Anath - 4 in Hindi Fiction Stories by Dev Kumar Rawat books and stories PDF | अनाथ - अध्याय 4

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अनाथ - अध्याय 4

रात के लगभग ढाई बज रहे थे।

पूरा अनाथालय गहरी नींद में डूबा हुआ था। बरामदे में लगी पुरानी घड़ी की टिक-टिक उस सन्नाटे को और भी भयावह बना रही थी। मानव अपने छोटे-से कमरे में खिड़की के पास खड़ा था। उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी, जिसके साथ मिली तस्वीर और नक्शे ने उसकी पूरी दुनिया बदल दी थी।

उसने आख़िरी बार कमरे को देखा।

यही कमरा...

जहाँ उसने बचपन बिताया था।

यहीं उसने भूख सही...

मार खाई...

और हर रात अपने माता-पिता के लौटने का इंतज़ार किया।

लेकिन आज...

वह सब पीछे छोड़कर जा रहा था।

उसने धीरे से अपनी छोटी-सी पोटली उठाई। उसमें सिर्फ़ चार चीज़ें थीं—पुरानी डायरी, तस्वीर, नक्शा और गले में पहना त्रिशूल वाला लॉकेट।

जैसे ही वह खिड़की से बाहर निकला, पीछे से धीमी आवाज़ आई—

"मानव...!"

वह पलटा।

छोटू वहाँ खड़ा था।

उसकी आँखें नम थीं।

"तू सच में जा रहा है?"

मानव मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द साफ़ झलक रहा था।

"अगर मैं यहाँ रुका... तो शायद कभी सच नहीं जान पाऊँगा।"

छोटू ने जेब से एक छोटा-सा कपड़े का थैला निकाला।

"इसमें थोड़ा खाना है... और कुछ पैसे भी। मैंने कई दिनों से बचाए थे।"

मानव कुछ पल तक उसे देखता रहा।

फिर उसने छोटू को गले लगा लिया।

"मैं वापस आऊँगा।"

"और जिस दिन लौटूँगा..."

"उस दिन इस अनाथालय का कोई बच्चा डरकर नहीं जिएगा।"

छोटू ने सिर हिला दिया।

"मैं इंतज़ार करूँगा।"

मानव दीवार फाँदकर अँधेरे में गायब हो गया।

लेकिन...

उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उसकी हर हरकत पर किसी की नज़र थी।


अनाथालय की दूसरी मंज़िल पर...

भैरव सिंह खिड़की के पीछे खड़ा सब देख रहा था।

उसके चेहरे पर एक खतरनाक मुस्कान थी।

उसने मोबाइल निकाला और एक नंबर मिलाया।

"लड़का निकल चुका है।"

दूसरी तरफ़ से भारी आवाज़ आई—

"ज़िंदा नहीं बचना चाहिए।"

भैरव बोला—

"चिंता मत करो।"

"आज रात उसका सफ़र यहीं खत्म हो जाएगा।"

फोन कट गया।

भैरव ने खिड़की बंद की और धीरे-धीरे हँसने लगा।


मानव सुनसान सड़क पर तेज़ी से चल रहा था।

रात ठंडी थी।

हवा में अजीब-सी बेचैनी थी।

दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।

उसने जेब से नक्शा निकाला।

हवेली तक पहुँचने के लिए उसे जंगल के किनारे वाली सड़क से होकर जाना था।

वह आगे बढ़ा ही था कि अचानक...

पीछे से तेज़ रोशनी उसकी आँखों पर पड़ी।

एक काली एसयूवी उसके सामने आकर रुकी।

चार दरवाज़े एक साथ खुले।

चार लंबे-चौड़े आदमी बाहर उतरे।

सबके चेहरे काले कपड़े से ढके हुए थे।

एक आदमी ने मानव की तस्वीर निकाली।

तस्वीर को उसके चेहरे से मिलाया।

फिर बोला—

"यही है।"

दूसरा आदमी लोहे की रॉड घुमाते हुए आगे बढ़ा।

"काम जल्दी खत्म करो।"

मानव समझ चुका था...

यह कोई लूट नहीं थी।

ये लोग उसी का इंतज़ार कर रहे थे।

उसने पीछे हटना शुरू किया।

लेकिन पीछे गहरी खाई थी।

सामने चार हथियारबंद लोग।

उसके पास बचने का कोई रास्ता नहीं था।

पहला हमला हुआ।

लोहे की रॉड पूरी ताकत से उसकी ओर आई।

मानव झुक गया।

रॉड उसके सिर के ऊपर से निकल गई।

उसने तुरंत सड़क किनारे पड़ी मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और हमलावर की आँखों में फेंक दी।

आदमी दर्द से चीख उठा।

लेकिन तभी दूसरे आदमी ने पीछे से मानव को पकड़ लिया।

तीसरे ने उसके पेट में ज़ोरदार मुक्का मारा।

मानव सड़क पर गिर पड़ा।

उसकी साँसें तेज़ चलने लगीं।

चारों आदमी अब धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रहे थे।

उनके चेहरों पर दया नहीं...

सिर्फ़ मौत दिखाई दे रही थी।

और तभी...

दूर से किसी कार के इंजन की आवाज़ सुनाई दी।

तेज़ हेडलाइट ने पूरी सड़क को रोशनी से भर दिया।

कार इतनी तेज़ रफ़्तार से आई कि हमलावरों को पीछे हटना पड़ा।

ब्रेक की तीखी आवाज़ गूँजी।

कार का दरवाज़ा खुला।

एक लंबा, सधे हुए व्यक्तित्व वाला व्यक्ति बाहर उतरा।

उसने पहले मानव की ओर देखा...

फिर चारों हमलावरों की तरफ़।

उसकी आवाज़ बिल्कुल शांत थी—

"चार लोग..."

"एक निहत्थे लड़के पर?"

"लगता है तुम लोगों ने आज बहुत बड़ी गलती कर दी है..."

चारों नकाबपोश कुछ पल के लिए ठिठक गए।

उनके सामने खड़ा व्यक्ति लगभग पचास वर्ष का था। सफ़ेद शर्ट, काला ओवरकोट और चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास, जिसे देखकर लगता था कि वह हर परिस्थिति का सामना करना जानता है।

एक हमलावर ने गुर्राते हुए पूछा—

"तुम कौन हो?"

वह व्यक्ति हल्का-सा मुस्कुराया।

"नाम जानकर क्या करोगे?"

"पहले यह सोचो कि आज रात तुम यहाँ से लौट भी पाओगे या नहीं।"

उसकी आवाज़ में इतना विश्वास था कि चारों हमलावर एक पल के लिए असहज हो गए।

लेकिन अगले ही क्षण उनके सरदार ने आदेश दिया—

"इसे भी खत्म कर दो!"

चारों एक साथ उसकी ओर दौड़े।

पहला आदमी लोहे की रॉड लेकर झपटा।

रहस्यमय व्यक्ति एक कदम पीछे हटा, रॉड को अपने हाथ से मोड़ा और उसी हमलावर को धक्का देकर सड़क पर गिरा दिया।

दूसरा आदमी चाकू लेकर पीछे से हमला करने आया।

उसने बिना पीछे देखे उसका हाथ पकड़ लिया और चाकू दूर फेंक दिया।

तीसरा और चौथा हमलावर एक साथ टूट पड़े।

कुछ ही सेकंड में दोनों भी ज़मीन पर कराह रहे थे।

मानव यह सब देखकर स्तब्ध था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह आदमी कौन है, जो चार हथियारबंद लोगों को इतनी आसानी से रोक रहा है।

तभी सरदार ने जेब से पिस्तौल निकाली।

उसने सीधे मानव की ओर निशाना साधा।

"अगर लड़का नहीं मिला..."

"तो किसी को भी ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा।"

धाँय!

गोली चलने की आवाज़ रात के सन्नाटे को चीर गई।

लेकिन उसी क्षण रहस्यमय व्यक्ति ने मानव को अपनी ओर खींच लिया।

गोली पास के पेड़ में जा लगी।

वह तेज़ी से आगे बढ़ा और सरदार के हाथ पर वार किया।

पिस्तौल नीचे गिर गई।

कुछ ही पलों में चारों हमलावर अपनी गाड़ी में बैठकर वहाँ से भाग निकले।

भागते-भागते उनका सरदार चिल्लाया—

"हम फिर आएँगे!"

"और अगली बार..."

"तुम दोनों को कोई नहीं बचा पाएगा!"

सड़क पर फिर सन्नाटा छा गया।

मानव घायल अवस्था में ज़मीन पर बैठ गया।

उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।

रहस्यमय व्यक्ति उसके पास आया।

उसने झुककर मानव के गले में पड़ा त्रिशूल वाला लॉकेट देखा।

उसे देखते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए।

उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

"इतने साल..."

"आख़िरकार मैंने तुम्हें ढूँढ़ ही लिया।"

मानव ने हैरानी से पूछा—

"आप... मुझे जानते हैं?"

उस व्यक्ति ने कुछ पल तक उसकी आँखों में देखा।

फिर बोला—

"अभी नहीं..."

"लेकिन सही समय आने पर तुम्हें हर सवाल का जवाब मिलेगा।"

उसने ज़मीन पर गिरी डायरी उठाई।

डायरी को सम्मान से साफ़ किया।

फिर मानव की ओर बढ़ाते हुए बोला—

"इसे कभी अपने से अलग मत करना।"

"तुम्हारे अतीत की चाबी इसी में छिपी है।"

मानव ने डायरी सीने से लगा ली।

"आपका नाम...?"

वह मुस्कुराया।

"मेरा नाम अर्जुन राठौर है।"

"और आज से..."

"तुम अकेले नहीं हो।"

अर्जुन ने मानव को सहारा देकर अपनी कार में बैठाया।

कार धीरे-धीरे सुनसान सड़क छोड़कर जंगल की ओर बढ़ने लगी।

रास्ते भर मानव के मन में सैकड़ों सवाल थे।

लेकिन अर्जुन चुप थे।

करीब एक घंटे बाद कार एक विशाल लोहे के गेट के सामने रुकी।

गेट पर बड़े अक्षरों में लिखा था—

"अग्निवीर आश्रम"

गेट खुला।

अंदर हरियाली, अनुशासित परिसर और दूर तक फैली इमारतें दिखाई दे रही थीं।

यह किसी साधारण आश्रम जैसा नहीं लगता था।

यहाँ सुरक्षा भी थी...

प्रशिक्षण मैदान भी...

और एक अजीब-सी गंभीरता भी।

अर्जुन ने कार से उतरते हुए कहा—

"यहीं से तुम्हारी नई ज़िंदगी शुरू होगी।"

"यहाँ तुम्हें सिर्फ़ जीना नहीं..."

"बल्कि हर परिस्थिति का सामना करना भी सीखना होगा।"

मानव ने पहली बार राहत की साँस ली।

उसे लगा कि शायद अब उसका संघर्ष समाप्त हो जाएगा।

लेकिन उसे क्या पता था...

कि यह तो सिर्फ़ शुरुआत थी।

उसी समय...

सैकड़ों किलोमीटर दूर...

एक आलीशान बंगले के अँधेरे कमरे में कोई व्यक्ति बड़ी स्क्रीन पर सड़क पर हुए पूरे हमले की रिकॉर्डिंग देख रहा था।

उसने सिगार का धुआँ छोड़ते हुए धीमे से कहा—

"अर्जुन..."

"तुमने एक बार फिर मेरा खेल बिगाड़ दिया।"

उसने मेज़ पर रखी मानव की बचपन की तस्वीर उठाई।

फिर मुस्कुराते हुए बोला—

"कोई बात नहीं..."

"अब अगला वार मैं खुद करूँगा।"

उसके चेहरे पर हल्की रोशनी पड़ी...

लेकिन चेहरा पूरी तरह दिखाई देने से पहले ही कमरा फिर अँधेरे में डूब गया।

मानव नहीं जानता था कि उसका सबसे बड़ा दुश्मन अब खुद मैदान में उतर चुका है।