महेन्द्र प्रताप चौहान के हाथ काँप रहे थे।
बालकनी में खड़े-खड़े उसने एक बार फिर उस फोटो को देखा।
राजू भाई...
चेहरे पर लाल रंग का बड़ा सा ❌ बना हुआ था।
उसने जल्दी से फोटो पलटी।
पीछे वही एक लाइन...
"अगला नंबर तुम्हारा है..."
कुछ सेकंड तक उसकी साँसें तेज़ चलती रहीं।
उसने चारों तरफ देखा।
बालकनी खाली थी।
नीचे फार्महाउस में तेज़ संगीत बज रहा था।
लोग शराब पी रहे थे।
हँस रहे थे।
नाच रहे थे।
लेकिन...
महेन्द्र के लिए जैसे पूरी दुनिया अचानक खामोश हो गई थी।
उसने तुरंत फोन निकाला।
सिर्फ एक नंबर डायल किया।
फोन दो बार बजा...
तीसरी घंटी पर कॉल उठ गई।
दूसरी तरफ से शांत आवाज़ आई—
"बोलिए विधायक जी।"
महेन्द्र की आवाज़ में पहली बार घबराहट थी।
"मुझे... तुमसे अभी मिलना है।"
"अभी?"
"हाँ... अभी।"
कुछ सेकंड तक दूसरी तरफ खामोशी रही।
फिर वही शांत आवाज़—
"आधा घंटा।"
कॉल कट गया।
महेन्द्र ने फोन नीचे किया।
उसी समय पीछे से एक लड़की की आवाज़ आई—
"सर... सब लोग आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"
वो पलटा।
उसकी निजी सचिव थी।
"आप ठीक तो हैं?"
महेन्द्र ने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की।
"हाँ... बस थोड़ा काम याद आ गया।"
"लेकिन पार्टी—"
"कैंसल कर दो।"
"सर?"
"जो कहा है... वही करो।"
वो बिना पीछे देखे सीढ़ियों से नीचे उतर गया।
उसी समय...
शिवपुर...
पुराने शहर से लगभग दस किलोमीटर दूर।
एक पहाड़ी के ऊपर बनी मिर्ज़ा हवेली।
रात के करीब सवा बारह बजे।
मुख्य गेट अपने आप खुला।
विधायक की काली लेक्सस अंदर दाखिल हुई।
पूरा परिसर बिल्कुल शांत था।
न कोई गार्ड इधर-उधर भाग रहा था...
न कोई हड़बड़ी।
जैसे इस हवेली में समय भी इजाज़त लेकर चलता हो।
गाड़ी पोर्टिको में रुकी।
महेन्द्र तेजी से नीचे उतरा।
लेकिन जैसे ही अंदर जाने लगा...
दो हथियारबंद आदमी उसके सामने आ गए।
"हथियार।"
महेन्द्र झल्ला गया।
"पागल हो गए हो क्या? मुझे पहचानते नहीं?"
उनमें से एक मुस्कुराया।
"आपको पूरा शिवपुर पहचानता है।"
"फिर?"
"यही वजह है कि तलाशी होगी।"
महेन्द्र गुस्से से लाल हो गया।
"मैं सुल्तान का आदमी हूँ।"
गार्ड ने बिना भाव बदले कहा—
"हम भी।"
कुछ सेकंड...
फिर महेन्द्र ने अपनी पिस्तौल निकालकर टेबल पर रख दी।
मोबाइल भी।
घड़ी भी।
गार्ड ने कहा—
"अब जाइए।"
हवेली के अंदर...
लकड़ी की पुरानी सीढ़ियाँ...
दीवारों पर लगी सौ साल पुरानी पेंटिंग्स...
और बीच में धीमी आवाज़ में बजती ग़ज़ल।
महेन्द्र तेज़ कदमों से चलता हुआ लाइब्रेरी तक पहुँचा।
दरवाज़ा खुला।
अंदर...
सुल्तान मिर्ज़ा किताब पढ़ रहा था।
ऐसा लग ही नहीं रहा था कि पूरा शहर आग में जल रहा है।
उसने किताब बंद भी नहीं की।
बस इतना पूछा—
"चाय... या कॉफी?"
महेन्द्र भड़क गया।
"मज़ाक मत करो सुल्तान!"
सुल्तान ने पहली बार किताब बंद की।
धीरे से चश्मा उतारा।
"गुस्से में इंसान की आवाज़ ऊँची हो जाती है..."
"...और सोचने की ताकत कम।"
महेन्द्र ने फोटो उसकी तरफ फेंक दी।
फोटो मेज़ पर फिसलती हुई सुल्तान के सामने आकर रुकी।
सुल्तान ने फोटो उठाई।
दो सेकंड देखा।
फिर उसे वापस मेज़ पर रख दिया।
उसके चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया।
महेन्द्र हैरान रह गया।
"तुम्हें डर नहीं लग रहा?"
सुल्तान ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा—
"डर... किससे?"
"उस लड़के से!"
"अर्नब।"
सुल्तान कुर्सी से उठा।
धीरे-धीरे खिड़की तक गया।
बाहर बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।
उसने बिना पीछे देखे कहा—
"जिस दिन मैंने किसी लड़के से डरना शुरू कर दिया..."
"...उस दिन मुझे मर जाना चाहिए।"
महेन्द्र चिल्लाया—
"तुम समझ क्यों नहीं रहे!"
"पहले राजू..."
"फिर विक्का..."
"फिर फैक्ट्री..."
"अब मुझे धमकी!"
"कल तुम्हारी बारी भी आ सकती है।"
सुल्तान धीरे से मुस्कुराया।
"नहीं।"
महेन्द्र रुक गया।
"क्यों?"
सुल्तान पलटा।
उसकी आँखों में पहली बार हल्की चमक दिखाई दी।
"क्योंकि..."
"...अर्नब मुझे मारना नहीं चाहता।"
महेन्द्र अवाक रह गया।
"क्या मतलब?"
सुल्तान ने शतरंज की बिसात अपनी तरफ खींची।
सारे मोहरे सजे हुए थे।
उसने एक प्यादा उठाया।
"ये..."
"...राजू था।"
प्यादा हटा दिया।
दूसरा प्यादा उठाया।
"ये विक्का।"
वो भी हट गया।
फिर उसने ऊँट उठाया।
"ये महेन्द्र चौहान है।"
महेन्द्र ने गुस्से में कहा—
"मुझे मोहरा मत बोलो।"
सुल्तान ने उसकी बात अनसुनी कर दी।
उसने ऊँट को भी बिसात से हटा दिया।
अब बिसात पर सिर्फ राजा बचा था।
सुल्तान ने राजा पर उँगली रखी।
"अगर कोई सीधे राजा को मारना चाहता..."
"...तो पहले प्यादों पर समय बर्बाद नहीं करता।"
महेन्द्र की धड़कन तेज़ हो गई।
"तो फिर...?"
सुल्तान की आवाज़ बेहद धीमी थी।
"वो..."
"...राजा को अकेला कर रहा है।"
कमरे में खामोशी छा गई।
पहली बार...
सुल्तान ने स्वीकार किया था कि अर्नब सिर्फ हत्यारा नहीं...
रणनीतिक खिलाड़ी है।
लेकिन अगले ही पल...
सुल्तान मुस्कुराया।
"अफसोस..."
महेन्द्र ने पूछा—
"किस बात का?"
सुल्तान ने शतरंज का काला घोड़ा उठाया।
"उसे लगता है..."
"...मैं सिर्फ एक राजा हूँ।"
उसने घोड़ा राजा के सामने रख दिया।
"उसे अभी मेरे घोड़े के बारे में पता ही नहीं।"
महेन्द्र ने भौंहें सिकोड़ लीं।
"घोड़ा?"
सुल्तान ने धीरे से कहा—
"शाहिद... काला अंसारी।"
उसी पल...
लाइब्रेरी का दरवाज़ा खुला।
भारी कदमों की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
दरवाज़े पर काला खड़ा था।
लेकिन...
उसके चेहरे पर पहली बार मुस्कान नहीं थी।
उसने अंदर आते ही सुल्तान की तरफ देखा और बोला—
"भाई... अर्नब ने पहली चाल चल दी है..."
"...लेकिन मुझे लगता है, उसने हमें नहीं..."
"...किसी और को निशाना बनाया है।"
सुल्तान की आँखें पहली बार सिकुड़ गईं।