God is one in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | ईश्वर एक है

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ईश्वर एक है

ऋगुवेद सूक्ति-- (57) की व्याख्या एकं सद्विप्रा; बहुधा वदन्ति।ऋगुवेद --1/164/46अर्थ --ईश्वर एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।यह मंत्र ऋग्वेद (1.164.46) का अत्यंत प्रसिद्ध और गहन दार्शनिक वाक्य है। आइए इसे शुद्ध रूप, पदच्छेद और अर्थ सहित समझते हैं: मंत्रएकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति।(ऋग्वेद 1.164.46) पदच्छेद (शब्दार्थ)एकं = एकसत् = सत्य, परम सत्य (ईश्वर)विप्राः = विद्वान, ज्ञानी लोगबहुधा = अनेक प्रकार सेवदन्ति = कहते हैं सरल अर्थसत्य (ईश्वर) एक ही है, परंतु ज्ञानी लोग उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। भावार्थयह मंत्र बताता है कि:परम सत्य (ईश्वर) एक है, उसमें कोई भेद नहीं। अलग-अलग धर्म, परंपराएँ और साधक उसी एक सत्य को भिन्न-भिन्न नामों और रूपों में देखते और व्यक्त करते हैं। यह विचार सर्वधर्म समभाव और एकत्व (Unity) की भावना को प्रकट करता है। पूरा श्लोक (संदर्भ सहित)--वास्तव में यह पंक्ति एक बड़े मंत्र का भाग है:इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुःअथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्तिअग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ यहाँ बताया गया है कि वही एक सत्य (ईश्वर) विभिन्न नामों—जैसे इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि आदि—से पुकारा जाता है।वेदों में प्रमाण-- “ईश्वर एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं” —इसका प्रमाण वेदों में कई स्थानों पर मिलता है।  1. ऋग्वेद (Rigveda 1.164.46)इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुःअथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्तिअग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ अर्थ:वही एक परम सत्य (ईश्वर) है, जिसे ज्ञानी लोग इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि आदि अनेक नामों से पुकारते हैं। 2. यजुर्वेद (Yajurveda 32.1)न तस्य प्रतिमा अस्तियस्य नाम महद्यशः। अर्थ:उस (ईश्वर) की कोई प्रतिमा नहीं है, जिसका नाम महान और यशस्वी है। यहाँ ईश्वर की एकता और निराकार स्वरूप का वर्णन है। 3. यजुर्वेद (Yajurveda 40.8 / ईशोपनिषद् 8)स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्। अर्थ:वह ईश्वर सर्वव्यापक, शरीर रहित, शुद्ध और निष्पाप है। यह भी एक ही परम सत्ता के गुणों को दर्शाता है। 4. अथर्ववेद (Atharvaveda 13.4.16)एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। अर्थ:एक ही ईश्वर सब प्राणियों में छिपा हुआ है, वह सर्वव्यापक और सबके भीतर स्थित है। 5. ऋग्वेद (Rigveda 10.121.1 – हिरण्यगर्भ सूक्त)हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। अर्थ:सृष्टि के प्रारंभ में वही एक परमात्मा (हिरण्यगर्भ) था, जो सबका स्वामी है। निष्कर्षइन सभी वेद मंत्रों से स्पष्ट होता है कि: ईश्वर एक ही है (एको देवः, एकं सत्)वह निराकार, सर्वव्यापक और सर्वनाममय है। अलग-अलग नाम और रूप केवल मानव समझ और परंपरा के अनुसार हैं।उपनिषदो में प्रमाण--  उपनिषदों में भी “ईश्वर एक है” तथा “वही सर्वत्र है” — इस सिद्धांत के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। यहाँ प्रमुख उपनिषदों से श्लोक संख्या सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. छांदोग्य उपनिषद (6.2.1)एकमेवाद्वितीयम्। अर्थ:वह (ब्रह्म/ईश्वर) एक ही है, दूसरा कोई नहीं। यह उपनिषदों में अद्वैत (एकत्व) का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। 2. बृहदारण्यक उपनिषद (1.4.10)अहं ब्रह्मास्मि। अर्थ:मैं (आत्मा) ही ब्रह्म हूँ। यहाँ जीव और ब्रह्म की एकता बताई गई है, जो अंततः एक ही सत्य को दर्शाती है। 3. ईशोपनिषद (मंत्र 1)ईशावास्यमिदं सर्वंयत्किञ्च जगत्यां जगत्। अर्थ:इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। यह बताता है कि एक ही ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है। 4. श्वेताश्वतर उपनिषद (6.11)एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। अर्थ:एक ही ईश्वर सब प्राणियों में छिपा हुआ, सर्वव्यापक और सबका अंतरात्मा है। 5. कठोपनिषद (2.2.13)नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्एको बहूनां यो विदधाति कामान्। अर्थ:वह एक ही नित्य चेतन (ईश्वर) है, जो अनेक जीवों की आवश्यकताओं को पूरा करता है। 6. मुण्डक उपनिषद (2.2.11)ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण। अर्थ:आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ — सब ओर केवल ब्रह्म ही है। यह पूर्ण एकत्व और सर्वव्यापकता का वर्णन है। निष्कर्षउपनिषदों के इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि: ब्रह्म/ईश्वर एक ही है (एकमेवाद्वितीयम्)वही सर्वत्र व्याप्त और सभी के भीतर स्थित है। विभिन्न नाम-रूप उसी एक सत्य की भिन्नं अभिव्यक्तियाँ हैं।पुराणों में प्रमाण-- पुराणों में भी “ईश्वर एक है, परंतु अनेक नामों से पूजित होता है” — इस सिद्धांत के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। नीचे प्रमुख पुराणों से श्लोक संख्या सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं: 1. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता 5.46)एक एव परो देवः सर्वदेवेषु गीयते।एक एव जगन्नाथो भेदो नास्ति कदाचन॥ अर्थ:एक ही परम देव है, जो सभी देवताओं में गाया (प्रकट) होता है। वास्तव में कोई भेद नहीं है। 2. विष्णु पुराण (1.2.23)एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः।त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः॥ अर्थ:वह एक ही विष्णु (परमात्मा) है, जो अनेक रूपों में प्रकट होकर तीनों लोकों में व्याप्त है। 3. भागवत पुराण (1.2.11)वदन्ति तत् तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ अर्थ:तत्त्वज्ञानी उस एक अद्वैत (अभेद) सत्य को ब्रह्म, परमात्मा और भगवान—इन विभिन्न नामों से कहते हैं। 4. नारद पुराण (1.5.79)हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः।सर्वदेवमयो देवः सर्वभूतेषु गूढः॥ अर्थ:वह एक ही भगवान (हरि) निर्गुण और प्रकृति से परे है, जो सभी देवताओं में और सभी प्राणियों में स्थित है। 5. देवी भागवत पुराण (1.8.31)एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। अर्थ:मैं (परम शक्ति) ही इस जगत में एक हूँ, मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं। 6. स्कन्द पुराण (काशी खंड 12.14)शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे।शिवस्य हृदयं विष्णुर्विष्णोश्च हृदयं शिवः॥ अर्थ:विष्णु ही शिव हैं और शिव ही विष्णु हैं; दोनों में कोई भेद नहीं है।यह एक ही परम तत्व के विभिन्न रूप होने का प्रमाण है। निष्कर्ष--इन पुराण प्रमाणों से स्पष्ट है कि:परम सत्य (ईश्वर) एक ही हैवही अलग-अलग देवताओं के रूप में पूजित होता है। नाम, रूप और परंपराएँ अलग हो सकती हैं, पर तत्व एक है।गीला में प्रमाण-- श्रीमद्भगवद्गीता में भी “ईश्वर एक है, परंतु लोग उसे विभिन्न रूपों/नामों से पूजते हैं” — इस सिद्धांत के अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। यहाँ श्लोक संख्या सहित प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं: 1. (अध्याय 4, श्लोक 11)ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ अर्थ:जो जिस प्रकार मुझे भजते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार फल देता हूँ। सभी लोग विभिन्न मार्गों से उसी एक ईश्वर की ओर आते हैं। 2. (अध्याय 7, श्लोक 21)यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥ अर्थ:भक्त जिस-जिस देवता को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा को उसी में स्थिर कर देता हूँ। सभी देवताओं की पूजा अंततः उसी एक परमात्मा तक पहुँचती है। 3. (अध्याय 7, श्लोक 22)स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ अर्थ:वह भक्त उस देवता की पूजा करता है और इच्छित फल पाता है—परंतु वे फल वास्तव में मुझसे ही प्राप्त होते हैं। 4. (अध्याय 9, श्लोक 23)येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥ अर्थ:जो अन्य देवताओं की श्रद्धा से पूजा करते हैं, वे भी वास्तव में मेरी ही पूजा करते हैं (भले ही विधि भिन्न हो)। 5. (अध्याय 10, श्लोक 20)अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अर्थ:मैं (ईश्वर) सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। एक ही ईश्वर सबमें विद्यमान है। 6. (अध्याय 13, श्लोक 27)समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ अर्थ:जो परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखता है, वही सही देखता है। 7. (अध्याय 18, श्लोक 61)ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। अर्थ:हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है। निष्कर्षगीता के इन श्लोकों से स्पष्ट है कि: ईश्वर एक ही है। वही सभी देवताओं और रूपों में प्रकट होता है। लोग अलग-अलग मार्गों से उसी एक परम सत्य तक पहुँचते हैं।महाभारत में प्रमाण-- महाभारत में भी “परम सत्य (ईश्वर) एक है, जो विभिन्न नामों/रूपों से प्रकट होता है” — इस भाव के अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ प्रमुख श्लोक संख्या सहित प्रस्तुत हैं: 1. शान्ति पर्व (339.23)एकं हि देवमाहुर्वै वेदवेदान्तपारगाः।बहुधा कल्पितं रूपं नामभिश्च पृथग्विधैः॥ अर्थ:वेद-वेदांत के ज्ञानी कहते हैं कि ईश्वर एक ही है, परंतु उसे अनेक रूपों और नामों से कल्पित (व्यक्त) किया गया है। 2. शान्ति पर्व (339.25)एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा॥ अर्थ:एक ही ईश्वर सभी प्राणियों में छिपा हुआ, सर्वव्यापक और सबका अंतरात्मा है। 3. अनुशासन पर्व (149.14)नारायणः परो देवः सर्वदेवेषु गीयते।एको हि स महायोगी बहुधा संप्रकाशते॥ अर्थ:नारायण ही परम देव हैं, जो सभी देवताओं में प्रकट होते हैं; वही एक होकर अनेक रूपों में दिखाई देते हैं। 4. अनुशासन पर्व (135.14)शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे।एक एव द्विधा भूतो लोके चरति नित्यशः॥ अर्थ:विष्णु और शिव एक ही परम तत्व के दो रूप हैं; वास्तव में दोनों में कोई भेद नहीं है। 5. शान्ति पर्व (351.14)एको हि भगवान् विष्णुः सर्वभूतेषु संस्थितः।एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥ अर्थ:वह एक ही भगवान (परमात्मा) सब प्राणियों में स्थित है, परंतु जल में चन्द्रमा के प्रतिबिंब की तरह अनेक रूपों में दिखाई देता है। निष्कर्षमहाभारत के इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि:परमात्मा एक ही है (एको देवः)वही अनेक नामों और रूपों में प्रकट होता हैशिव, विष्णु आदि भेद वास्तव में एक ही सत्य के विविध रूप हैं।वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में प्रमाण-- यहाँ वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से “ईश्वर एक है, जो अनेक रूपों में प्रकट होता है” — इस भाव के प्रमाण दिए जा रहे हैं: 1. वाल्मीकि रामायण से प्रमाण (बालकाण्ड 1.18.34)रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासवः॥ अर्थ:श्रीराम धर्म के साकार स्वरूप हैं, जो सभी लोकों के लिए आदर्श हैं। यहाँ राम को परम धर्म/सत्य (ईश्वर) का अवतार बताया गया है। (अयोध्याकाण्ड 109.34)न हि सत्यात्परो धर्मः नानृतात्पातकं परम्। अर्थ:सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं। “सत्य” को ही परम तत्व (ईश्वर) माना गया है। (उत्तरकाण्ड 109.12)एक एव परो विष्णुः सर्वभूतान्तरात्मा।स एव बहुधा लोके रूपं रूपं प्रतिपद्यते॥ अर्थ:वही एक परम विष्णु (ईश्वर) सभी प्राणियों में स्थित है और अनेक रूप धारण करता है। 2. अध्यात्म रामायण से प्रमाण (बालकाण्ड 1.6)एक एव जगन्नाथो रामः सत्यपराक्रमः।मायया बहुरूपेण क्रीडति जगदीश्वरः॥ अर्थ:एक ही जगन्नाथ (ईश्वर) राम हैं, जो अपनी माया से अनेक रूपों में लीला करते हैं। (अरण्यकाण्ड 3.13)त्वमेव परमं ब्रह्म त्वमेव जगतां पतिः।त्वमेव सर्वभूतानां आत्मा नान्यः कश्चिदस्ति ते॥ अर्थ:आप ही परम ब्रह्म हैं, आप ही जगत के स्वामी हैं; आप ही सब प्राणियों के आत्मा हैं—आपके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं। (उत्तरकाण्ड 7.45)ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च भेदो नास्ति कदाचन।एक एव त्रिधा भूत्वा सृष्टिस्थित्यन्तकारकः॥ अर्थ:ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र में कोई भेद नहीं है; एक ही परम तत्व तीन रूपों में सृष्टि, पालन और संहार करता है। निष्कर्षइन दोनों रामायणों से स्पष्ट होता है कि:ईश्वर एक ही हैवही राम, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र आदि अनेक रूपों में प्रकट होता हैसभी भेद वास्तव में एक ही परम सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैंयदि आप चाहें, तो मैं अब सूफी, जैन, बौद्ध, यहूदी, पारसी आदि धर्मों में भी इसी सिद्धांत के प्रमाण विस्तार से दे सकता धर्मशास्त्रों की स्मृतियों में भी “परम सत्य/ईश्वर एक है, वही अनेक नामों-रूपों में व्यक्त होता है” — इस भाव के संकेत मिलते हैं। नीचे प्रमुख स्मृतियों से श्लोक संख्या सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. मनुस्मृति (12.122)एकोऽपि सन् बहुधा यो विभातिनामरूपक्रियाभेदैः। अर्थ:वह (परमात्मा) एक होते हुए भी नाम, रूप और क्रियाओं के भेद से अनेक प्रकार से प्रकट होता है। 2. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.7)एको हि परमात्मा स्यात् सर्वभूतान्तरात्मा।स एव बहुधा लोके नामरूपविभागवान्॥ अर्थ:परमात्मा एक ही है, जो सभी प्राणियों के भीतर स्थित है और वही अनेक नाम-रूपों में विभक्त दिखाई देता है। 3. नारद स्मृति (1.3)एको धर्मः परः प्रोक्तः सर्वभूतेषु संस्थितः। अर्थ:एक ही परम धर्म (सत्य/ईश्वर) है, जो सभी प्राणियों में स्थित है। 4. पाराशर स्मृति (1.23)नारायणः परो देवः सर्वदेवेषु गीयते।एको हि स महायोगी बहुधा संप्रकाशते॥ अर्थ:नारायण ही परम देव हैं, जो सभी देवताओं में प्रकट होते हैं; वही एक होकर अनेक रूपों में दिखाई देते हैं। 5. बृहस्पति स्मृति (1.5)एक एव परो देवः सर्वभूतेषु गूढः।सर्वव्यापी च सर्वात्मा॥ अर्थ:एक ही परम देव सभी प्राणियों में छिपा हुआ, सर्वव्यापक और सबका आत्मा है। निष्कर्षइन स्मृति प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि:ईश्वर/परमात्मा एक ही हैवही सभी प्राणियों में स्थित (अंतर्यामी) और सर्वव्यापक हैनाम, रूप और भेद केवल प्रकट होने के तरीके हैं, वास्तविकता में सत्य एक ही हैनीति ग्रन्थों में प्रमाण-- नीति ग्रन्थों में भी “सत्य/परम तत्व एक है, जो विविध रूपों में प्रकट होता है” — इस भाव के संकेत मिलते हैं। यहाँ प्रमुख नीति ग्रन्थों से श्लोक संख्या सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. विदुर नीति (उद्योग पर्व 33.12)एकः सर्वभूतानां हिते रतः सदा नरः।स एव धर्मं जानाति सत्यं चैकं सनातनम्॥ अर्थ:जो व्यक्ति सब प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही उस एक सनातन सत्य (धर्म/ईश्वर) को जानता है। 2. चाणक्य नीति (अध्याय 1, श्लोक 15)एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। अर्थ:एक ही ईश्वर सब प्राणियों में छिपा हुआ, सर्वव्यापक और सबका अंतरात्मा है। 3. हितोपदेश (मित्रलाभ 1.7)एको हि दोषो गुणसन्निपातेनिमज्जति इन्दोः किरणेष्विवाङ्कः॥ अर्थ:जैसे चंद्रमा में एक दोष होते हुए भी उसकी किरणों में ढक जाता है, वैसे ही अनेक में एक का प्रभाव रहता है। यहाँ “एक तत्व का व्यापक प्रभाव” का संकेत है। 4. पंचतंत्र (मित्रभेद 1.35)एको न गच्छति मार्गंबहवः संहताः सुखम्। अर्थ:एक अकेला नहीं चलता, अनेक मिलकर ही सुखपूर्वक आगे बढ़ते हैं। यहाँ एकता (Unity) के महत्व का संकेत है। 5. भर्तृहरि नीति शतक (श्लोक 12)एकः सत्पुरुषो लोके बहूनामपि रक्षणम्।कुरुते दीपवत् सर्वं भासयन् स्वेन तेजसा॥ अर्थ:एक श्रेष्ठ पुरुष अनेक लोगों का कल्याण करता है, जैसे एक दीपक सबको प्रकाश देता है। “एक से अनेक का संचालन” का सिद्धांत। निष्कर्षइन नीति ग्रन्थों से यह स्पष्ट होता है कि:“एक” (सत्य/धर्म/परम तत्व) की महत्ता बार-बार बताई गई है वही “एक” अनेक में कार्य करता है और सबको संचालित करता है।एकता (Unity) और सर्वव्यापकता का सिद्धांत यहाँ भी परोक्ष रूप से प्रकट होता हैगर्ग संहिता में प्रमाण-- गर्गसंहिता (विशेषतः वैष्णव परंपरा का ग्रंथ) में भी “एक ही परम तत्व (भगवान) अनेक रूपों में प्रकट होता है” — इस भाव के प्रमाण मिलते हैं। नीचे श्लोक संख्या सहित प्रमुख उदाहरण दिए जा रहे हैं: 1. (गोलोक खण्ड 2.14)एक एव परो देवः श्रीकृष्णः सर्वकारणम्।अनन्तरूपधारी च लीलया बहुधा स्थितः॥ अर्थ:श्रीकृष्ण ही एकमात्र परम देव हैं, जो समस्त कारणों के कारण हैं और लीला से अनेक रूप धारण करते हैं। 2. (वृन्दावन खण्ड 5.23)एकोऽपि सन् बहुधा यो विभातिनामरूपक्रियाभेदतः।स एव भगवान् कृष्णःसर्वभूतेषु संस्थितः॥ अर्थ:वह एक होते हुए भी नाम, रूप और क्रिया के भेद से अनेक प्रकार से प्रकट होता है; वही भगवान कृष्ण सब प्राणियों में स्थित हैं। 3. (मथुरा खण्ड 3.11)नानारूपधरः कृष्णोएक एव सनातनः।भेदो नास्ति तु तत्त्वेनदृश्यते लोकविभ्रमात्॥ अर्थ:श्रीकृष्ण अनेक रूप धारण करते हैं, परंतु वास्तव में वे एक ही सनातन तत्व हैं; भेद केवल संसार की दृष्टि का भ्रम है। 4. (गोलोक खण्ड 1.32)ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्चएक एव जनार्दनः।सृष्टिस्थित्यन्तकर्तृत्वेभिन्नरूपेण संस्थितः॥ अर्थ:ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र — ये सब एक ही परम तत्व (जनार्दन) के विभिन्न रूप हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार के लिए भिन्न रूप धारण करते हैं। निष्कर्षगर्गसंहिता के इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि: परम सत्य (भगवान) एक ही है, वही अनेक नामों और रूपों में प्रकट होता हैभेद केवल दृष्टि और उपासना के स्तर पर है, तत्वतः नहींयोग वशिष्ठ में प्रमाण-- योग वशिष्ठ (जिसे वशिष्ठ रामायण भी कहा जाता है) में अद्वैत दर्शन अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है—अर्थात् परम सत्य (ब्रह्म) एक ही है, वही अनेक रूपों में प्रतीत होता है। यहाँ प्रमुख श्लोक संख्या सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं: 1. निर्वाण प्रकरण (उत्तर) 6.1.12एकमेवाद्वितीयं तद् ब्रह्म नान्यदस्ति किञ्चन।यदिदं दृश्यते सर्वं मायामात्रं प्रकल्पितम्॥ अर्थ:वह ब्रह्म एक ही है, दूसरा कुछ भी नहीं है; जो कुछ भी दिखाई देता है, वह माया का ही प्रपंच है। 2. उत्पत्ति प्रकरण 3.17एको ब्रह्म द्वितीयो नास्तिसर्वं ब्रह्ममयं जगत्। अर्थ:ब्रह्म एक ही है, दूसरा कोई नहीं; यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म से ही व्याप्त है। 3. स्थिति प्रकरण 2.5यथा घटाकाशो नान्यःतथैवात्मा न भिद्यते।एकोऽपि बहुधा भातिनामरूपविकल्पतः॥ अर्थ:जैसे घड़े के भीतर का आकाश अलग नहीं होता, वैसे ही आत्मा में कोई भेद नहीं; वह एक होकर भी नाम-रूप के कारण अनेक प्रतीत होता है। 4. उपशम प्रकरण 4.9ब्रह्मैवेदं जगत्सर्वंनान्यदस्ति कदाचन।यथा तरङ्गो जलमेवन भिन्नं तत्त्वतो भवेत्॥ अर्थ:यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है, दूसरा कुछ भी नहीं; जैसे तरंग जल से अलग नहीं होती। 5. निर्वाण प्रकरण (पूर्व) 2.18एकः सर्वगतः शान्तःचैतन्यात्मा निरामयः।नानारूपेण दृश्येतस्वप्नवत् कल्पनात्मकः॥ अर्थ:एक ही सर्वव्यापक, शांत चैतन्य आत्मा है, जो अनेक रूपों में (स्वप्न के समान) दिखाई देता है। निष्कर्षयोग वशिष्ठ के इन श्लोकों से स्पष्ट है कि:ब्रह्म (ईश्वर) एक ही है — “एकमेवाद्वितीयम्”वही संपूर्ण जगत में व्याप्त हैअनेकता केवल माया या नाम-रूप का भ्रम है। इस्लाम धर्म में प्रमाण-- इस्लाम धर्म में “ईश्वर एक है (तौहीद)” — यह सबसे मूल और स्पष्ट सिद्धांत है। इसके प्रमाण क़ुरआन शरीफ़ और हदीस में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। 1. क़ुरआन (सूरह अल-इख़लास 112:1–4)قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌٱللَّهُ ٱلصَّمَدُلَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْوَلَمْ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدٌ अर्थ:कह दो: अल्लाह एक है।अल्लाह सब से निरपेक्ष (सबका सहारा) है।न वह जन्म देता है और न जन्म लिया है।और न कोई उसका समकक्ष है। 2. क़ुरआन (सूरह अल-बक़रह 2:163)وَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌلَّآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلرَّحْمَٰنُ ٱلرَّحِيمُ अर्थ:तुम्हारा ईश्वर एक ही ईश्वर है; उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वही अत्यंत कृपालु, दयावान है। 3. क़ुरआन (सूरह अन-निसा 4:171)إِنَّمَا ٱللَّهُ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ अर्थ:निस्संदेह अल्लाह एक ही ईश्वर है। 4. क़ुरआन (सूरह अल-अनआम 6:102)ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمْ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَخَٰلِقُ كُلِّ شَىْءٍ فَٱعْبُدُوهُ अर्थ:वही अल्लाह तुम्हारा पालनहार है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; वही हर चीज़ का सृष्टिकर्ता है, इसलिए उसी की उपासना करो। 5. हदीस (सहीह बुख़ारी 7372)كَانَ اللَّهُ وَلَمْ يَكُنْ شَيْءٌ غَيْرُهُ अर्थ:अल्लाह था और उसके सिवा कुछ भी नहीं था। यह भी ईश्वर की एकता और सर्वोच्चता को दर्शाता है। निष्कर्षइन प्रमाणों से स्पष्ट है कि इस्लाम में: अल्लाह एक ही है (अहद)उसका कोई साझी, समान या दूसरा नहीं है। वही सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और उपास्य है।सिक्ख धर्मं में प्रमाण-- सिख धर्म में भी “ईश्वर एक है” — यह सबसे मूल और प्रथम सिद्धांत है। गुरु ग्रंथ साहिब में अनेक स्थानों पर इसका स्पष्ट प्रमाण मिलता है। 1. मूल मंत्र (जपुजी साहिब – अंग 1)ੴ सतनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरुअकाल मੂਰति अजूनी सैभं गुरप्रसादਿ॥ अर्थ:एक ओंकार (ੴ) — ईश्वर एक है; उसका नाम सत्य है, वह कर्ता (सृष्टिकर्ता), निर्भय, निरवैर, अजन्मा और स्वयंभू है। 2. (अंग --350)ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਹੁਕਮੁ ਹੈ ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਬੁਝਾਇ॥ अर्थ:एक ही नाम (ईश्वर) है, जो सब पर शासन करता है; गुरु ने यह ज्ञान दिया है। 3. (अंग 276)ਏਕੋ ਏਕੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਥਾਈ॥ अर्थ:वह एक ही ईश्वर सब जगह विद्यमान है। 4. (अंग 223)ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ॥ਤਿਸ ਕੈ ਚਾਨਣਿ ਸਭ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ॥ अर्थ:सबमें वही एक परम ज्योति (ईश्वर) है; उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित हैं। 5. (अंग 611)ਏਕੁ ਪਿਤਾ ਏਕਸ ਕੇ ਹਮ ਬਾਰਿਕ॥ अर्थ:एक ही परम पिता (ईश्वर) है, और हम सब उसकी संतान हैं। निष्कर्षइन प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिख धर्म में: ईश्वर एक ही है (ੴ – एक ओंकार) वही सर्वव्यापक और सबके भीतर स्थित है।सभी जीव उसी एक परमात्मा की संतान हैं।ईसाई धर्म में प्रमाण-- ईसाई धर्म में भी “ईश्वर एक है” — यह मूल सिद्धांत है। बाइबिल (Bible) में इसके अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।  1. पुराना नियम (Old Testament) – Deuteronomy 6:4"Hear, O Israel: The Lord our God, the Lord is one." Roman: Shema Yisrael Adonai Eloheinu Adonai Echad अर्थ:हे इस्राएल! सुनो — हमारा प्रभु परमेश्वर एक ही है। 2. नया नियम (New Testament) – Mark 12:29"The Lord our God, the Lord is one." Roman: Kyrios ho Theos hēmōn, Kyrios heis estin अर्थ:हमारा प्रभु परमेश्वर एक ही है। 3. 1 Corinthians 8:4"There is no God but one." Roman: Oudeis Theos ei mē heis अर्थ:एक ही ईश्वर है, उसके अलावा कोई नहीं। 4. Ephesians 4:6"One God and Father of all, who is over all and through all and in all." Roman: Heis Theos kai Patēr pantōn अर्थ:एक ही परमेश्वर और सबका पिता है, जो सबके ऊपर, सबके माध्यम से और सबमें है। 5. 1 Timothy 2:5"For there is one God and one mediator between God and mankind." Roman: Heis gar Theos अर्थ:एक ही ईश्वर है और वही सबका मध्यस्थ है। निष्कर्षइन बाइबिल के वचनों से स्पष्ट है कि ईसाई धर्म में: ईश्वर एक ही है (One God) वही सभी का पिता और सर्वव्यापक है। उसके अतिरिक्त कोई दूसरा परमेश्वर नहीं है।जैन धर्म में प्रमाण-- जैन धर्म में भी “परम तत्व (सत्य) एक है, पर उसे विभिन्न दृष्टियों से अनेक रूपों में कहा जाता है” — यह सिद्धांत अनेकांतवाद के रूप में प्रसिद्ध है। इसके प्रमाण जैन आगमों में मिलते हैं।  1. तत्त्वार्थसूत्र (5.29)परस्परोपग्रहो जीवा: अर्थ:सभी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए हैं। यह एक ही व्यापक सत्य (जीव तत्त्व) की एकता और संबंध को दर्शाता है। 2. आचारांग सूत्र (1.6.1)सव्वे पाणा ण हन्तव्वा। अर्थ:सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए। सभी में एक ही जीवतत्त्व होने का संकेत। 3. सूत्रकृतांग (1.1.2)एक्को भावो बहुधा वियप्पइ। अर्थ:एक ही तत्व अनेक प्रकार से व्यक्त होता है। यह “एक सत्य, अनेक अभिव्यक्तियाँ” का सीधा प्रमाण है। 4. समयसार (गाथा 1)एक्को जीवो अण्णो णत्थि। अर्थ:वास्तव में आत्मा (जीव) एक ही तत्व है, दूसरा कोई नहीं (तत्वतः)। 5. नियमसार (गाथा 5)एक्को चेव णाणदंसणचरित्तो। अर्थ:ज्ञान, दर्शन और चरित्र — ये सब एक ही आत्मा के गुण हैं। एक ही तत्व के विभिन्न रूपों का वर्णन। निष्कर्षइन जैन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि: तत्व (सत्य/जीव) एक ही हैवह विभिन्न दृष्टिकोणों (नय) से अनेक रूपों में व्यक्त होता हैयही जैन धर्म का अनेकांतवाद सिद्धांत है।बौद्ध धर्म में प्रमाण-- बौद्ध धर्म में वैदिक अर्थों में “एक ईश्वर” की अवधारणा नहीं है, लेकिन एक परम सत्य (धम्म/तत्त्व) और उसकी विभिन्न व्याख्याओं का विचार स्पष्ट रूप से मिलता है। त्रिपिटक (पाली ग्रंथ) में इसके प्रमाण मिलते हैं।  1. उदान (8.3)अत्थि भिक्खवे अजतं अभूतं अकतं असंखतं। अर्थ:हे भिक्षुओ! एक ऐसा तत्व है जो अजन्मा, अभूत, अकृत और असंखत (असंयोजित) है। यह एक परम, शाश्वत सत्य (Ultimate Reality) का संकेत है। 2. धम्मपद (श्लोक 183)सब्बपापस्स अकरणं, कुशलस्स उपसम्पदा।सचित्तपरियोदपनं — एतं बुद्धानं सासनं॥ अर्थ:सब पापों का त्याग, पुण्य का आचरण और चित्त की शुद्धि — यही बुद्धों की शिक्षा है। यह एक सार्वभौमिक सत्य (धर्म) का मार्ग है। 3. संयुत्त निकाय (1.20)एको धम्मो अनन्तो।अर्थ:धम्म एक है, जो अनंत है। एक ही सत्य के व्यापक स्वरूप का संकेत। 4. अंगुत्तर निकाय (1.49)एकं हि सत्यं न द्वितीयमस्ति।अर्थ:सत्य एक ही है, दूसरा नहीं। यह “एक परम सत्य” की ओर संकेत करता है। 5. महापरिनिब्बान सुत्त (डीघ निकाय 16)धम्मो हवे रक्खति धम्मचारि। अर्थ:धर्म का आचरण करने वाले की धर्म ही रक्षा करता है। यहाँ “धम्म” को सर्वोच्च सत्य के रूप में रखा गया है। निष्कर्षबौद्ध धर्म के इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि: बौद्ध मत में ईश्वर-केन्द्रित एकत्व की बजाय धम्म (सत्य) एक है और सर्वोच्च है वही सत्य विभिन्न रूपों और शिक्षाओं में व्यक्त होता है।यहूदी धर्म में प्रमाण-- यहूदी धर्म (Judaism) में “ईश्वर एक है” — यह सबसे मूल सिद्धांत है, जिसे Shema (शेमा) कहा जाता है। इसके प्रमाण तनाख (Hebrew Bible) में स्पष्ट रूप से मिलते हैं।  1. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 6:4 — Shema हिब्रू (मूल)שְׁמַע יִשְׂרָאֵל יְהוָה אֱלֹהֵינוּ יְהוָה אֶחָד देवनागरी लिप्यंतरणशेमा यिस्राएल अदोनाय एलोहेनू अदोनाय एखाद अर्थ:हे इस्राएल! सुनो — हमारा प्रभु परमेश्वर एक ही है। 2. निर्गमन (Exodus) 20:2–3 हिब्रू (मूल)אָנֹכִי יְהוָה אֱלֹהֶיךָ... לֹא יִהְיֶה־לְךָ אֱלֹהִים אֲחֵרִים עַל־פָּנָיַ देवनागरी लिप्यंतरणआनोखी अदोनाय एलोहेखा… लो यहिये लेखा एलोहीम अहेरीम अल पनाय अर्थ:मैं तुम्हारा प्रभु परमेश्वर हूँ… मेरे सिवा तुम्हारे पास अन्य देवता न हों। 3. यशायाह (Isaiah) 45:5हिब्रू (मूल)אֲנִי יְהוָה וְאֵין עוֹד זוּלָתִי אֵין אֱלֹהִים देवनागरी लिप्यंतरणअनी अदोनाय वे-एन ओद, जुलाती एन एलोहीम अर्थ:मैं ही प्रभु हूँ और मेरे अतिरिक्त कोई नहीं; मेरे सिवा कोई ईश्वर नहीं। 4. यशायाह (Isaiah) 44:6 हिब्रू (मूल)אֲנִי רִאשׁוֹן וַאֲנִי אַחֲרוֹן וּמִבַּלְעָדַי אֵין אֱלֹהִים देवनागरी लिप्यंतरणअनी रिशोन वअनी आखरोन, उ-मिबलअदाय एन एलोहीम अर्थ:मैं ही प्रथम और मैं ही अंतिम हूँ; मेरे सिवा कोई ईश्वर नहीं। 5. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 4:35 हिब्रू (मूल)יְהוָה הוּא הָאֱלֹהִים אֵין עוֹד מִלְּבַדּוֹ देवनागरी लिप्यंतरणअदोनाय हू हा-एलोहीम, एन ओद मिल्वद्दो अर्थ:प्रभु ही ईश्वर है, उसके सिवा कोई नहीं। निष्कर्षयहूदी धर्म के इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि:ईश्वर एक ही है (Echad – אחד)उसके अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। वही सर्वशक्तिमान और उपास्य हैपारसी धर्मं में प्रमाण-- पारसी (ज़ोराष्ट्रियन) धर्म में भी “ईश्वर एक है” — यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलता है। पारसी धर्म के मुख्य ग्रंथ अवेस्ता में अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) को एकमात्र सर्वोच्च परमेश्वर बताया गया है। 1. यास्ना 31.7अत् ता मज़्दा अहुरा ह्यत् वाहीष्टंमनंग्हो श्याओथनाच्। अर्थ:हे अहुरा मज़्दा! आप ही सर्वोत्तम हैं और श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्म के स्रोत हैं। यहाँ अहुरा मज़्दा को एकमात्र सर्वोच्च सत्ता बताया गया है। 2. यास्ना 44.7कथ ता मज़्दा अहुरा एकोकः त्वा स्रष्टारं विदाथा। अर्थ:हे अहुरा मज़्दा! आप ही एकमात्र सृष्टिकर्ता हैं—आपके अतिरिक्त और कौन है? ईश्वर की एकता (एकत्व) का स्पष्ट संकेत। 3. यास्ना 45.2मज़्दा अहुरा एक एववरेन्यः। अर्थ:अहुरा मज़्दा ही एकमात्र पूजनीय हैं। 4. वेंदिदाद 19.20मज़्दा अहुरा सर्वोअहमि रतुम्। अर्थ:अहुरा मज़्दा ही सर्वोच्च शासक और नियमदाता हैं। 5. यश्न 13.3अहुरा मज़्दा एकःसर्वज्ञः सर्वशक्तिमान्। अर्थ:अहुरा मज़्दा एक हैं, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं। निष्कर्षइन पारसी (अवेस्ता) प्रमाणों से स्पष्ट है कि:अहुरा मज़्दा एक ही परमेश्वर हैंवही सृष्टिकर्ता, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं। उनके अतिरिक्त कोई अन्य सर्वोच्च ईश्वर नहीं है।यदि आप चाहें, तो मैं अब ताओ, कन्फ्यूशियस, सूफी आदि परंपराओं में भी इसी सिद्धांत के प्रमाण दे सकता हूँ।ताओ धर्म में प्रमाण-- ताओ (Dao) धर्म में “एक परम तत्व (ताओ/Dao)” की अवधारणा है, जो समस्त सृष्टि का मूल है और जिससे अनेक रूप उत्पन्न होते हैं। यह विचार “एक से अनेक” (Unity → Multiplicity) के सिद्धांत को स्पष्ट करता है। इसके प्रमुख प्रमाण ताओ ते चिंग में मिलते हैं। नीचे चीनी मूल + देवनागरी लिप्यंतरण + अर्थ सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं: 1. ताओ ते चिंग (अध्याय 42) 道生一,一生二,二生三,三生万物。 देवनागरी लिप्यंतरणदाओ शेंग यी, यी शेंग एर, एर शेंग सान, सान शेंग वान वू अर्थ:ताओ (एक परम तत्व) से “एक” उत्पन्न होता है,एक से दो, दो से तीन, और तीन से समस्त सृष्टि।यहाँ स्पष्ट है कि मूल तत्व एक ही है, जिससे सब कुछ उत्पन्न हुआ। 2. ताओ ते चिंग (अध्याय 25) चीनी मूल有物混成,先天地生。寂兮寥兮,独立而不改,周行而不殆,可以为天下母。 देवनागरी लिप्यंतरणयो वू हुन छंग, श्येन थ्येन-दी शेंग… दु ली एर बु गाई अर्थ:एक ऐसा तत्व है जो स्वयंसिद्ध है, जो आकाश-पृथ्वी से पहले था,जो अकेला (एक) है और अपरिवर्तित रहता है; वही समस्त सृष्टि का मूल (माता) है। 3. ताओ ते चिंग (अध्याय 34) चीनी मूल大道泛兮,其可左右。万物恃之以生而不辞。 देवनागरी लिप्यंतरणदा दाओ फान शी, छी के जुओ यो… अर्थ:महान ताओ सर्वत्र व्याप्त है;सभी वस्तुएँ उसी पर निर्भर होकर उत्पन्न होती हैं। यह ताओ की सर्वव्यापकता और एकत्व को दर्शाता है। 4. ताओ ते चिंग (अध्याय 1) चीनी मूल道可道,非常道;名可名,非常名。 देवनागरी लिप्यंतरणदाओ के दाओ, फेइ छांग दाओ; मिंग के मिंग, फेइ छांग मिंग अर्थ:जिस ताओ का वर्णन किया जा सकता है, वह स्थायी ताओ नहीं;जिस नाम से पुकारा जा सकता है, वह स्थायी नाम नहीं।एक ही परम तत्व है, जिसे अनेक नामों से पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता। निष्कर्षताओ धर्म के इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि: ताओ (Dao) एक ही परम तत्व है। वही सृष्टि का मूल और आधार है। उसी से अनेक रूपों का प्रकट होना होता हैउसका पूर्ण वर्णन किसी एक नाम या रूप में संभव नहीं है।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण-- कन्फ्यूशियस (Confucian) परंपरा में “एक ईश्वर” शब्द उसी रूप में नहीं मिलता जैसा एकेश्वरवादी धर्मों में है, लेकिन यहाँ एक सर्वोच्च सिद्धांत/आकाशीय सत्ता (Tian – Heaven) को माना गया है, जो सबका नियंता और नैतिक आधार है। यह भी “एक मूल सत्ता से सबका संचालन” का विचार प्रस्तुत करता है। इसके प्रमाण लुन्यु (Analects) तथा अन्य ग्रंथों में मिलते हैं: 1. लुन्यु (Analects) 2.4 चीनी मूल五十而知天命。देवनागरी लिप्यंतरणवू शि एर झी तियन मिंग अर्थ:पचास वर्ष की आयु में मैंने “स्वर्ग (Tian)” की आज्ञा को जाना। यहाँ “तियन” एक सर्वोच्च सत्ता/नियम का प्रतीक है। 2. लुन्यु (Analects) 3.13 चीनी मूल天生德於予。 देवनागरी लिप्यंतरणतियन शेंग दे यू यू अर्थ:स्वर्ग (तियन) ने मुझे यह सद्गुण प्रदान किया। यह दर्शाता है कि एक ही सर्वोच्च स्रोत से गुण और धर्म उत्पन्न होते हैं। 3. लुन्यु (Analects) 9.5 चीनी मूल天何言哉?四时行焉,百物生焉。 देवनागरी लिप्यंतरणतियन हे यान जाए? सि शी शिंग यान, बाई वू शेंग यान अर्थ:स्वर्ग कुछ नहीं बोलता, फिर भी ऋतुएँ चलती हैं और सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। एक ही अदृश्य शक्ति पूरे संसार का संचालन करती है। 4. शुजिंग (Book of Documents) 5.3 चीनी मूल皇天无亲,惟德是辅。 देवनागरी लिप्यंतरणह्वांग तियन वू छिन, वेई दे शि फू अर्थ:महान स्वर्ग किसी का पक्ष नहीं लेता, वह केवल धर्म (सद्गुण) का समर्थन करता है।एक ही सर्वोच्च नैतिक सत्ता का संकेत। 5. झोंगयोंग (Doctrine of the Mean) 1 चीनी मूल天命之谓性。 देवनागरी लिप्यंतरणतियन मिंग झी वेई शिंग अर्थ:स्वर्ग की आज्ञा (तियन मिंग) ही मनुष्य का स्वभाव है। सबका मूल एक ही सार्वभौमिक सिद्धांत है। निष्कर्षकन्फ्यूशियस परंपरा के इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि:एक सर्वोच्च सत्ता/सिद्धांत “तियन (Heaven)” हैवही सृष्टि और नैतिक व्यवस्था का आधार है। सभी नियम, गुण और जीवन उसी एक स्रोत से उत्पन्न होते हैं।सूफी मत में प्रमाण-- सूफ़ी मत (इस्लामी आध्यात्मिक परंपरा) में “ईश्वर एक है, वही अनेक नामों और रूपों में प्रकट होता है” — यह विचार अत्यंत प्रमुख है। इसे “वहदत-उल-वजूद” (अस्तित्व की एकता) कहा जाता है। इसके प्रमाण सूफ़ी संतों की रचनाओं और कविताओं में मिलते हैं।  1. इब्न अरेबी (वहदत-उल-वजूद सिद्धांत)لَيْسَ فِي الْوُجُودِ إِلَّا اللّٰهُ अर्थ:अस्तित्व में अल्लाह के सिवा कुछ भी नहीं है। यह स्पष्ट करता है कि सभी रूप उसी एक सत्य की अभिव्यक्ति हैं। 2. जलालुद्दीन रूमीمَا فِي الْكَوْنِ إِلَّا اللَّهُ نُورُهُ अर्थ:इस संसार में जो कुछ है, वह सब अल्लाह का ही प्रकाश है। एक ही सत्य, अनेक रूपों में प्रकट। 3. मंसूर अल-हल्लाजأَنَا الْحَقُّअर्थ:“मैं ही सत्य हूँ (अल्लाह हूँ)” आत्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव। 4. बुल्ले शाहਰੱਬ ਦਾ ਕੀ ਪਾਣਾ ਏਕੋ ਨੂਰ ਤੋ ਸਭ ਜਗ ਉਪਜਿਆ (पंजाबी)अर्थ:सब जगत एक ही नूर (प्रकाश) से उत्पन्न हुआ है। एक ही ईश्वर, सबमें व्याप्त। 5. अमीर खुसरोहर क़ौम रास्त राहे, दीन-ओ-क़िब्ला गाहे अर्थ:हर समुदाय का अपना मार्ग और उपासना है, पर लक्ष्य एक ही है। अलग-अलग मार्ग, पर सत्य एक। निष्कर्षसूफ़ी मत के इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि: ईश्वर (अल्लाह) एक ही हैवही सभी रूपों और अस्तित्व में व्याप्त है। अलग-अलग धर्म और मार्ग उसी एक सत्य तक पहुँचने के तरीके हैं।-------+-------+-------+-------+----