motherless kitchen in Hindi Motivational Stories by sukhvinder Singh Rai books and stories PDF | ​बिन माँ की रसोई

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​बिन माँ की रसोई

घर में मेहमानों का ताँता लगा हुआ था और रसोई की पूरी कमान पड़ोस की ताईजी के हाथों में थी, क्योंकि माँ किसी पारिवारिक रिश्तेदार की शादी में शहर से बाहर गई हुई थीं। ताईजी ने मेहमानों की आवभगत के लिए बड़े चाव और मेहनत से शाही आलू-गोभी की लजीज सब्जी और तंदूर जैसी फूली हुई गर्मागर्म रोटियाँ तैयार की थीं। घर के डाइनिंग हॉल में मेहमानों की चहल-पहल परवान पर थी और उस स्वादिष्ट खाने की सोंधी-सोंधी खुशबू पूरे घर में महक रही थी। सब लोग अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठकर खाने का आनंद लेने के लिए तैयार थे।आर्यन ने अपनी थाली आगे बढ़ाई और उसमें बड़े करीने से खाना परोसा। उसने आलू-गोभी की सब्जी का एक टुकड़ा उठाया और रोटी के एक छोटे से हिस्से के साथ अपने मुँह में रखा। मसालों का संतुलन पूरी तरह से परफेक्ट था, आलू भी बिल्कुल सही तरीके से गले हुए थे, और देखने में वह निवाला बेहद आकर्षक लग रहा था। पर जैसे ही उसने उस निवाले को चबाकर गले से नीचे उतारने की कोशिश की, अचानक उसके कंधे ढीले पड़ गए, शरीर की सारी ऊर्जा जैसे गायब हो गई और उसके चेहरे पर एक गहरी तथा फीकी सी उदासी छा गई। उसने बिना कुछ कहे अपनी आँखें उठाईं और अपने ठीक सामने बैठी रिया की तरफ देखा।रिया ने आर्यन की आँखों की उस नमी और उसके उतरे हुए चेहरे को भांपने में बिल्कुल देर नहीं लगाई। उसने अपनी चम्मच प्लेट पर रखी और बेहद आहिस्ता से पूछा, "क्या बात है आर्यन? तुम अचानक ऐसे चुप क्यों हो गए? यह आलू-गोभी की सब्जी तो सचमुच बहुत शानदार बनी है, ताईजी ने इसे बनाने में वाकई बहुत मेहनत की है और हर कोई इसकी तारीफ कर रहा है।"आर्यन ने अपनी थाली की तरफ एक खाली और बेजान नजरों से देखते हुए धीरे से सिर हिलाया और कहा, "रिया, मैं जानता हूँ कि इस सब्जी में कोई कमी नहीं है। इसमें मसाले भी पूरे हैं, तेल भी सही मात्रा में है और स्वाद का परफेक्शन भी साफ झलक रहा है। पर सच कहूँ तो, इस खाने में वो 'जादू' और वो अपनापन नहीं है जो हमेशा माँ के हाथों के बने खाने में होता है। माँ जब घर पर होती हैं, तो वह चाहे बहुत ही साधारण सी लौकी की सूखी सब्जी या फिर बिल्कुल फीकी सी दाल-रोटी क्यों न बना दे, पर उसके हर एक निवाले में एक अलग ही सोंधापन, गर्माहट और अनोखी मिठास होती है। उन हाथों के जादू और बेपनाह प्यार के आगे तो ये छप्पन भोग भी बिल्कुल फीके और बेजान लगते हैं।"रिया ने आर्यन की इस बात को अपने दिल की गहराई से महसूस किया। उसने अपनी थाली से नजरें हटाईं और आर्यन की तरफ देखते हुए कहा, "बिल्कुल सही कहा तुमने आर्यन। माँ के हाथ के खाने का असली स्वाद किसी रेसिपी, महंगे मसालों या कुकिंग के हुनर में नहीं होता, बल्कि उनके अनमोल दुलार, हमारी छोटी-छोटी फिक्र और उनके आशीर्वाद में होता है। वो जिस बेइंतहा और निस्वार्थ प्यार से हमारे लिए रसोई में पसीना बहाती हैं, वही प्यार उस साधारण से खाने को भी हमारे लिए अमृत बना देता है। आज यह बेहतरीन दावत खाते हुए मुझे भी यह अहसास हो रहा है कि पेट चाहे कितनी भी चीजों से भर जाए, पर दिल की असली भूख तो सिर्फ माँ के हाथों के प्यार भरे कौर से ही शांत होती है।"आर्यन ने एक भारी मन से अपनी थाली में रखी रोटी का अगला टुकड़ा तोड़ा और धीमी आवाज़ में बोला, "सच कहा तुमने रिया, सच तो यह है कि माँ के बिना न तो इस रसोई में कोई रौनक है और न ही घर का यह माहौल पूरा लगता है। आज इस दावत के बीच यह बात पूरी तरह समझ आ गई कि माँ का इस घर में होना ही हमारी सबसे बड़ी बरकत और ज़िंदगी का असली स्वाद है।"**शायरी:**हाथों का हुनर तो बहुतों के पास है इस जहाँ में,पर माँ सा प्यार कहाँ मिलता है किसी और के हाथ के खाने में।**शिक्षा (Moral):**"माँ के हाथ का खाना सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि उनका आशीर्वाद होता है। दुनिया का कोई भी उम्दा रसोइया या कीमती पकवान कभी भी माँ की ममता और उनके हाथ के स्वाद की बराबरी नहीं कर सकता।"**लेखक की कलम से:**मेरे प्यारे पाठकों, माँ की असली अहमियत और उनकी कमी तब और भी ज्यादा शिद्दत से महसूस होती है, जब कभी उनके हाथों की पकाई हुई सादी रोटी के लिए भी घर में तरसना पड़ता है। सच बात तो यह है कि माँ का होना ही इस दुनिया में किसी भी इंसान के लिए सबसे बड़ी खुशहाली और सुकून है।आप हमारी कहानी पॉकेट एफएम पर भी सुन सकते हैं: 'हिडन डील: तलाश एक वारिस की', जिसके मुख्य किरदार कबीर और अनिका हैं।