खिड़की के पार आसमान में घने बादलों की गड़गड़ाहट थी, और कांच के पन्नों पर बारिश की बूंदें बेतरतीब धुन बजा रही थीं। कमरे के भीतर लैंप की मद्धम, सुनहरी रोशनी तैर रही थी। हवा में चमेली की खुशबू और हल्की नमी घुली हुई थी। वक्त जैसे अपनी रफ्तार भूलकर उसी कमरे के चौखट पर आ रुका था।
पलंग के किनारे बैठी अनामिका के पांव ज़मीन को छू रहे थे। उसकी सांसों में एक अजीब सा इंतज़ार था। जब मयूर ने कमरे में कदम रखा, तो दोनों की नज़रें टकराईं। मयूर ने बिना कुछ बोले अनामिका की ओर देखा—उसकी आंखों में गहरा समंदर था, जिसमें डूब जाने का खुला आमंत्रण था। मयूर उसके सामने ज़मीन पर एक घुटने के बल बैठ गया।
मयूर के हाथ धीरे से अनामिका के नंगे पैरों की ओर बढ़े। उसने अनामिका की पायल को उंगलियों के पोरों से छुआ। पायल की नन्हीं घुंघरुओं की हल्की सी झंकार खामोश कमरे में गूंज उठी। मयूर ने अपने गर्म हाथ उसके नाज़ुक पैरों के तलवों और उंगलियों पर फेरे। उस छुअन की नरमी इतनी अचानक और मादक थी कि अनामिका की उंगलियां सिमट गईं, और उसके मुंह से एक धीमी सी सिसकारी फिसल गई।
मयूर रुका नहीं। उसके हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगे। टखनों से होते हुए पिंडलियों की चिकनी ढलान पर जब उसके अंगूठे का दबाव पड़ा, तो अनामिका के रोम-रोम में एक मीठी सिहरन दौड़ गई। मयूर की छुअन में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी इबादत थी जो हर लफ़्ज़ से परे थी। अनामिका ने अपनी आंखें मूंद लीं और चादर को मुट्ठियों में भींच लिया।
मयूर उठकर खड़ा हुआ और अनामिका के बिल्कुल करीब बैठ गया। दोनों के चेहरों के बीच की दूरी अब महज़ चंद इंच थी। अनामिका की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि मयूर उन्हें अपनी छाती पर महसूस कर सकता था। मयूर ने अनामिका की साड़ी के पल्लू को धीरे से हटाया। उसकी उंगलियां अनामिका की पतली, तराशी हुई कमर पर जा टिकीं।
जैसे ही मयूर की गर्म हथेलियों ने अनामिका की खुली कमर को छुआ, अनामिका का पूरा बदन थरथरा उठा। उसकी रीढ़ में बर्फ की ठंडी धार और आग की लपट एक साथ उतर आई। मयूर ने अपनी उंगलियों की पकड़ उसकी कमर पर थोड़ी और गहरी की और उसे खींचकर अपनी छाती से सटा लिया। अनामिका की गर्म, भीगी सांसें मयूर की गर्दन पर टकरा रही थीं, जिससे माहौल की तपिश और बढ़ गई।
"मयूर..." अनामिका की आवाज़ किसी टूटे हुए सुर की तरह कांपी।
"बस महसूस करो, अनामिका," मयूर ने उसके कान के पास फुसफुसाया। उसके होंठ अनामिका के कान की बाली और गर्दन की नज़ाकत को छूते हुए गुज़रे। उस छुअन ने अनामिका के जिस्म में एक नशा घोल दिया। अनामिका ने अपनी दोनों बाहें मयूर की पीठ पर कस दीं। उसका पूरा बदन मयूर की बाहों में मोम की तरह पिघलने लगा था।
मयूर ने अपनी उंगलियां अनामिका के बालों में उलझा दीं और उसके चेहरे को हल्के से ऊपर उठाया। कमरे की हल्की रोशनी में अनामिका का चेहरा दमक रहा था। उसकी पलकें भारी थीं और उसके गुलाबी, रसीले होठ प्यास की नमी से कांप रहे थे। निचले होंठ पर ठहरा हल्का सा कंपकंपाहट मयूर के सब्र को आज़मा रहा था।
मयूर ने अपनी नज़रें उसके होठों पर टिका दीं। उसने अपने अंगूठे से अनामिका के निचले होंठ को हौले से सहलाया। अनामिका की सांसें उखड़ रही थीं। अब दूरी बर्दाश्त से बाहर थी।
मयूर ने अपने गर्म, बेकरार होंठ अनामिका के कांपते होठों पर रख दिए।
पहला स्पर्श इतना गहरा, कोमल और मदहोश कर देने वाला था कि दोनों की दुनिया उसी पल ठहर गई। अनामिका के होंठों की मिठास किसी अमृत जैसी थी, जिसे मयूर बूंद-बूंद करके अपने भीतर उतार रहा था। अनामिका ने अपने होठों को पूरी तरह मयूर के हवाले कर दिया। चुंबन की गहराई में दोनों की सांसें एक हो गईं। मयूर का एक हाथ उसकी कमर को और कसकर थामे हुए था, जबकि दूसरा हाथ उसके चेहरे और गर्दन को सहला रहा था।
कमरे की ठंडक उस मिलन की तपिश में कहीं खो चुकी थी। बारिश की आवाज़ अब उस सुरूर की पृष्ठभूमि बन गई थी, जहां दो रूहें अपने बदन के हर दायरे को तोड़कर एक-दूसरे के अक्स में घुल रही थीं। वह रात सिर्फ दो जिस्मों की नहीं, बल्कि उस अनकहे, बेबाक प्रेम की थी जो पैरों की पहली छुअन से शुरू होकर होठों के अमर मिलन पर जाकर पूरी हुई थी।