Papa's scooter in Hindi Short Stories by Chandni choudhary books and stories PDF | पापा का स्कूटर

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पापा का स्कूटर

पापा का स्कूटर

बचपन से लेकर आज तक मैंने पापा को एक स्कूटर के साथ देखा है—वही स्कूटर, जो उनके लिए केवल आने-जाने का साधन नहीं था, बल्कि उनके जीवन की अनेक यादों का साथी था। वह उनका सबसे पसंदीदा स्कूटर था, क्योंकि वह उनके जीवन में खरीदी गई पहली बड़ी चीज़ों में से एक था। शायद इसीलिए उससे उनका लगाव कुछ अलग ही था।

उसी स्कूटर पर बैठकर हम बाजार जाया करते थे। उसी पर पापा हमें स्कूल छोड़ने जाते, मम्मी को खरीदारी के लिए ले जाते और कभी समय मिलता तो परिवार के साथ घूमने भी निकल पड़ते। हमारे बचपन की न जाने कितनी स्मृतियाँ उस स्कूटर की आवाज़ और उसके सफर के साथ जुड़ी हुई हैं।

मेरे पापा—मोहित चौधरी—एक बैंक मैनेजर थे। अपने काम के प्रति वे हमेशा ईमानदार और अनुशासित रहे। समय पर बैंक पहुँचना, समय पर अपना कार्य करना और अपने दायित्वों को पूरी निष्ठा से निभाना उनके जीवन का नियम था। वे अपने काम में कभी किसी को शिकायत का अवसर नहीं देते थे।

समय का पालन करना उन्होंने केवल अपने जीवन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि हमें भी यही शिक्षा दी। उनके लिए समय की पाबंदी केवल आदत नहीं, जीवन का एक सिद्धांत थी।

लेकिन एक दिन इसी सिद्धांत के सामने उनकी बेटी खड़ी थी।

उस दिन मैं, साक्षी, स्कूल के लिए देर से हो गई थी। मेरी बस निकल चुकी थी। मैं घबरा गई थी कि कहीं स्कूल भी न छूट जाए। मम्मी ने जल्दी से मेरा टिफिन लगाया और पापा से कहा—

“आप साक्षी को स्कूल छोड़ आइए, वह देर हो गई है। अगर अभी नहीं गई तो उसका स्कूल छूट जाएगा।”

पापा ने पहले अपनी घड़ी की ओर देखा। उनके चेहरे पर वही दृढ़ता थी, जो हमेशा समय के प्रति रहती थी। उन्होंने कहा—

“मैंने आज तक ऐसा नहीं किया कि अपने समय का पालन न करूँ। अगर आज साक्षी को छोड़ने जाऊँगा, तो मेरा पूरा समय-नियम टूट जाएगा।”

लेकिन फिर उन्होंने मेरी ओर देखा।

शायद उस एक पल में उनके भीतर का अनुशासन और पिता का स्नेह आमने-सामने खड़े थे।

उन्होंने मेरे चेहरे पर चिंता देखी। शायद उन्हें लगा कि नियम अपने स्थान पर है, लेकिन बेटी का भविष्य उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

और फिर उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया।

जिस व्यक्ति ने जीवन भर समय का पालन किया था, उसी ने उस दिन अपनी बेटी के लिए अपने नियम में थोड़ी देर की जगह बना ली।

पापा ने मुझे अपने उसी प्रिय स्कूटर पर बैठाया और स्कूल छोड़ने निकल पड़े।

उस दिन मैंने जाना कि पिता का प्रेम हमेशा शब्दों में दिखाई नहीं देता। कभी-कभी वह अपने बनाए हुए नियम को तोड़कर भी दिखाई देता है।

वह स्कूटर उस दिन मेरे लिए केवल स्कूल जाने का साधन नहीं था। वह मेरे पिता के स्नेह का वाहन बन गया था।

एक पिता अपने बच्चों के लिए जीवन भर इसी तरह चलता रहता है। वह अपने सपनों को पीछे रखकर हमारे सपनों को आगे बढ़ाता है। अपने सुखों को छोटा करके हमारे सुखों के लिए जगह बनाता है।

जब कोई पिता अपने घर का निर्माण करता है, तो उसमें केवल ईंट-पत्थर नहीं लगते। उसमें उसके दिन-रात का श्रम, उसकी मेहनत और उसके पसीने की एक-एक बूंद शामिल होती है। जिस घर की छत के नीचे हम सुरक्षित होकर रहते हैं, उसकी दीवारों में पिता के संघर्ष की अनगिनत कहानियाँ छिपी होती हैं।

उस घर का हर कोना उनकी मेहनत का साक्षी होता है।

पिता हमारे जीवन में उस मार्गदर्शक की तरह होते हैं, जो स्वयं धूप में खड़े होकर हमें छाँव देते हैं। वे हमें केवल मंजिल तक पहुँचने का रास्ता नहीं दिखाते, बल्कि गिरने पर उठना, कठिनाइयों में डटे रहना और अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाना भी सिखाते हैं।

मेरे लिए पापा का वह स्कूटर आज भी केवल एक पुराना वाहन नहीं है।

उसके साथ मेरा बचपन जुड़ा है, स्कूल की यादें जुड़ी हैं, बाजार के छोटे-छोटे सफर जुड़े हैं, मम्मी के साथ घूमने की यादें जुड़ी हैं और सबसे बढ़कर—पापा का प्यार जुड़ा है।

आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि वह स्कूटर सड़कों पर ही नहीं चलता था।

वह हमारे बचपन को अपने साथ लेकर चलता था।

और शायद पिता भी ऐसे ही होते हैं—

वे हमें अपनी उँगली पकड़कर चलना सिखाते हैं,
फिर रास्ता दिखाते हैं,
और जब हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ने लगते हैं,
तो स्वयं पीछे रहकर हमारी राह देखते रहते हैं।

पापा का वह स्कूटर आज भी मेरी स्मृतियों में चलता है—
कभी स्कूल की ओर,
कभी बाजार की ओर,
कभी परिवार की खुशियों की ओर,
और कभी उस बचपन की ओर,
जहाँ पापा के साथ बैठकर मुझे लगता था—
दुनिया की हर राह आसान है।