉 जागरण ही रक्षक है।
🌼 विष्णु पुराण से प्रमाण
१-. विष्णु पुराण 2।13।6
अविद्यायां निबद्धानां
प्रमत्तानां विशेषतः।
जन्ममृत्युं न पश्यन्ति
पशुवद् व्यवहारिणः॥
भावार्थ –
अविद्या और प्रमाद में पड़े लोग
जन्म–मृत्यु को नहीं समझते,
वे पशु के समान आचरण करते हैं।
👉 जागरण = मनुष्यत्व।
२- विष्णु पुराण
ज्ञानमेव तु कैवल्यं
अज्ञानं बन्ध उच्यते।
भावार्थ –
ज्ञान ही मोक्ष है,
अज्ञान ही बन्धन है।
👉 ज्ञान = जाग्रति।
🌸 गरुड़ पुराण से प्रमाण
१-. गरुड़ पुराण
प्रमादो नरकद्वारं
ज्ञानं मोक्षस्य कारणम्।
भावार्थ –
प्रमाद नरक का द्वार है,
ज्ञान मोक्ष का कारण है।
👉 यह सीधा “जागो या गिरो” का संदेश है।
7. गरुड़ पुराण
अप्रमत्तः सदा भवेत्
धर्ममार्गे विशेषतः।
भावार्थ –
धर्ममार्ग में मनुष्य को
सदैव अप्रमाद (जाग्रत) रहना चाहिए।
🌷 पद्म पुराण से प्रमाण
१-. पद्म पुराण
निद्रा तु मोहजननी
जागरणं ज्ञानलक्षणम्।
भावार्थ –
निद्रा (अज्ञान) मोह को जन्म देती है,
जागरण ज्ञान का लक्षण है।
🌼 मार्कण्डेय पुराण से प्रमाण
१-. मार्कण्डेय पुराण
यः प्रमादे स्थितो नित्यं
स धर्मं नाधिगच्छति।
भावार्थ –
जो सदा प्रमाद में रहता है,
वह कभी धर्म को नहीं पाता।
🔔 समन्वय (वेद से पुराण तक)
वेद कहते हैं—ऋचाएँ जाग्रत को चाहती हैं।
पुराण कहते हैं—जागरण ही मनुष्य का धर्म है।
🌿 मनुस्मृति से प्रमाण
1. मनुस्मृति 2।100
प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि
सदाऽप्रमादं प्रशंसन्ति सन्तः।
भावार्थ –
प्रमाद को मृत्यु कहा गया है,
और सज्जन सदा अप्रमाद (जागरण) की प्रशंसा करते हैं।
2. मनुस्मृति 4।240
अप्रमत्तः सदा धर्मं
सेवेत मनुजः सदा।
भावार्थ –
मनुष्य को सदा जाग्रत रहकर धर्म का आचरण करना चाहिए।
🌼 याज्ञवल्क्य स्मृति से प्रमाण
3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1।122
प्रमादाद्धि मनुष्याणां
कार्याणि विनशन्ति वै।
भावार्थ –
प्रमाद से मनुष्य के कार्य नष्ट हो जाते हैं।
👉 जागरण = सिद्धि।
🌸 पतञ्जलि योगसूत्र से प्रमाण
4. योगसूत्र 1।21
तीव्रसंवेगानामासन्नः।
भावार्थ –
जो साधक तीव्र जागरूकता और उत्कट साधना रखता है,
उसके लिए सिद्धि निकट होती है।
5. योगसूत्र 1।22
मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः।
भावार्थ –
जितनी तीव्र सजगता,
उतनी शीघ्र सिद्धि।
6. योगसूत्र 2।4
अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां
प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्।
भावार्थ –
अविद्या कभी सुप्त, कभी क्षीण, कभी सक्रिय रहती है।
👉 योग का उद्देश्य है जागरण।
🌷 सांख्यकारिका से प्रमाण
7. सांख्यकारिका 64
तस्मादसक्तः सततं
कार्यं कुर्याद् बुद्धिमान्।
भावार्थ –
बुद्धिमान व्यक्ति सचेत रहकर कर्म करता है।
🌺 शतपथ ब्राह्मण से प्रमाण
8. शतपथ ब्राह्मण 10।5।2।9
जागरणं हि प्रज्ञानस्य द्वारम्।
भावार्थ –
जागरण ही प्रज्ञा का द्वार है।
🌼 तैत्तिरीय आरण्यक से प्रमाण
9. तैत्तिरीय आरण्यक 1।11
प्रज्ञया हि जीवनं भवति।
भावार्थ –
प्रज्ञा (जाग्रत चेतना) से ही जीवन सार्थक होता है।+-------+--------+---------+-------

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दुनिया है इतनी बड़ी, नहीं एक भी मित्र। जीवन भर बेकार में, रहा लुटाता इत्र।।
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

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यह प्रसिद्ध वैदिक मंत्र है—सामूहिकता और एकता का घोष 🌿
मंत्र (ऋग्वेद 10.191.2)
सं गच्छध्वं सं वदध्वं
सं वो मनांसि जानताम्।
शब्दार्थ
सं — साथ-साथ, मिलकर
गच्छध्वम् — चलो
वदध्वम् — बोलो, परामर्श करो
मनांसि — मन
जानताम् — एक-दूसरे के अनुरूप हों / एक हों
सरल अर्थ:
“तुम सब साथ-साथ चलो, साथ-साथ बोलो, और तुम्हारे मन एक-दूसरे के साथ एकरूप हों।”
भावार्थ
यह मंत्र सामाजिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय जीवन—तीनों में एकता, संवाद और सामंजस्य का आदर्श रखता है। केवल साथ रहने की नहीं, बल्कि मन-विचार की एकता की प्रेरणा देता है। जहाँ विचार एक हों, वहाँ संघर्ष नहीं, सहयोग होता है।

समान भाव के अन्य प्रमाण
यजुर्वेद (40.7)
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः
— जहाँ सब प्राणियों में आत्मभाव हो जाता है, वहाँ भेद नहीं रहता।
भगवद्गीता (6.32)
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन
— जो सबको अपने समान देखता है, वही श्रेष्ठ है।
उपनिषद (ईशावास्य)
ईशावास्यमिदं सर्वम्
— सब में एक ही सत्ता का वास है।
“सं गच्छध्वं सं वदध्वं” के भाव (एकता, सामंजस्य, सामूहिक चेतना) के अन्य उपनिषदों से प्रमाण क्रमबद्ध रूप में देखिए—
1. बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.10)
मंत्र:
अहं ब्रह्मास्मि।
भावार्थ:
जब सबमें एक ही ब्रह्म का बोध हो जाता है, तब भेद, विरोध और वैमनस्य नहीं रहता।
यही “सं गच्छध्वम्” का दार्शनिक आधार है—एक आत्मा का अनुभव।
2. छान्दोग्य उपनिषद् (6.8.7)
मंत्र:
तत्त्वमसि श्वेतकेतो।
भावार्थ:
तू वही ब्रह्म है जो सबमें व्याप्त है।
जब यह बोध होता है, तब मन स्वतः एक-दूसरे से जुड़ते हैं—
“सं वो मनांसि जानताम्”।
3. ईशोपनिषद् (6)
मंत्र:
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥
भावार्थ:
जो सब प्राणियों को अपने ही आत्मा में देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता।
यह सामूहिक सद्भाव और अहिंसक सह-अस्तित्व का उपनिषदिक प्रमाण है।
4. कठोपनिषद् (2.1.1)
मंत्र:
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः।
भावार्थ--
:जब मन बाह्य भेदों से हटकर अंतर्मुख होता है, तब एकत्व का अनुभव होता है।
वहीं से सच्चा सामूहिक संवाद जन्म लेता है।
5. मुण्डकोपनिषद् (2.2.5)
मंत्र:
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः।
भावार्थ:
ज्ञानी के लिए सब प्राणी आत्मस्वरूप हो जाते हैं।
यह श्लोक सीधे बताता है कि एकता बोध ही सामाजिक समरसता का मूल है।
6. मैत्रायणी उपनिषद् (6.30)
मंत्र:
एकं ह्येव सद् बहुधा कल्पयन्ति।
भावार्थ:
सत्य एक है, उसे लोग अनेक रूपों में देखते हैं।
यह मंत्र विचारों की विविधता में भी मूल एकता को स्वीकार करता है—
यही “सं वदध्वम्” की आत्मा है।
“सं गच्छध्वं सं
वदध्वं” (एकता–सामंजस्य–सहयोग) के भाव के महाभारत, हितोपदेश, भर्तृहरि और चाणक्य से प्रमाण क्रमशः प्रस्तुत हैं—
1. महाभारत से प्रमाण
(क) उद्योगपर्व
श्लोक:
सहयोगेन सर्वार्थाः सिद्ध्यन्ति न हि केवलम्।
भावार्थ:
सब कार्य सहयोग से ही सिद्ध होते हैं, अकेले प्रयत्न से नहीं।
→ यह सीधे “सं गच्छध्वम्” का व्यवहारिक रूप है।
(ख) शान्तिपर्व
श्लोक:
एकचक्रं न वर्तेत जातु लोकस्य संस्थितिः।
भावार्थ:
एक व्यक्ति या एक विचार से समाज नहीं चलता।
समाज की स्थिरता सामूहिक समन्वय से ही संभव है।
(ग) वनपर्व
श्लोक:
भेदो विनाशकारणम्।
भावार्थ:
फूट और वैमनस्य विनाश का कारण होते हैं।
→ यही कारण है कि वेद संयुक्त चलने और बोलने का उपदेश देता है।
2. हितोपदेश से प्रमाण
(क) मित्रलाभ प्रकरण
श्लोक:
सहायः साधनं कार्यं न तु केवलमात्मनः।
भावार्थ:
कार्य की सिद्धि के लिए सहायता आवश्यक है, अकेले से नहीं।
(ख) प्रसिद्ध सूत्र
श्लोक:
एकेनापि सुवृक्षेण दह्यमानेन वानराः।
दह्यन्ते सर्व एवात्र न गुणो वृक्षसंश्रयः॥
भावार्थ:
एक की भूल से सब संकट में पड़ जाते हैं—
इसलिए सामूहिक विवेक और संवाद आवश्यक है।
3. भर्तृहरि (नीतिशतकम्) से प्रमाण-
(क) सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम्।
भावार्थ:
सज्जनों का संग मन को शुद्ध करता है।
जब मन शुद्ध और एकरूप हो, तभी सं वो मनांसि जानताम् साकार होता है।
(ख) परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।
(गीता में भी समान भाव)
भावार्थ:
परस्पर सहयोग से ही परम कल्याण प्राप्त होता है।
4. चाणक्य (चाणक्यनीति) से प्रमाण
(क) सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलं अर्थः।
अर्थस्य मूलं राज्यं राज्यस्य मूलं इन्द्रियजयः॥
भावार्थ:
राज्य और समाज की नींव नियंत्रित, संगठित और समन्वित जीवन है।
(ख) एकः शत्रुर्न हन्तव्यः सहस्रैः सह योद्धुकामः।
भावार्थ:
एक संगठित समूह अकेले शक्तिशाली व्यक्ति से भी बलवान होता है।
यह सामूहिक शक्ति का स्पष्ट प्रमाण है।
(ग) प्रसिद्ध नीति-वाक्य:
संघशक्तौ कलियुगे।
भावार्थ:
कलियुग में शक्ति का आधार संघ और एकता है।
समग्र निष्कर्ष
वेद → उपनिषद → महाभारत → नीति-ग्रंथ
सब एक स्वर में कहते हैं—
विचार में एकता,
वाणी में समन्वय,
और कर्म में सहयोग —
अब पुराणों से प्रमाण प्रस्तुत है, जो सीधे “सं गच्छध्वं सं वदध्वं” (एकता, सामूहिकता, परस्पर-सहयोग) के भाव को पुष्ट करते हैं।
1. भागवत पुराण से प्रमाण
(क) स्कन्ध -4
श्लोक:
परस्परानुभावेन भवत्यैक्यमनोरथः।
भावार्थ:
परस्पर सहयोग और समझ से ही मन की एकता उत्पन्न होती है।
→ यह स्पष्ट रूप से “सं वो मनांसि जानताम्” का पुराणीय प्रमाण है।
(ख) स्कन्ध- 11 (उद्धव गीता)
सङ्गो हि धर्मसम्पत्तेः कारणं परमं स्मृतम्।
भावार्थ:
सज्जनों का संग ही धर्म और उन्नति का मूल कारण है।
→ संग = साथ चलना, साथ बोलना।
2. विष्णु पुराण से प्रमाण
(क) समाजो हि महाबाहो धर्मस्यायतनं स्मृतम्।
भावार्थ: धर्म का वास्तविक आधार संगठित समाज है, अकेला व्यक्ति नहीं।
(ख) परस्परहितं कर्म लोकस्य स्थैर्यकारणम्।
भावार्थ:
परस्पर हित का आचरण ही समाज की स्थिरता का कारण है।
3. मार्कण्डेय पुराण से प्रमाण
एकभावसमायुक्ता जयन्ते सर्वकर्मसु।
भावार्थ:
जो लोग एक भाव से युक्त होते हैं, वे हर कार्य में विजय पाते हैं।
4. पद्म पुराण से प्रमाण:
नैकस्य तपसा सिद्धिर्नैकस्य ज्ञानतो जयः।
सङ्घेनैव महत्कर्म साध्यते नात्र संशयः॥
भावार्थ:
न केवल तप से, न केवल ज्ञान से
महान कार्य संघ (एकता) से ही सिद्ध होते हैं।
5. अग्नि पुराण से प्रमाण:
भेदो नाशाय विज्ञेयः सङ्घो रक्षाय कीर्तितः।
भावार्थ:
फूट विनाश का कारण है, और संघ रक्षा तथा उन्नति का।
6. ब्रह्म पुराण से प्रमाण
एकचित्ताः समायुक्ता लोकान् धारयन्ति ते।
भावार्थ:
एक चित्त से युक्त लोग ही लोक (समाज) को संभालते हैं।
निष्कर्ष (पुराणीय दृष्टि)
पुराण स्पष्ट कहते हैं—
संघ = शक्ति
भेद = विनाश
एकचित्तता = धर्म, विजय और लोक-कल्याण
यही वैदिक मंत्र “सं गच्छध्वं सं वदध्वं” का
पुराणों में विकसित सामाजिक रूप है।
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“केवलाघो भवति केवलादी” (ऋग्वेद 1/117/4) का भाव—जो केवल अपने लिए ही खाता है, वह पाप का भागी होता है—यह वैदिक परंपरा में बार-बार आया हुआ नैतिक सिद्धान्त है। इसी आशय के अन्य शास्त्रीय प्रमाण, संक्षेप में और प्रमाण सहित, नीचे दिया जा‌ रहा है।
* ऋग्वेद से ही समान भाव
ऋग्वेद- 10/117/6
न स सखा यो न ददाति सख्ये।
भावार्थ –
जो मित्रता में देता नहीं , वह सच्चा मित्र नहीं है।
(अर्थात् जो बाँटता नहीं, वह सामाजिक और नैतिक रूप से दोषी है)
* भगवद्गीता से प्रमाण
गीता-- 3/13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
भावार्थ –
यज्ञ (दान, परमार्थ) के बाद जो भोजन करते हैं, वे पाप से मुक्त होते हैं; और जो केवल अपने लिए ही पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।
➡️ यह श्लोक सीधे “केवलाघो भवति” की व्याख्या है।
* उपनिषद् से प्रमाण
ईशोपनिषद् – मंत्र-- 1
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
भावार्थ –
त्यागभाव से भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो।
➡️ यहाँ “त्यागपूर्वक भोग” का उपदेश है, न कि अकेले उपभोग का।
* मनुस्मृति से प्रमाण
मनुस्मृति-- 4/29
अतिथिं योऽनवाप्तं स्यात् स भुञ्जीत कदाचन।
अन्नं हि प्राणिनां प्राणाः।
भावार्थ –
अतिथि को बिना भोजन कराए स्वयं भोजन नहीं करना चाहिए;
क्योंकि अन्न ही प्राणियों का प्राण है।
*. महाभारत से प्रमाण--
(क) महाभारत – अनुशासन पर्व
अन्नं बहु कुर्वीत तद्व्रतं साधुसम्मतम्।
भावार्थ –
अन्न बहुतों के लिए बनाना चाहिए; यही सज्जनों द्वारा मान्य व्रत है।
➡️ आशय: जो अकेले खाने के लिए अन्न बनाता है, वह धर्ममार्ग से हटता है।
(ख) महाभारत – वनपर्व
यो न ददाति स भुञ्जानो भुङ्क्ते पापमेव तु।
भावार्थ –
जो दान नहीं करता और स्वयं भोग करता है, वह वास्तव में पाप ही भोगता है।
➡️ यह सीधे “केवलाघो भवति” का प्रतिध्वनित भाव है।
(ग) महाभारत – शान्तिपर्व
न यंतस्य सुखमस्त्यत्र यो भुङ्क्ते केवलं स्वयम्।
भावार्थ –
जो केवल अपने लिए भोग करता है, उसे इस लोक में भी सुख नहीं मिलता।
* हितोपदेश से प्रमाण--
(क) हितोपदेश – मित्रलाभ
अदानं भोजनं पापं दानं धर्मः सनातनः।
भावार्थ –
दान न करके भोजन करना पाप है; दान करना सनातन धर्म है।
(ख) हितोपदेश – सुहृद्भेद
भुञ्जीत केवलं पापी न साधुर्न कदाचन।
भावार्थ –
केवल अपने लिए खाने वाला पापी होता है; साधु ऐसा नहीं करता।
(ग) हितोपदेश – नीति-वाक्य
स्वार्थाय पच्यते यत्र तत्र धर्मो न विद्यते।
भावार्थ –
जहाँ भोजन केवल स्वार्थ के लिए पकाया जाता है, वहाँ धर्म नहीं रहता। अवश्य !“केवल अपने लिए भोग करना पाप/अधर्म है, दानपूर्वक भोग ही नीति है”—इस भाव के भर्तृहरि और चाणक्य से प्रामाणिक नीति-श्लोक नीचे दिया जा रहा है—
* भर्तृहरि (नीतिशतकम्) से प्रमाण __
(क) नीतिशतकम्
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।
भावार्थ –
केवल त्याग से ही अमरत्व (यश, पुण्य) प्राप्त होता है;
इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है।
➡️ आशय: संग्रह और अकेला भोग नीति नहीं, त्याग ही धर्म है।
(ख) नीतिशतकम्
भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं।
माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराभ्यां भयम्॥
सर्वं वस्तु भयावहं भुवि नृणां त्यागः सुखावहः॥
भावार्थ –
भोग में रोग का भय है; धन में राजा का भय है;
संसार की हर वस्तु भययुक्त है—
केवल त्याग ही सुखदायक है।
➡️ भोगप्रधान जीवन (केवल अपने लिए) को भर्तृहरि ने दुःखमूल कहा।
(ग) नीतिशतकम्
परार्थे यः परित्यागः स एव पुरुषोत्तमः।
भावार्थ –
जो दूसरों के लिए त्याग करता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।
* चाणक्य (चाणक्य नीति) से प्रमाण --
(क) चाणक्य नीति--
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
भावार्थ –
धन की तीन गतियाँ हैं—
दान,भोग,नाश
जो न दान करता है, न भोग करता है—उसका धन नष्ट हो जाता है।
➡️ यहाँ भोग भी दान-संयुक्त माना गया है, न कि अकेला स्वार्थ।
(ख) चाणक्य नीति--
अत्याचारो न कर्तव्यः केवलार्थेन पण्डितैः।
भावार्थ –
केवल अपने स्वार्थ के लिए कोई कार्य (भोग भी) पण्डित नहीं करता।
(ग) चाणक्य नीति--
स्वार्थमात्रपरो लोके स पापेनैव जीवति।
भावार्थ –
जो केवल स्वार्थ में ही लगा रहता है, वह पापमय जीवन जीता है।
अवश्य। “केवल अपने लिए भोग करना अधर्म है, दान-सहित भोग ही धर्म है”—इस भाव के श्रीमद्भागवत तथा उससे सम्बद्ध पुराणीय परम्परा से प्रामाणिक उद्धरण नीचे दिए जा रहे हैं—
1. श्रीमद्भागवत महापुराण से प्रमाण--
(क) श्रीमद्भागवत 7.14.10
(प्रह्लाद का गृहस्थ-धर्म उपदेश)
अदत्त्वा यो भुङ्क्ते भोक्ता स स्तेन एव कीर्तितः।
भावार्थ –
जो बिना दान किए भोग करता है, वह वास्तव में चोर कहा गया है।
➡️ यह श्लोक “केवलाघो भवति” का भागवत-रूप है—
अकेला भोग = अधर्म।
(ख) श्रीमद्भागवत 7.14.8
गृहस्थोऽतिथिदानैश्च यज्ञैश्च भजते हरिम्।
भावार्थ –
गृहस्थ अतिथि-सेवा और दानरूप यज्ञों द्वारा भगवान का भजन करता है।
➡️ जो बाँटता नहीं, वह ईश्वर-भजन से भी वंचित रहता है।
(ग) श्रीमद्भागवत 1.2.13
अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥
भावार्थ –
सभी वर्ण-आश्रम धर्मों की सिद्धि हरि-तोषण में है।
➡️ और हरि-तोषण का मार्ग—दान, सेवा, परमार्थ—अकेला भोग नहीं।
* पुराणीय प्रमाण--
(क) विष्णु पुराण--
अतिथिं योऽनवाप्तं स्यात् स भुङ्क्ते पापमेव तु।
भावार्थ –
जो अतिथि को बिना भोजन कराए स्वयं भोजन करता है,
वह पाप ही भोगता है।
(ख) पद्म पुराण--
स्वार्थाय पच्यते यत्र न तत्र हरिरालयः।
भावार्थ –
जहाँ भोजन केवल स्वार्थ के लिए पकता है,
वहाँ भगवान का वास नहीं होता।
(ग) नारद पुराण-
दानं हि धर्मः परमः स्मृतो लोके सनातनः।
अदानेन तु यो भुङ्क्ते स पापी नरकोद्भवः।
भावार्थ –
दान सनातन धर्म है;
जो बिना दान के भोग करता है, वह पाप का भागी होता है।
✨ समग्र निष्कर्ष (वैदिक → भागवत परम्परा)
ऋग्वेद → गीता → महाभारत → भर्तृहरि → चाणक्य → श्रीमद्भागवत
सबका एक ही सिद्धान्त है—
केवल अपने लिए खाना = पाप / चोरी / अधर्म।
दान-युक्त भोग = धर्म / यज्ञ / भक्ति।
साझा अन्न = ईश्वर-पूजा है।
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पुत्र मोह में पिता ने, बहुत बढ़ायी आस। किन्तु बुढ़ापा के समय, कभी न आया पास।।
दोहा--४१०
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

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“न स सखा न ददाति सख्ये”
ऋगुवेद --10/117/4
भावार्थ--“वह मित्र नहीं है, जो सहायता नहीं देता।
सम्बन्धित उद्धरण--
* द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति
अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
मुण्डकोपनिषद--3/1/1
अर्थ:
एक ही वृक्ष पर बैठे दो मित्र पक्षी हैं। एक फल खाता है, दूसरा केवल साक्षी भाव से देखता है।
* ईशावास्यमिदं सर्वं
यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
--ईशोपनिषद(मंगलाचरण)
भावार्थ-
त्याग और सहभागिता ही जीवन का आधार है। जो केवल अपना ही सोचे, वह मित्रता निभाने योग्य नहीं।
महाभारत, उद्योग पर्व--
* सुखेषु सर्वे सखिनो भवन्ति
दुःखेषु मित्रं विरलः भवति।
--महाभारत(उद्योग पर्व)
अर्थ:
सुख में तो सभी मित्र होते हैं,
दुःख में साथ देने वाला मित्र दुर्लभ होता है।
* न मित्रं कपटं कृत्वा
मित्रभावेन वर्तते।
---महाभारत, वनपर्व
अर्थ:
जो छलपूर्वक मित्रता करता है,
वह वास्तव में मित्र नहीं होता।
* आपत्सु मित्रं यः करोति धीरः
स एव मित्रं न तु दीर्घसूत्री।
सुखेषु सर्वे सखिनो भवन्ति
दुःखेषु मित्रं विरलः भवति॥
--भृतहरि, नीतिशतक
अर्थ:
जो व्यक्ति विपत्ति के समय साथ देता है, वही वास्तव में मित्र है।
सुख के दिनों में तो सभी मित्र बन जाते हैं,‌ पर दुःख में साथ देने वाला मित्र बहुत ही दुर्लभ होता है।
👉 यह श्लोक सीधे उसी भाव को पुष्ट करता है—
जो मित्रता में कुछ देता नहीं, संकट में साथ नहीं देता, वह सखा कहलाने योग्य नहीं।
* पापान्निवारयति योजयते हिताय. गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति । आपद्गतं च न जहाति ददाति काले. सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः।। ---हितोपदेश-
भावार्थ --
.सज्जन लोग एक अच्छे मित्र का लक्षणों को कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं... जो मित्र पापों का नाश करता है, मित्र की कल्याण के लिए योजना बनाता है, मित्र की बुरी आदतों को लोगों से छुपाकर उसकी अच्छी आदतों का प्रचार
करता है।

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तिरस्कार कर पिता को, जब सुत करता तंग। शाप निकलता हृदय से, देख पुत्र का रंग।।
दोहा--407
(नैश के दोहे से उद्धृत)
----गणेश तिवारी 'नैश'

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भाइयों और बहनों,
कल से गणेश तिवारी 'नैश' द्वारा लिखी हुयी पुस्तक 'वेदों की सूक्तियों' से नित्य एक सूक्ति का प्रसारण नैशपीठ आध्यात्मिक ऊर्जा केन्द्र नरायनपुर जयसिंह के ॐ चो कु रे ध्वज से होने जा रहा है। आप नैश के दोहे के साथ इसे भी हृदय से स्वीकार कीजिए।-
---नैशपीठ

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पिता कार्य में पुत्र भल, सदा बँटाए हाथ। काम बढ़ाए पिता का, और निभाए साथ।।
दोहा --407
(नैश के दोहे से उद्धृत)
----गणेश तिवारी 'नैश'

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