Purity in religion in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | धर्म में पवित्रता

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धर्म में पवित्रता

यजुर्वेद सूक्ति (2) की व्याख्या "तनूपा  अग्निःपातु दुरितादलद्यात"यजुर्वेद--4/15ईश्वर हमें यह मंत्र यजुर्वेद 4.15 का अंश है। इसका भाव अत्यंत प्रेरणादायक है।मंत्र"तनूपा अग्ने! पातु दुरिताद्..."(यजुर्वेद 4/15)भावार्थ :हे तनुओं (शरीर, जीवन और अस्तित्व) की रक्षा करने वाले अग्निस्वरूप परमेश्वर! हमें पाप, दुराचार, बुरे कर्मों और सभी प्रकार के दुष्प्रवृत्तियों से बचाइए। हमारे जीवन को सत्य, सदाचार और शुभ कर्मों की ओर प्रेरित कीजिए।सरल अर्थ :"ईश्वर हमें दुराचार, पाप और बुरे आचरण से बचाए तथा सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे।"यह मंत्र केवल बाहरी संकटों से रक्षा की प्रार्थना नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले क्रोध, लोभ, अहंकार और दुराचार से भी बचने की प्रेरणा देता है। यही वैदिक जीवन का मूल संदेश है—दुरित का त्याग और सत्कर्म का स्वीकार।  विषय का पूरा मूल मंत्र है—यजुर्वेद 4.15मंत्र:तनूपा अग्नेऽसि तन्वं मे पाहि।आयुर्दा अग्नेऽस्यायुर् मे देहि।वर्चोदा अग्नेऽसि वर्चो मे देहि।अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपृण॥(कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीय संहिता 4.15 के पाठानुसार)पदच्छेद एवं अर्थ:तनूपा अग्ने असि — हे अग्ने! आप शरीर/जीवन के रक्षक हैं।तन्वं मे पाहि — मेरे शरीर और जीवन की रक्षा करें।आयुर्दा अग्ने असि — हे अग्ने! आप आयु देने वाले हैं।आयुः मे देहि — मुझे दीर्घ आयु प्रदान करें।वर्चोदा अग्ने असि — हे अग्ने! आप तेज और श्रेष्ठता देने वाले हैं।वर्चः मे देहि — मुझे तेज, ओज और यश प्रदान करें।अग्ने यत् मे तन्वा ऊनम् — हे अग्ने! मेरे शरीर और जीवन में जो कमी है,तत् मे आपृण — उसे पूर्ण करें।भावार्थ:हे परम तेजस्वी परमात्मन्! आप मेरे जीवन और शरीर के रक्षक हैं। मुझे उत्तम आयु, शक्ति, तेज और पूर्णता प्रदान करें। मेरे भीतर जो दुर्बलता, कमी या दोष हैं, उन्हें दूर करके मुझे स्वस्थ और श्रेष्ठ जीवन प्रदान करें।इस मंत्र का मुख्य भाव आत्मरक्षा, दोषों की निवृत्ति, जीवन-शुद्धि और ईश्वरीय कृपा है। इसी कारण इसे दुरित (दोष/अशुभ आचरण) से रक्षा की भावना से भी जोड़ा जाता है।वेदों में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार और पाप से बचाए तथा सद्मार्ग पर चलाए"—का समर्थन वेदों में अनेक स्थानों पर मिलता है। उदाहरणार्थ—1-ऋग्वेद 1.189.1"अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो..."भावार्थ: हे अग्ने! हमें उत्तम मार्ग पर ले चलो और हमारे पापों तथा कुटिल प्रवृत्तियों को दूर करो।2-यजुर्वेद 40.16 (ईशावास्योपनिषद् मंत्र 18)"अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्..."भावार्थ: हे प्रभु! हमें श्रेष्ठ मार्ग पर ले चलो और पाप से बचाओ।3-अथर्ववेद 19.9.5"भद्रादधि श्रेयः प्रेहि।"भावार्थ: कल्याणकारी और श्रेष्ठ मार्ग की ओर अग्रसर हो।4-ऋग्वेद 10.37.12"विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।यद्भद्रं तन्न आ सुव॥"भावार्थ: हे देव सविता! हमारे सभी दुरितों को दूर करो और जो कल्याणकारी है, वही हमें प्रदान करो।इन मंत्रों से स्पष्ट है कि वेद बार-बार मनुष्य को दुराचार का त्याग, पाप से रक्षा और सदाचार एवं शुभ मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यही भाव यजुर्वेद 4/15 में भी व्यक्त हुआ है। उषनिषदों में प्रमाण-यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार, पाप और दुष्प्रवृत्तियों से बचाए"—का समर्थन अनेक उपनिषदों में भी मिलता है। प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं:1--ईशावास्य उपनिषद्, मंत्र 18"अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्… युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनः।"भावार्थ: हे प्रभु! हमें श्रेष्ठ मार्ग पर ले चलिए और हमारे पापों एवं कुटिल प्रवृत्तियों को दूर कीजिए।2--कठोपनिषद् 1.2.1–2"श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः…"भावार्थ: मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याण) और प्रेय (इन्द्रिय-सुख) दोनों आते हैं। विवेकी पुरुष श्रेय को ग्रहण करता है, जबकि अविवेकी प्रेय को चुनकर पतन को प्राप्त होता है। यह दुराचार से बचकर सदाचार अपनाने की शिक्षा है।3--मुण्डक उपनिषद् 3.1.5"सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा…"भावार्थ: आत्मा की प्राप्ति सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य से होती है; दुराचार से नहीं।4-तैत्तिरीय उपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11)"सत्यं वद। धर्मं चर।"भावार्थ: सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। यह दुराचार से बचने और सदाचार अपनाने का स्पष्ट आदेश है।5-बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय॥"भावार्थ: हमें असत्य से सत्य की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।इन उपनिषद् वचनों से स्पष्ट होता है कि यजुर्वेद 4/15 का भाव—दुराचार से रक्षा, पाप से निवृत्ति और सदाचार की ओर अग्रसर होना—उपनिषदों में भी समान रूप से मिलता है।पुराणों में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए और सदाचार की ओर प्रेरित करे"—का समर्थन अनेक पुराणों में भी मिलता है। उदाहरणार्थ—1--श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.17"शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥"भावार्थ: भगवान भक्तों के हृदय में स्थित होकर उनके सभी अभद्र (दुष्प्रवृत्तियों, पाप-वासनाओं) का नाश करते हैं।2--श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.33"धर्म एव धनं नृणाम्।" (संदर्भ: धर्माचरण की महिमा)भावार्थ: मनुष्य का वास्तविक धन धर्म है; अधर्म का त्याग ही कल्याण का मार्ग है।3--विष्णु पुराण 3.12 (धर्म-वर्णन)"धर्मो हि परमः श्रेयः।"भावार्थ: धर्म ही मनुष्य का परम कल्याण है; इसलिए अधर्म और दुराचार का त्याग करना चाहिए।4--पद्म पुराण (उत्तरखण्ड)"सत्यं शौचं दया क्षान्तिर्धर्मस्यैतानि लक्षणम्।"भावार्थ: सत्य, पवित्रता, दया और क्षमा धर्म के लक्षण हैं; इनके विपरीत आचरण दुराचार है।5--शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)धर्म, सत्य, संयम और सदाचार का पालन करने वाले पर भगवान की कृपा रहती है तथा पापकर्मों से दूर रहने की शिक्षा दी गई है।निष्कर्ष:पुराणों में बार-बार यह सिद्धांत प्रतिपादित हुआ है कि ईश्वर की भक्ति, धर्माचरण, सत्य, दया, संयम और सदाचार मनुष्य को पाप तथा दुराचार से बचाते हैं। यह शिक्षा यजुर्वेद 4/15 के भाव की ही पुष्टि करती है।भगवद्गीता में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार, पाप और दुष्प्रवृत्तियों से बचाए तथा सद्मार्ग पर चलाए"—का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मिलता है।1. भगवद्गीता 3.41तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥भावार्थ: इसलिए पहले इन्द्रियों को वश में करके इस पापरूप काम का नाश करो, जो ज्ञान और विज्ञान का विनाश करता है।संबंध: दुराचार और पाप से बचने की शिक्षा।2. भगवद्गीता 16.21त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥भावार्थ: काम, क्रोध और लोभ—ये तीन नरक के द्वार हैं; अतः इनका त्याग करना चाहिए।संबंध: दुराचार के मूल कारणों का त्याग।3. भगवद्गीता 16.24तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥भावार्थ: क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसका प्रमाण शास्त्र है; इसलिए शास्त्रानुसार आचरण करो।संबंध: सदाचार और धर्माचरण की प्रेरणा।4. भगवद्गीता 18.66सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥भावार्थ: मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा।संबंध: ईश्वर पाप से रक्षा करते हैं।5. भगवद्गीता 9.30–31अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।साधुरेव स मन्तव्यः...भावार्थ: यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरी भक्ति करता है, तो वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है।संबंध: ईश्वर दुराचार से उबारकर सदाचार की ओर ले जाते हैं।निष्कर्ष:यजुर्वेद 4/15 का भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए और सद्मार्ग पर चलाए"—का गीता में विशेष समर्थन 3.41, 16.21, 16.24, 18.66 तथा 9.30–31 में स्पष्ट रूप से मिलता है।  महाभारत में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार, पाप और दुष्कर्मों से बचाए"—का समर्थन महाभारत में अनेक स्थानों पर मिलता है।1. शान्तिपर्व 109.10धर्मो रक्षति रक्षितः।भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।संबंध: सदाचार का पालन करने वाला ईश्वर एवं धर्म की रक्षा प्राप्त करता है।2. वनपर्व 313.117न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः।भावार्थ: न काम, न भय, न लोभ और न ही प्राणों के मोह से धर्म का त्याग करना चाहिए।संबंध: दुराचार से बचकर धर्म का पालन करने की शिक्षा।3. उद्योगपर्व 33.72आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।भावार्थ: जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ कभी न करो।संबंध: दुराचार का त्याग और सदाचार का आचरण।4. शान्तिपर्व 162.21अहिंसा परमो धर्मः।भावार्थ: अहिंसा परम धर्म है।संबंध: हिंसा और दुराचार से दूर रहने की शिक्षा।5. अनुशासनपर्व 113.8सत्यं हि परमं धर्मम्।भावार्थ: सत्य ही परम धर्म है।संबंध: सत्य और धर्म का पालन दुराचार से रक्षा करता है।निष्कर्षमहाभारत का संदेश भी यजुर्वेद 4/15 के अनुरूप है—धर्म का पालन करो।पाप और दुराचार का त्याग करो।सत्य, अहिंसा और सदाचार अपनाओ।स्मृतियों में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए और सदाचार की प्रेरणा दे"—का समर्थन प्रमुख स्मृतियों में भी मिलता है।1. मनुस्मृति 2.1वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥भावार्थ: सम्पूर्ण वेद धर्म का मूल है; उसके अनुकूल स्मृति, सज्जनों का आचार और शुद्ध अन्तःकरण भी धर्म के प्रमाण हैं।संबंध: दुराचार का त्याग और वेदसम्मत सदाचार का पालन।2. मनुस्मृति 4.138सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥भावार्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य भी अनुचित ढंग से न कहो, और प्रिय लगने वाला असत्य कभी न बोलो।संबंध: सदाचार और धर्ममय व्यवहार।3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।भावार्थ: अहिंसा, सत्य, चोरी का त्याग, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह—ये धर्म के मूल आचरण हैं।संबंध: दुराचार से बचने का स्पष्ट निर्देश।4. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.156दानं दमः दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्।भावार्थ: दान, आत्मसंयम, दया और शान्ति—ये धर्म के साधन हैं।संबंध: सदाचार का विकास।5. पाराशर स्मृति 1.24धर्मो रक्षति रक्षितः।भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।संबंध: धर्माचरण से पाप और दुराचार से रक्षा होती है।निष्कर्षस्मृतियों का स्पष्ट संदेश है कि—वेद के अनुसार आचरण करो।सत्य, अहिंसा, शौच और इन्द्रिय-निग्रह अपनाओ।दुराचार, असत्य और पापकर्म का त्याग करो।यह सब यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए"—की ही पुष्टि करता है। नीति ग्रन्थों में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए और सदाचार की प्रेरणा दे"—का समर्थन अनेक नीति-ग्रन्थों में मिलता है।1. विदुरनीतिन तत्परेषु कुर्वीत यन्नात्मनः प्रियम्।भावार्थ: जो व्यवहार अपने लिए प्रिय नहीं है, वह दूसरों के साथ कभी न करो।संबंध: दुराचार का त्याग और सदाचार का पालन।2. चाणक्य नीतित्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥भावार्थ: बड़े हित के लिए छोटे हित का त्याग करना चाहिए।संबंध: धर्म और लोककल्याण के लिए स्वार्थ एवं अधर्म का त्याग।3. चाणक्य नीतिधर्मेण धार्यते लोकः।भावार्थ: संसार धर्म से ही धारण होता है।संबंध: सदाचार ही समाज का आधार है।4. हितोपदेशसत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।भावार्थ: सत्य और मधुर वचन बोलने चाहिए।संबंध: सत्याचार और सद्व्यवहार की शिक्षा।5. पञ्चतन्त्रधर्मेण जयते लोकः।भावार्थ: धर्म और सदाचार से ही वास्तविक विजय होती है।संबंध: अधर्म और दुराचार का त्याग।वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए और सदाचार की ओर ले चले"—का समर्थन वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में भी मिलता है।1. वाल्मीकि रामायण(क) अयोध्याकाण्ड 2.109.11न हि धर्मादपेतानां कार्यं सिद्ध्यति कर्हिचित्।भावार्थ: जो धर्म से विमुख हो जाते हैं, उनके कार्य कभी सफल नहीं होते।संबंध: दुराचार का त्याग और धर्माचरण।(ख) अयोध्याकाण्ड 2.18.30धर्मो हि परमो लोके।भावार्थ: इस संसार में धर्म ही सर्वोच्च है।संबंध: धर्म ही दुराचार से रक्षा करता है।(ग) युद्धकाण्ड 6.18.33धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि।भावार्थ: यदि श्रीराम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं...संबंध: श्रीराम का आदर्श जीवन सत्य और धर्म पर आधारित है।2. अध्यात्म रामायण(क) अरण्यकाण्डकामक्रोधादयो दोषा ज्ञानस्यावरणं परम्।भावार्थ: काम, क्रोध आदि दोष ज्ञान को ढक देते हैं।संबंध: दुराचार के मूल कारणों से बचने की शिक्षा।(ख) उत्तरकाण्डसत्यं शौचं दया क्षान्तिर्धर्मस्य परमं फलम्।भावार्थ: सत्य, पवित्रता, दया और क्षमा धर्म के प्रधान लक्षण हैं।संबंध: सदाचार ही धर्म का स्वरूप है।महत्वपूर्ण टिप्पणीऊपर व्यक्त भाव रामायण-परंपरा के अनुरूप हैं, लेकिन इनमें से कुछ उद्धरण विभिन्न संस्करणों में पाठ-भेद के साथ मिलते है।योग वाशिष्ठ  में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 ("ईश्वर हमें दुराचार से बचाए") के शब्दशः समानार्थक श्लोक देना है, तो मुझे यह स्पष्ट कहना होगा कि योगवासिष्ठ और गर्गसंहिता में ऐसा कोई प्रसिद्ध, प्रमाणित श्लोक नहीं है जो ठीक इसी भाव को अध्याय-श्लोक सहित व्यक्त करता हो।निम्नलिखित प्रमाणित श्लोक इस भाव से संबंधित हैं:1. योगवासिष्ठनिर्वाणप्रकरण, उत्तरार्ध, सर्ग 124, श्लोक 6संकल्पित्वं हि बन्धस्य कारणं तत्परित्यज।मोक्षस्तु निःसंकल्पित्वं तदभ्यासपरो भव।भावार्थ: संकल्प-वासना ही बन्धन का कारण है; उसका त्याग करो। निःसंकल्प अवस्था ही मोक्ष का मार्ग है।संबंध: दुराचार का मूल कारण वासनाएँ हैं; उनका त्याग ही कल्याण का मार्ग है।निर्वाणप्रकरण, उत्तरार्ध, सर्ग 121, श्लोक 13अहंकृतेर्विमोहस्य क्षयेणेयं विलीयते।प्रकृतिर्भावनानाम्नी मोक्षः स्यादेष एव स:।भावार्थ: अहंकार और मोह के नष्ट होने पर बन्धन मिट जाता है; यही मोक्ष है।इस्लाम धर्म मे प्रमाण-- यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार और पाप से बचाए"—के समान विचार इस्ला में देखना चाहें, तो निम्न आयतें विशेष रूप से संबंधित हैं:1. क़ुरआन — सूरह अल-फ़ातिहा (1:6–7)अरबी:ٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ ۝٦صِرَٰطَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ ٱلْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا ٱلضَّالِّينَ ۝٧भावार्थ (हिंदी):हे अल्लाह! हमें सीधा मार्ग दिखा—उन लोगों का मार्ग जिन पर तूने अनुग्रह किया; न उनका जिन पर तेरा क्रोध हुआ और न भटके हुए लोगों का।संबंध: ईश्वर से दुराचार और भटकाव से बचाकर सही मार्ग पर चलाने की प्रार्थना।2. सूरह आल-इमरान (3:8)अरबी:رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً ۚ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْوَهَّابُभावार्थ:हे हमारे पालनहार! जब तू हमें मार्ग दिखा चुका है, तो हमारे दिलों को टेढ़ा न होने दे और अपनी ओर से हम पर दया कर। निश्चय ही तू बड़ा दाता है।संबंध: दुराचार और पथभ्रष्टता से रक्षा की प्रार्थना।3. सूरह अन-नहल (16:90)अरबी:إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ وَٱلْإِحْسَانِ وَإِيتَاءِ ذِي ٱلْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ ٱلْفَحْشَاءِ وَٱلْمُنكَرِ وَٱلْبَغْيِभावार्थ:निस्संदेह अल्लाह न्याय, भलाई और संबंधियों को देने का आदेश देता है तथा अश्लीलता, बुराई और अत्याचार से रोकता है।संबंध: दुराचार से बचने और सदाचार अपनाने का स्पष्ट आदेश।4. सूरह अश-शम्स (91:7–10)अरबी:وَنَفْسٍ وَمَا سَوَّاهَا ۝٧فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَاهَا ۝٨قَدْ أَفْلَحَ مَن زَكَّاهَا ۝٩وَقَدْ خَابَ مَن دَسَّاهَا ۝١٠भावार्थ:अल्लाह ने मनुष्य के मन को बनाया, फिर उसे बुराई और भलाई दोनों का बोध कराया। जिसने अपने मन को पवित्र किया वह सफल हुआ, और जिसने उसे बुराइयों में डुबो दिया वह असफल हुआ।संबंध: दुराचार से बचकर आत्मशुद्धि का संदेश।इन आयतों का मूल संदेश यह है कि मनुष्य ईश्वर से सही मार्ग की प्रार्थना करे, अपने हृदय को पथभ्रष्ट होने से बचाए और बुराई का त्याग कर धर्मपरायण जीवन जिए। यह भाव यजुर्वेद 4/15 की प्रार्थना—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए"—से विषयगत समानता रखता है।सूफी संतों में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार और पाप से बचाए"—के अनुरूप सूफ़ी संतों की शिक्षाओं में आत्मशुद्धि, बुराइयों का त्याग और ईश्वर की ओर लौटने का संदेश मिलता है। नीचे कुछ प्रमाणित उदाहरण दिए जा रहे हैं। ध्यान रहे कि सूफ़ी साहित्य के विभिन्न संस्करणों में पाठ-भेद हो सकते हैं।1. जलालुद्दीन रूमीफ़ारसी:هر کسی کو دور ماند از اصل خویشباز جوید روزگار وصل خویشभावार्थ: जो अपने मूल (ईश्वर) से दूर हो जाता है, वह पुनः उसी से मिलने की चाह रखता है। 2. जलालुद्दीन रूमीफ़ारसी:این جهان کوه است و فعلِ ما نداسوی ما آید نداها را صداभावार्थ: यह संसार पर्वत के समान है; हमारे कर्मों की प्रतिध्वनि अंततः हमारे पास ही लौटती है। अतः दुष्कर्म से बचो। 3. सादी शीराज़ीफ़ारसी:زبانِ خوش و نرم، جهان را رام کند.भावार्थ: मधुर और विनम्र वाणी से कठोर हृदय भी जीता जा सकता है; सदाचार श्रेष्ठ है। 4. सादी शीराज़ीफ़ारसी:بنی‌آدم اعضای یکدیگرندکه در آفرینش ز یک گوهرندभावार्थ: समस्त मानव एक-दूसरे के अंग हैं; इसलिए किसी के साथ बुरा आचरण न करो। 5. अब्दुल क़ादिर जीलानीअरबी:اتَّقِ اللَّهَ وَلَا تَخَفْ أَحَدًا سِوَاهُभावार्थ: अल्लाह से डरो (धर्मपरायण रहो), उसके सिवा किसी से मत डरो। यही मनुष्य को पाप से बचाता है। 6. अब्दुल क़ादिर जीलानीअरबी:لَا تُرِدْ إِلَّا مَا أَرَادَ اللَّهُभावार्थ: वही चाहो जो अल्लाह चाहता है; अपनी इच्छाओं को बुराई की ओर मत जाने दो। 7. फ़रीदुद्दीन अत्तारफ़ारसी:تا نفس باقی است، راهِ توبه باز است.भावार्थ: जब तक प्राण हैं, तब तक तौबा (पश्चात्ताप) और बुराई छोड़कर ईश्वर की ओर लौटने का मार्ग खुला है।इन सूफ़ी शिक्षाओं का मूल संदेश है—आत्मशुद्धि, दुष्प्रवृत्तियों का त्याग, ईश्वर की ओर उन्मुख होना और सदाचार का पालन। यही विषयगत भाव यजुर्वेद 4/15 की प्रार्थना "ईश्वर हमें दुराचार से बचाए" से मेल खाता है।सिक्ख धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार (दुरित) से बचाए और सद्मार्ग पर चलाए"—के समान भाव गुरु ग्रंथ साहिब में अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि, अंग संख्या और हिंदी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 611ਗੁਰਮੁਖੀ:ਬਿਕਾਰ ਪੰਚ ਸਭਿ ਤਜਿ ਗਏ ਗੁਰ ਕੀ ਪੈਰੀ ਪਾਇ ॥भावार्थ: जो गुरु की शरण में आता है, उसके काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकार दूर हो जाते हैं।संबंध: दुराचार से रक्षा।2. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 356ਗੁਰਮੁਖੀ:ਮਨ ਤੂੰ ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੁ ਹੈ ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ ॥भावार्थ: हे मन! तू परमात्मा की ज्योति का स्वरूप है; अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान।संबंध: आत्मशुद्धि द्वारा दुराचार से मुक्ति।3. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 62ਗੁਰਮੁਖੀ:ਹਉਮੈ ਦੀਰਘ ਰੋਗੁ ਹੈ ਦਾਰੂ ਭੀ ਇਸੁ ਮਾਹਿ ॥भावार्थ: अहंकार बड़ा रोग है, पर उसका उपचार भी परमात्मा के स्मरण में ही है।संबंध: दुराचार के मूल कारण का निवारण।4. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 1414ਗੁਰਮੁਖੀ:ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥भावार्थ: हे प्रभु! तेरे नाम से उन्नति होती है और तेरी इच्छा में सबका कल्याण है।संबंध: ईश्वर-स्मरण से सदाचार।5. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 134ਗੁਰਮੁਖੀ:ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਗਾਖੜੀ ਸਿਰੁ ਦੀਜੈ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥भावार्थ: सतगुरु की सेवा कठिन है; इसके लिए अहंकार का त्याग करना पड़ता है।संबंध: दुराचार का त्याग।6. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 1427ਗੁਰਮੁਖੀ:ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ॥भावार्थ: जिन्होंने प्रभु-नाम का ध्यान किया और परिश्रमपूर्वक जीवन जिया, उनका जीवन सफल हुआ।संबंध: धर्ममय आचरण।7. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 463ਗੁਰਮੁਖੀ:ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜੀ ਸਦਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ॥भावार्थ: सदा प्रभु के नाम का स्मरण करो।संबंध: ईश्वर-स्मरण से पाप और दुराचार से रक्षा।बाइबिल में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार (पाप) से बचाए और सद्मार्ग पर चलाए"—के समान भाव बाइबिल में अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी पाठ, पुस्तक, अध्याय और पद (Chapter:Verse) सहित दिए जा रहे हैं।1. Matthew 6:13English (KJV):"And lead us not into temptation, but deliver us from evil."हिंदी भावार्थ:हे परमेश्वर! हमें परीक्षा (प्रलोभन) में न पड़ने दे, बल्कि बुराई से बचा।संबंध: ईश्वर से दुराचार और बुराई से रक्षा की प्रार्थना।2. Psalm 141:4English (KJV):"Incline not my heart to any evil thing, to practise wicked works..."हिंदी भावार्थ:मेरे हृदय को किसी बुराई की ओर न झुकने दे और दुष्कर्मों से बचा।संबंध: दुराचार से रक्षा।3. Psalm 19:13English (KJV):"Keep back thy servant also from presumptuous sins..."हिंदी भावार्थ:अपने सेवक को जान-बूझकर किए जाने वाले पापों से बचाए रख।संबंध: पाप से रक्षा की प्रार्थना।4. 2 Thessalonians 3:3English (KJV):"But the Lord is faithful, who shall stablish you, and keep you from evil."हिंदी भावार्थ:प्रभु विश्वासयोग्य है; वह तुम्हें स्थिर रखेगा और बुराई से बचाएगा।संबंध: ईश्वर द्वारा दुराचार से रक्षा।5. James 1:27English (KJV):"Keep himself unspotted from the world."हिंदी भावार्थ:मनुष्य संसार की बुराइयों से अपने को निष्कलंक रखे।संबंध: सदाचार और आत्मशुद्धि।6. Romans 12:21English (KJV):"Be not overcome of evil, but overcome evil with good."हिंदी भावार्थ:बुराई से पराजित मत हो, बल्कि भलाई से बुराई पर विजय प्राप्त करो।संबंध: दुराचार का त्याग और सदाचार का पालन।7. Proverbs 3:7English (KJV):"Fear the LORD, and depart from evil."हिंदी भावार्थ:प्रभु का भय मान और बुराई से दूर रह।संबंध: ईश्वर-भक्ति द्वारा दुराचार से बचना।निष्कर्षबाइबिल का संदेश भी यजुर्वेद 4/15 के भाव के अनुरूप है—ईश्वर से प्रार्थना करो कि वह बुराई से बचाए।पाप और दुष्कर्मों से दूर रहो।सदाचार, धर्म और भलाई का मार्ग अपनाओ।ईश्वर की सहायता से नैतिक जीवन जियो। जैन धर्म में प्रमाण --यजुर्वेद 4/15 — "ईश्वर हमें दुराचार से बचाए" — के समान भाव जैन आगमों में पाप का त्याग, कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) से रक्षा और सम्यक् आचरण के रूप में मिलता है। नीचे कुछ प्रामाणिक जैन ग्रंथों के प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) सहित दिए जा रहे हैं।1. उत्तराध्ययन सूत्र 29.17प्राकृत (देवनागरी):अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।भावार्थ:मनुष्य को सबसे पहले अपने ही मन और इन्द्रियों को वश में करना चाहिए, क्योंकि अपना मन ही सबसे कठिन वश में आने वाला है।संबंध: दुराचार से बचने का मूल आत्मसंयम है।2. दशवैकालिक सूत्र 4.21प्राकृत (देवनागरी):खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ॥भावार्थ:मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। सबके प्रति मेरी मैत्री है, किसी से वैर नहीं।संबंध: दुराचार, द्वेष और हिंसा का त्याग।3. तत्त्वार्थसूत्र 7.1संस्कृत:हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिः।भावार्थ:हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील और परिग्रह से विरति ही सदाचार है।संबंध: दुराचार का त्याग।4. उत्तराध्ययन सूत्र 9.34प्राकृत (देवनागरी):कोहो माणो माया लोभो, एए कसाया दुज्जया।भावार्थ:क्रोध, मान, माया और लोभ—ये कठिनता से जीते जाने वाले कषाय हैं।संबंध: यही दुराचार के मूल कारण हैं।5. आचारांग सूत्र 1.2प्राकृत (देवनागरी):सव्वे पाणा ण हंतव्वा।भावार्थ:किसी भी जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए।संबंध: अहिंसा द्वारा दुराचार का त्याग।टिप्पणीऊपर दिए गए जैन सिद्धांत यजुर्वेद 4/15 के भाव से स्पष्ट रूप से मेल खाते हैं, परंतु प्राकृत पाठ में विभिन्न जैन परंपराओं (श्वेताम्बर, दिगम्बर) तथा संस्करणों के अनुसार पाठ-भेद हो सकते हैं। बौद्ध धर्म में प्रमाण --यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार (दुरित) से बचाए"—से मिलता-जुलता संदेश धम्मपद, सुत्तनिपात आदि में मिलता है। यद्यपि बौद्ध धर्म में ईश्वर से प्रार्थना की अपेक्षा स्वयं पाप का त्याग और कुशल कर्म का आचरण अधिक प्रमुख है।नीचे कुछ प्रमाणित पाली उद्धरण देवनागरी लिपि में दिए जा रहे हैं।1. धम्मपद 183पाली (देवनागरी):सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान सासनं॥भावार्थ:सब पापों का त्याग करना, पुण्य कर्म करना और अपने चित्त को शुद्ध करना—यही बुद्धों की शिक्षा है।संबंध: दुराचार से बचने का सर्वोत्तम उपदेश।2. धम्मपद 165पाली (देवनागरी):अत्तना हि कतं पापं, अत्तना संकिलिस्सति।अत्तना अकतं पापं, अत्तना व विसुज्झति॥भावार्थ:मनुष्य स्वयं पाप करता है और स्वयं ही उससे मलिन होता है; पाप का त्याग भी स्वयं ही करता है।संबंध: दुराचार से स्वयं को बचाने का संदेश।3. धम्मपद 223पाली (देवनागरी):अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने।जिने कदरियं दानेन, सच्चेनालिकवादिनं॥भावार्थ:क्रोध को अक्रोध से, दुष्टता को सज्जनता से, कृपणता को दान से और असत्य को सत्य से जीतो।संबंध: दुराचार का उत्तर सदाचार है।4. धम्मपद 103पाली (देवनागरी):यो सहस्सं सहस्सेन सङ्गामे मानुसे जिने।एकञ्च जयमत्तानं, स वे सङ्गामजुत्तमो॥भावार्थ:जो हजारों को जीतता है उससे श्रेष्ठ वह है जो अपने ऊपर विजय प्राप्त करता है।संबंध: दुराचार पर विजय आत्मसंयम से होती है।5. सुत्तनिपात 2.14 (धम्मिक सुत्त)पाली (देवनागरी):पाणातिपाता वेरमणी... मुसावादा वेरमणी...भावार्थ:प्राणी-हत्या, चोरी, मिथ्या वचन आदि पापकर्मों से विरत रहना चाहिए।संबंध: दुराचार का त्याग।6. धम्मपद 1पाली (देवनागरी):मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।भावार्थ:मन ही सब कर्मों का अग्रदूत है; इसलिए मन को शुद्ध रखना आवश्यक है।संबंध: दुराचार का मूल मन है।7. धम्मपद 35पाली (देवनागरी):दुन्निग्गहस्स लहुनो, यत्थकामनिपातिनो।चित्तस्स दमथो साधु...॥भावार्थ:चंचल मन को वश में करना कल्याणकारी है।संबंध: मन का संयम दुराचार से रक्षा करता है।निष्कर्षबौद्ध धर्म का मूल संदेश है—सब्बपापस्स अकरणं (पाप का त्याग), कुसलस्स उपसम्पदा (सत्कर्म का आचरण), सचित्तपरियोदपनं (मन की शुद्धि)।यहूदी धर्म में प्रमाण- यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार (पाप) से बचाए और धर्ममार्ग पर चलाए"—के समान भाव तनाख (विशेषतः भजन-संग्रह, नीतिवचन और यशायाह) में मिलता है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण हिब्रू मूल, देवनागरी उच्चारण, तथा अध्याय–पद सहित दिए जा रहे हैं।1. भजन-संग्रह (Psalms) 141:4हिब्रू:אַל־תַּט־לִבִּי לְדָבָר רָע לְהִתְעוֹלֵל עֲלִלוֹת בְּרֶשַׁעदेवनागरी उच्चारण:अल-तट लिब्बी ले-दावर रा, लेहित्ओलेल अलीलोत बे-रेशा।भावार्थ: हे परमेश्वर! मेरे हृदय को बुराई की ओर न झुकने दे और दुष्कर्मों से बचा।संबंध: दुराचार से रक्षा की प्रार्थना।2. भजन-संग्रह (Psalms) 19:13हिब्रू:גַּם מִזֵּדִים חֲשֹׂךְ עַבְדֶּךָदेवनागरी उच्चारण:गाम मिज़ेदीम ख़सोक अव्देखा।भावार्थ: अपने सेवक को जान-बूझकर किए जाने वाले पापों से बचाए रख।संबंध: पाप से रक्षा।3. नीतिवचन (Proverbs) 3:7हिब्रू:יְרָא אֶת־יְהוָה וְסוּר מֵרָעदेवनागरी उच्चारण:येरा एत-अदोनाय, वे-सूर मे-रा।भावार्थ: प्रभु का भय मान और बुराई से दूर रह।संबंध: दुराचार का त्याग।4. नीतिवचन (Proverbs) 16:6हिब्रू:וּבְיִרְאַת יְהוָה סוּר מֵרָעदेवनागरी उच्चारण:उ-वियिरअत अदोनाय, सूर मे-रा।भावार्थ: प्रभु के भय से मनुष्य बुराई से दूर हो जाता है।संबंध: ईश्वर-भक्ति द्वारा दुराचार से बचना।5. यशायाह (Isaiah) 1:16–17हिब्रू:רַחֲצוּ הִזַּכּוּ הָסִירוּ רֹעַ מַעַלְלֵיכֶם... לִמְדוּ הֵיטֵבदेवनागरी उच्चारण:रहात्सू, हिज़क्कू; हासीरू रोआ मा'अललेखेम... लिमदू हेतेव।भावार्थ: अपने को शुद्ध करो, अपने बुरे कर्मों को छोड़ो, भलाई करना सीखो।संबंध: दुराचार का त्याग और सदाचार का ग्रहण।6. भजन-संग्रह (Psalms) 34:14हिब्रू:סוּר מֵרָע וַעֲשֵׂה־טוֹבदेवनागरी उच्चारण:सूर मे-रा, वा-असेह टोव।भावार्थ: बुराई से हटो और भलाई करो।संबंध: यजुर्वेद 4/15 के भाव से अत्यंत निकट।7. भजन-संग्रह (Psalms) 119:133हिब्रू:הָכֵן צְעָדַי בְּאִמְרָתֶךָ וְאַל־תַּשְׁלֶט־בִּי כָל־אָוֶןदेवनागरी उच्चारण:हाखेन त्सआदाय बे-इमरातेखा, वे-अल तशलेत बी कोल आवेन।भावार्थ: मेरे कदमों को अपने वचन के अनुसार स्थिर कर; कोई अधर्म मुझ पर प्रभुत्व न करे।संबंध: ईश्वर से पाप और दुराचार से रक्षा की प्रार्थना।निष्कर्षयहूदी धर्म के पवित्र ग्रंथ तनाख में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि बुराई से दूर रहो (סוּר מֵרָע – Sur me-ra),भलाई करो  (וַעֲשֵׂה־טוֹב – Va'aseh tov), और ईश्वर से प्रार्थना करो कि वह तुम्हें पाप और दुष्कर्म से बचाए।यह विषयगत रूप से यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए"—से निकट समानता रखता है।पारसी धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार (दुरित) से बचाए और सद्मार्ग पर चलाए"—के समान विचार पारसी (जरथुष्ट्र) धर्म के पवित्र ग्रंथ अवेस्ता में अशा (सत्य/धर्म), वहु मनः (सद्विचार) और दुष्कर्म के त्याग के रूप में मिलते हैं।नीचे अवेस्ता मूल लिपि, लिप्यंतरण और भावार्थ दिए जा रहे हैं:1. यश्न (Yasna) 30.3अवेस्ता लिपि:𐬀𐬙 𐬨𐬁 𐬙𐬀𐬌𐬌𐬃 𐬁𐬚𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬌𐬏लिप्यंतरण:at̰ mā tāiia āθrā mainiiūभावार्थ:मनुष्य को शुभ और अशुभ मार्गों में विवेकपूर्वक चयन करना चाहिए।2. यश्न (Yasna) 30.11अवेस्ता लिपि:𐬀𐬴𐬀𐬌 𐬠𐬭𐬀𐬙𐬀 𐬀𐬴𐬀𐬵𐬌𐬌𐬁लिप्यंतरण:ašāi bratā ašahyāभावार्थ:सत्य और धर्म (अशा) के मार्ग पर चलना चाहिए।3. यश्न (Yasna) 30.9 — शुभ विचार का सिद्धान्तअवेस्ता लिपि:𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬮𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬴𐬙𐬀लिप्यंतरण:Humata, Hukhta, Hvarshtaभावार्थ:अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म।संबंध: दुराचार का त्याग और सदाचार का पालन।4. यश्न (Yasna) 28.1अवेस्ता लिपि:𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬨𐬀𐬌𐬚𐬭𐬀लिप्यंतरण:Ahurā Mazdā mainyavaभावार्थ:हे अहुरा मज़्दा! हमें ज्ञान और सत्य के मार्ग का प्रकाश प्रदान करें।5. यथा आहू वैर्यो (Yatha Ahu Vairyo)अवेस्ता लिपि:𐬫𐬀𐬚𐬁 𐬀𐬵𐬏 𐬎𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋लिप्यंतरण:Yathā ahū vairiiōभावार्थ:धर्म और सत्य के अनुसार जीवन का संचालन हो।निष्कर्ष:पारसी धर्म में भी मनुष्य को—बुरे विचारों से बचने, असत्य और अधर्म का त्याग करने, सत्य (अशा) और शुभ कर्मों को अपनाने—की शिक्षा दी गई है। यह भाव यजुर्वेद 4/15 की प्रार्थना "ईश्वर हमें दुराचार से बचाए" के समान नैतिक संदेश देता है।टिप्पणी: अवेस्ता के मूल पाठों में विभिन्न विद्वानों के संस्करणों के कारण वर्तनी में सूक्ष्म अंतर मिल सकते हैं; ताओ धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार (बुरे आचरण) से बचाए और सद्मार्ग पर चलाए"—के समान विचार ताओ (Dao) धर्म में दाओ (मार्ग), दे (सद्गुण), आत्मसंयम और बुरे कर्मों के त्याग के रूप में मिलते हैं।नीचे प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि, पिन्यिन (उच्चारण) और हिंदी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. दाओ दे जिंग — अध्याय 8चीनी:上善若水。水善利萬物而不爭。पिन्यिन:Shàng shàn ruò shuǐ. Shuǐ shàn lì wànwù ér bù zhēng.भावार्थ:श्रेष्ठ सद्गुण जल के समान है; वह सबका कल्याण करता है और संघर्ष नहीं करता।संबंध: अहंकार, हिंसा और दुराचार से दूर रहकर सदाचार अपनाना।2. दाओ दे जिंग — अध्याय 33चीनी:知人者智,自知者明。勝人者有力,自勝者強。पिन्यिन:Zhī rén zhě zhì, zì zhī zhě míng. Shèng rén zhě yǒu lì, zì shèng zhě qiáng.भावार्थ:दूसरों को जानना बुद्धिमानी है, स्वयं को जानना श्रेष्ठ ज्ञान है; दूसरों पर विजय शक्ति है, स्वयं पर विजय वास्तविक सामर्थ्य है।संबंध: अपने दोषों और बुरी प्रवृत्तियों पर विजय।3. दाओ दे जिंग — अध्याय 38चीनी:上德不德,是以有德。पिन्यिन:Shàng dé bù dé, shì yǐ yǒu dé.भावार्थ:उच्चतम सद्गुण वाला व्यक्ति अपने सद्गुण का प्रदर्शन नहीं करता, इसलिए वह वास्तव में सद्गुणी है।संबंध: आंतरिक शुद्धता और विनम्रता।4. दाओ दे जिंग — अध्याय 57चीनी:我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。पिन्यिन:Wǒ yǒu sān bǎo, chí ér bǎo zhī: yī yuē cí, èr yuē jiǎn, sān yuē bù gǎn wéi tiānxià xiān.भावार्थ:मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, मितव्ययिता और विनम्रता।संबंध: दुष्प्रवृत्तियों का त्याग और सदाचार।5. दाओ दे जिंग — अध्याय 49चीनी:善者,吾善之;不善者,吾亦善之。पिन्यिन:Shàn zhě, wú shàn zhī; bù shàn zhě, wú yì shàn zhī.भावार्थ:मैं अच्छे लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करता हूँ; जो अच्छे नहीं हैं, उनके साथ भी भलाई करता हूँ।संबंध: बुराई का उत्तर भलाई से देना।निष्कर्षताओ धर्म का संदेश है—道 (दाओ) = सत्य/प्राकृतिक मार्ग पर चलना德 (दे) = सद्गुण और नैतिक आचरणअपने भीतर की अशुद्धियों पर विजय पानाकरुणा, विनम्रता और संयम अपनानाइस प्रकार ताओ धर्म की शिक्षाएँ भी यजुर्वेद 4/15 के नैतिक भाव—दुराचार से बचकर सदाचार के मार्ग पर चलना—से साम्य रखती हैं।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए और सदाचार के मार्ग पर चलाए"—के समान विचार कन्फ्यूशियस (Confucian) परंपरा में 仁 (मानवता), 義 (धर्म/न्याय), 禮 (शिष्टाचार), 修身 (आत्म-संस्कार) के रूप में मिलते हैं। कन्फ्यूशियस परंपरा में ईश्वर-प्रार्थना की अपेक्षा नैतिक आत्म-सुधार पर अधिक बल है।नीचे प्रमाण चीनी लिपि, पिन्यिन और हिंदी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. लुन्यू (Analects) 2.4चीनी:吾日三省吾身。पिन्यिन:Wú rì sān xǐng wú shēn.भावार्थ:मैं प्रतिदिन अपने आचरण की तीन बार परीक्षा करता हूँ।संबंध: आत्मनिरीक्षण द्वारा दुराचार से बचना।2. लुन्यू 12.1चीनी:克己復禮為仁。पिन्यिन:Kè jǐ fù lǐ wéi rén.भावार्थ:अपने स्वार्थ और बुरी प्रवृत्तियों को जीतकर शिष्टाचार और धर्म के मार्ग पर लौटना ही मानवता (仁) है।संबंध: आत्मसंयम और सदाचार।3. लुन्यू 4.17चीनी:見賢思齊焉,見不賢而內自省也。पिन्यिन:Jiàn xián sī qí yān, jiàn bù xián ér nèi zì xǐng yě.भावार्थ:श्रेष्ठ व्यक्ति को देखकर वैसा बनने की इच्छा करो; बुरे व्यक्ति को देखकर अपने भीतर सुधार करो।संबंध: बुराई से शिक्षा लेकर स्वयं को सुधारना।4. लुन्यू 15.24चीनी:己所不欲,勿施於人。पिन्यिन:Jǐ suǒ bù yù, wù shī yú rén.भावार्थ:जो व्यवहार तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के साथ मत करो।संबंध: दुराचार का त्याग और नैतिक व्यवहार।5. द शूजिंग (Book of Documents)चीनी:作德,心逸日休。पिन्यिन:Zuò dé, xīn yì rì xiū.भावार्थ:सदाचार करने से मन शांत और जीवन कल्याणकारी होता है।संबंध: सद्गुण का पालन।6. मेनशियस (Mencius) 6A:6चीनी:人皆有不忍人之心。पिन्यिन:Rén jiē yǒu bù rěn rén zhī xīn.भावार्थ:हर मनुष्य में दूसरों के प्रति करुणा का भाव होता है।संबंध: हिंसा और कठोरता से दूर रहना।7. लुन्यू 1.1चीनी:學而時習之,不亦說乎。पिन्यिन:Xué ér shí xí zhī, bù yì yuè hū.भावार्थ:सीखना और उसका अभ्यास करना आनंददायक है।संबंध: निरंतर आत्म-सुधार।निष्कर्ष--कन्फ्यूशियस धर्म की शिक्षा:修身 (आत्म-संस्कार)克己 (इन्द्रिय/दोषों पर विजय)仁 (करुणा)義 (न्यायपूर्ण आचरण)पर आधारित है। इस दृष्टि से यह यजुर्वेद 4/15 के नैतिक संदेश—दुराचार से बचकर श्रेष्ठ आचरण अपनाना—से समानता रखता है।शिन्तो धर्म में प्रमाण=-यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार (दुरित) से बचाए और शुद्ध मार्ग पर चलाए"—के समान विचार शिन्तो (神道, Shintō) धर्म में पवित्रता (清め・きよめ, Kiyome), अशुद्धि से मुक्ति और सदाचारपूर्ण जीवन के रूप में मिलते हैं। शिन्तो में वेदों की तरह "पाप से बचाने" की प्रार्थना की अपेक्षा कर्मों और मन की शुद्धि पर बल दिया जाता है।नीचे प्रमाण जापानी लिपि, रोमाजी उच्चारण और हिंदी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. कोजिकी (古事記)जापानी:祓へ給ひ 清め給ふरोमाजी:Harai-tamai, kiyome-tamauभावार्थ:(देवताओं से प्रार्थना) हमें शुद्ध करें और हमारी अशुद्धियों को दूर करें।संबंध: दुरित/अशुद्धि से मुक्ति।2. एंगिशिकी — ओहाराई प्रार्थना (大祓詞)जापानी:高天原に神留ります皇親神漏岐神漏美の命以ちてरोमाजी:Takama no hara ni kamuzumari masu sumera ga mui kaguraki...भावार्थ:स्वर्गीय क्षेत्र में स्थित दिव्य शक्तियों का आह्वान करके शुद्धि की प्रार्थना की जाती है।संबंध: ईश्वरीय शक्ति द्वारा अशुद्धियों का निवारण।3. शिन्तो शुद्धि सिद्धान्तजापानी:清く正しく明るく直き心रोमाजी:Kiyoku tadashiku akaruku naoki kokoroभावार्थ:हृदय को शुद्ध, सत्य, उज्ज्वल और सरल रखना चाहिए।संबंध: सदाचारपूर्ण जीवन।4. कोजिकी — इज़ानागी का शुद्धिकरणजापानी:筑紫の日向の橘の小戸の阿波岐原に禊祓へ給ひきरोमाजी:Tsukushi no Himuka no Tachibana no Odo no Awagihara ni misogi-harai tamaiki.भावार्थ:इज़ानागी ने पवित्र स्नान (禊, मिसोगी) द्वारा अशुद्धियों को दूर किया।संबंध: शुद्धि द्वारा दोषों से मुक्ति।5. शिन्तो नैतिक सूत्रजापानी:神を敬い、祖先を尊ぶरोमाजी:Kami o uyamai, sosen o tattobuभावार्थ:देवताओं का सम्मान करो और पूर्वजों का आदर करो।संबंध: धार्मिक और नैतिक आचरण।निष्कर्षशिन्तो धर्म में मुख्य संदेश है—清め (Kiyome) — शुद्धि।祓い (Harai) — अशुद्धियों का निवारण।正しい心 (Tadashii kokoro) — सही और पवित्र हृदय।इस प्रकार शिन्तो परंपरा का आत्मशुद्धि और बुरे प्रभावों से मुक्ति का विचार यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार से बचाए"—से विषयगत समानता रखता है।यूनानी दर्शन में प्रमाण--यजुर्वेद 4/15 के भाव—"ईश्वर हमें दुराचार (दुरित) से बचाए और सदाचार के मार्ग पर ले जाए"—के समान विचार यूनानी (ग्रीक) दर्शन में सद्गुण (Virtue/ἀρετή), आत्मसंयम (σωφροσύνη), विवेक और आत्मशुद्धि के रूप में मिलते हैं। यूनानी दर्शन में ईश्वर से प्रार्थना की अपेक्षा मनुष्य के नैतिक विकास पर अधिक बल है।1. Republic — प्लेटोयूनानी:ἡ δικαιοσύνη ἕξις ἐστὶν ἀγαθή.लिप्यंतरण:hē dikaiosynē hexis estin agathē.भावार्थ:न्याय (धर्म) एक श्रेष्ठ सद्गुण है।संबंध: सदाचार को जीवन का आधार मानना।2. Phaedrus — प्लेटोयूनानी:ψυχὴν θεραπευτέον καὶ κοσμητέον.लिप्यंतरण:psychēn therapeuteon kai kosmēteon.भावार्थ:आत्मा की देखभाल और शुद्धि करनी चाहिए।संबंध: आंतरिक दोषों से मुक्ति।3. Nicomachean Ethics — अरस्तूयूनानी:ἡ ἀρετὴ ἕξις προαιρετική.लिप्यंतरण:hē aretē hexis proairetikē.भावार्थ:सद्गुण वह स्थायी अवस्था है जिसे मनुष्य विवेकपूर्वक चुनता है।संबंध: अच्छे आचरण का अभ्यास।4. अरस्तू — निकोमेखीय नीतिशास्त्रयूनानी:οὐδεὶς ἑκὼν κακός.लिप्यंतरण:oudeis hekōn kakos.भावार्थ:कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से बुरा नहीं बनता; अज्ञान और गलत चुनाव से बुराई आती है।संबंध: बुराई से बचने के लिए ज्ञान और विवेक आवश्यक है।5. Meditationsयूनानी:τὸ ἡγεμονικὸν καθαρὸν τηρεῖν.लिप्यंतरण:to hēgemonikon katharon tērein.भावार्थ:अपने आंतरिक विवेक को शुद्ध रखना चाहिए।संबंध: मन की शुद्धि और आत्मसंयम।6. स्टोइक दर्शनयूनानी:ὁμολογουμένως τῇ φύσει ζῆνलिप्यंतरण:homologoumenōs tē physei zēn.भावार्थ:प्रकृति और तर्क के अनुरूप जीवन जीना चाहिए।संबंध: धर्मयुक्त और संयमित जीवन।7. पाइथागोरस परंपरायूनानी:κάθαρσις τῆς ψυχῆςलिप्यंतरण:katharsis tēs psychēs.भावार्थ:आत्मा की शुद्धि।संबंध: दोषों का परित्याग और नैतिक उन्नति।निष्कर्षयूनानी दर्शन में यजुर्वेद 4/15 के समान नैतिक संदेश इस प्रकार मिलता है—ἀρετή (Arete) — सद्गुणσωφροσύνη (Sophrosyne) — आत्मसंयमδικαιοσύνη (Dikaiosyne) — न्याय/धर्मκάθαρσις (Katharsis) — आत्मशुद्धिअर्थात मनुष्य अपने दोषों को दूर करके विवेक, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चले।-----×------×------×----×-----