आख़िरी कॉल
रात के ठीक 12 बजे थे। नेहा अपने कमरे में अकेली बैठी थी। तभी उसका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था... सिर्फ़ लिखा था—"Unknown"।
नेहा ने कॉल उठाई।
दूसरी तरफ़ से धीमी आवाज़ आई, "दरवाज़ा मत खोलना... कोई तुम्हें देख रहा है।"
नेहा घबरा गई। उसने तुरंत खिड़की से बाहर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
उसे लगा शायद कोई मज़ाक कर रहा है। तभी फिर वही आवाज़ आई—
"अगर ज़िंदा रहना चाहती हो... तो पीछे मुड़कर मत देखना।"
नेहा के हाथ काँपने लगे। उसे महसूस हुआ कि कमरे में उसके पीछे जैसे कोई खड़ा है।
लेकिन उसने हिम्मत करके पीछे नहीं देखा।
कुछ सेकंड बाद अचानक बिजली चली गई। पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया।
मोबाइल की स्क्रीन फिर चमकी।
इस बार एक मैसेज था—
"तुमने मेरी बात मान ली... इसलिए आज बच गई।"
नेहा ने डरते हुए दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन फ़र्श पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी...
तस्वीर में नेहा थी...
और उसके ठीक पीछे कोई धुंधली परछाईं खड़ी मुस्कुरा रही थी।
उस रात के बाद नेहा का फ़ोन कभी नहीं बजा...
लेकिन हर रात ठीक 12 बजे उसकी स्क्रीन अपने आप जल उठती थी।
और उस पर सिर्फ़ एक ही लाइन लिखी होती थी—
"मैं अभी भी यहीं हूँ..."उस तस्वीर को देखते ही नेहा के हाथ काँपने लगे। उसने तस्वीर को ज़मीन पर फेंक दिया, लेकिन कुछ ही पल बाद वह तस्वीर फिर उसके पैरों के पास पड़ी थी। अब तस्वीर में खड़ी धुंधली परछाईं पहले से ज़्यादा साफ़ दिखाई दे रही थी।
नेहा डरकर अपने कमरे में भागी और दरवाज़ा बंद कर लिया। उसने खुद को समझाने की कोशिश की कि शायद यह उसका वहम है। तभी फिर से मोबाइल की घंटी बजी।
इस बार स्क्रीन पर लिखा था—"सच जानना है तो पुराने कुएँ के पास आओ।"
पूरी रात नेहा सो नहीं सकी। सुबह होते ही उसने अपनी दादी से उस पुराने कुएँ के बारे में पूछा। दादी का चेहरा अचानक उतर गया। उन्होंने धीरे से कहा, "वहाँ कई साल पहले एक लड़की की रहस्यमय मौत हुई थी। लोग कहते हैं कि उसकी आत्मा आज भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रही है।"
नेहा ने हिम्मत जुटाई और शाम होने से पहले उस पुराने कुएँ के पास पहुँची। वहाँ चारों ओर सन्नाटा था। अचानक तेज़ हवा चली और कुएँ के पास रखी एक पुरानी डायरी उसके पैरों से टकराई।
नेहा ने डायरी खोली। उसमें उस लड़की की कहानी लिखी थी। आख़िरी पन्ने पर लिखा था, "जिस दिन कोई सच पढ़ेगा, उसी दिन मुझे मुक्ति मिलेगी।"
इतना पढ़ते ही नेहा के मोबाइल की स्क्रीन अपने आप जल उठी। इस बार उस पर सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे—
"धन्यवाद... अलविदा।"
उसी पल चारों तरफ़ फैली ठंडी हवा शांत हो गई। नेहा ने महसूस किया कि जैसे कोई अदृश्य बोझ अचानक खत्म हो गया हो। उसने आख़िरी बार उस कुएँ की ओर देखा। अब वहाँ सिर्फ़ खामोशी थी।
उस रात के बाद नेहा के फ़ोन पर कभी कोई रहस्यमयी कॉल नहीं आई। लेकिन उसने वह तस्वीर और डायरी हमेशा अपने पास संभालकर रखी, ताकि उसे याद रहे कि हर रहस्य के पीछे कोई न कोई अधूरी कहानी छिपी होती है... और कभी-कभी किसी अनजान की मदद करना ही सबसे बड़ा साहस होता है।