Mummy's Diary in Hindi Women Focused by Shilpa exam tips books and stories PDF | मम्मी की डायरी

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मम्मी की डायरी

मम्मी की डायरी

मम्मी को गुज़रे छह महीने हो गए थे। 

उस दिन मैं उनका कमरा साफ कर रहा था। अलमारी में पुराने कपड़े, साड़ियाँ और कुछ कागज़ रखे थे। सबसे नीचे एक छोटी सी, फटे हुए कवर वाली डायरी दबी पड़ी थी। कवर पर नीली स्याही से लिखा था - "रिया की डायरी - 1998"। 

मैं चौंक गया। मम्मी का नाम तो सुनीता था। और मम्मी ने कभी डायरी लिखी ही नहीं थी। शायद ये उनकी जवानी की डायरी थी।

मैंने पहले पन्ने पर हाथ रखा और काँपते हुए खोला। 

पहली ही लाइन पढ़कर मेरी साँस रुक गई।

"आज का दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे खुशी वाला दिन था। प्रिंसिपल सर ने स्टेज पर सबके सामने मेरा नाम लिया। मैंने 12th में पूरे जिले में टॉप किया है। सर ने कहा मेरा सिलेक्शन दिल्ली यूनिवर्सिटी में हो गया है... English Literature पढ़ने के लिए।"

नीचे लिखा था: "पापा मान नहीं रहे। कह रहे हैं लड़कियाँ ज़्यादा पढ़कर क्या करेंगी। जल्दी शादी कर दो। 18 की हो गई है अब।"

मेरे हाथ से डायरी गिरते-गिरते बची।

मैंने अगला पन्ना पलटा। 

"आज फिर पापा से झगड़ा हुआ। मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ। मम्मी भी मेरा साथ नहीं दे रही। कह रही हैं बहू-बेटी का काम घर संभालना है, अस्पताल नहीं। मेरा सपना... शायद सपना ही रह जाएगा।"

पन्ने पलटते गए और मेरा दिल टूटता गया। 

रिया... यानी मेरी मम्मी... पेंटर बनना चाहती थी। उसने अपने कॉलेज के फेयर में पहला इनाम जीता था। एक स्केच था - एक औरत का, जो खिड़की से बाहर देख रही थी। नीचे लिखा था "आज़ादी"।

एक जगह लिखा था: "आज Aman पैदा हुआ। 3 किलो का। सब कह रहे हैं बेटा हुआ है, वंश चलेगा। मैं रो रही थी। खुशी से नहीं... डर से। कहीं मेरा बेटा भी मुझसे मेरा सपना न छीन ले।"

मैं रो पड़ा। 

मैं डॉक्टर बन गया था। मम्मी ने मुझे डॉक्टर बनाने के लिए क्या-क्या नहीं किया। पापा के मरने के बाद भी उसने ट्यूशन पढ़ाकर मेरी फीस भरी। खुद पुरानी साड़ी पहनती थी, पर मेरे लिए नई किताबें लाती थी।

मैंने कभी नहीं पूछा कि मम्मी को क्या बनना था।

डायरी का आखिरी पन्ना सबसे ज़्यादा चुभा। वो 20 साल पुराना था। स्याही हल्की पड़ गई थी।

"अगर मेरा बेटा बड़ा होकर डॉक्टर बन गया, तो समझ लेना मेरा सपना उसमें ज़िंदा है। मैं रिया नहीं बन पाई... English Literature नहीं पढ़ पाई, डॉक्टर नहीं बन पाई, पेंटर नहीं बन पाई। पर मेरा बेटा Dr. Aman बनेगा। वो मेरा नाम रोशन करेगा। ये मेरी जीत होगी। मेरा अधूरा सपना... उसके पूरे होने में है। - रिया"

डायरी मेरे हाथ से छूट गई।

उसी दिन मेरी ड्यूटी थी। OT में मेरा पहला बड़ा ऑपरेशन था। मरीज़ की हालत बहुत सीरियस थी। सब कह रहे थे चांस कम है।

ऑपरेशन करते वक्त मेरी आँखों के सामने मम्मी का वो स्केच आ रहा था... "आज़ादी" वाली औरत।

6 घंटे बाद जब मरीज़ की धड़कन स्थिर हुई, तो मैं OT से बाहर आया और सीधा मम्मी की फोटो के सामने गया।

फोटो पर हार चढ़ा था। मैंने हार हटाया और फोटो को सीने से लगा लिया।

फुसफुसाकर कहा: "मम्मी... आज Dr. Aman बन गया। तुम्हारा सपना... तुम्हारी जीत हो गई।"

शाम को मैं मम्मी के कमरे में गया। उनका स्केच उठाया और अपने क्लिनिक की दीवार पर लगा दिया। 

नीचे एक लाइन लिख दी: "डॉ. अमान की प्रेरणा - रिया"

उस दिन मुझे समझ आया... मम्मी मरी नहीं थी। वो मेरे हर मरीज़ में ज़िंदा थी। हर उस बच्चे में ज़िंदा थी जिसे मैं मुफ्त में देखता था, जैसे मम्मी मुझे देखती थी।

क्योंकि कुछ माँएँ खुद नहीं जीतीं... पर अपने बच्चों में हज़ार बार जी जाती हैं।

मम्मी तुम चली गईं... पर तुम्हारा सपना मेरे सीने में धड़कता है