his prey in Hindi Horror Stories by Akshay Yadav books and stories PDF | उसका शिकार

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उसका शिकार

उसका शिकार

लेखन: कुमार (भयकथासूर)

हर्षदा और रवि की शादी को मुश्किल से तीन महीने हुए थे। दोनों की मुलाकात एक इवेंट पार्टी में हुई थी। रवि पेशे से एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी का मालिक था और हर्षदा मुंबई में मॉडल बनने आई थी। धीरे-धीरे दोनों की पहचान दोस्ती में और दोस्ती प्यार में बदल गई। केवल तीन महीने की जान-पहचान के बाद उन्होंने शादी कर ली।रवि के परिवार में अब कोई नहीं था। उसके माता-पिता का निधन हो चुका था। दूसरी ओर, हर्षदा के माता-पिता ने उससे संबंध तोड़ लिए थे क्योंकि वह मॉडल बनना चाहती थी। इसलिए दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली और अपने नए जीवन की शुरुआत के लिए एक नई बनी बड़ी इमारत में फ्लैट बुक किया।"हम्म... तो स्वीटहार्ट, यह है हमारा नया घर। एक बार अच्छी तरह देख लो।" रवि खाली फ्लैट में प्रवेश करते हुए बोला।"घर तो बहुत सुंदर है। और बेडरूम में बालकनी भी है। वाह! कितना खूबसूरत है। हम यहां हॉल में इस दीवार पर एक बड़ा टीवी लगाएंगे। उसके सामने बड़ा सा सोफा होगा जहां हम दोनों साथ बैठकर फिल्में देखेंगे। इस बालकनी में एक टेबल और दो कुर्सियां रखेंगे, जहां सुबह की चाय पिएंगे। बेडरूम में मुझे दो अलमारियां चाहिए, एक तुम्हारे लिए और एक मेरे लिए। यहां बेड रहेगा और बाथरूम में एक बाथटब भी रखेंगे।"हर्षदा उत्साह से पूरे घर की कल्पना कर रही थी। तभी रवि धीरे-धीरे उसके करीब आया और उसे अपनी बाहों में खींच लिया।"अरे रवि, ये क्या कर रहे हो? कोई आ जाएगा।" हर्षदा ने उसे हल्का सा धक्का देते हुए कहा।"यहां हमारे अलावा कौन आने वाला है?" रवि मुस्कुराया।यह कहकर उसने उसे फिर अपनी ओर खींचा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।कुछ ही सेकंड बाद मुख्य दरवाजे पर दस्तक हुई। रवि तुरंत उससे अलग हो गया।"यार, अब कौन आ गया? लोगों को टाइम का कोई अंदाज़ा नहीं होता क्या? बेबी, मैं देखता हूं कौन है।"बड़बड़ाते हुए रवि दरवाजे की ओर बढ़ा। तभी फिर से दस्तक हुई।"आ रहा हूं! ज़रा सब्र नहीं होता क्या?" उसने झुंझलाकर दरवाजा खोला।सामने फ्लैट का ब्रोकर खड़ा था। दरवाजा खुलते ही उसने मुस्कुराकर रवि को नमस्ते किया।"माफ कीजिए साहब, आने में थोड़ी देर हो गई। लेकिन आपने घर देख लिया ना? कैसा लगा?""मुझे घर बहुत पसंद आया। एक-दो दिन में कागज़ लेकर आओ और पैसे ले जाओ।" रवि ने जवाब दिया।ब्रोकर मुस्कुराया और हाथ जोड़ते हुए बोला,"साहब, आपके होंठ से खून निकल रहा है, उसे साफ कर लीजिए। और नई-नई शादी हुई है, मैं समझ सकता हूं। काम हो जाए तो चाबी वापस दे दीजिएगा।"शरारती मुस्कान के साथ वह वहां से चला गया।रवि ने अपने होंठों को छुआ। सचमुच वहां खून लगा हुआ था। वह मुस्कुराते हुए अंदर आया।"क्या हर्षा! कितनी बार कहा है कि मेरे होंठ मत काटा करो। लेकिन तुम मानती ही नहीं। अभी वो ब्रोकर आया था, कैसे अजीब नज़रों से देख रहा था। कह रहा था—नई शादी हुई है, मैं समझ सकता हूं!"हर्षदा मुस्कुरा दी।"क्या करूं? मुझे प्यार करना ऐसे ही आता है। तुम्हारे होंठों में एक अजीब सा नशा है, जो मुझे ऐसा करने पर मजबूर कर देता है।"यह कहते हुए उसने फिर से रवि को चूम लिया।अगले दिन ब्रोकर सभी जरूरी कागज़ लेकर रवि के घर पहुंचा। रवि पहले से सारे दस्तावेज तैयार रख चुका था। कुछ जगह हस्ताक्षर करने के बाद ब्रोकर ने उसे फ्लैट की चाबी और कागज़ सौंप दिए तथा पैसे लेकर चला गया।आज रवि बेहद खुश था। उसका और हर्षदा का नया जीवन शुरू होने वाला था। वे अपने सपनों के घर में कदम रखने वाले थे।उसने तय किया कि पूरा दिन वह हर्षदा के साथ बिताएगा। दोनों सुबह घूमने निकले, खरीदारी की, फिल्म देखी और फिर एक रेस्टोरेंट में खाना खाने पहुंचे।वहीं पीछे वाली टेबल पर रवि का सबसे करीबी दोस्त किशन अपनी पत्नी के साथ बैठा था।किशन को देखकर रवि अपनी सीट से उठा और उसके पास जाकर बोला,"अरे किशन, तू यहां?""अरे रवि! क्या शानदार सरप्राइज़ है यार। तू भी यहां?" किशन खुशी से बोला।"हाँ भाई, शादी हो गई ना, तो पत्नी के साथ आया हूँ।" रवि ने हर्षदा की ओर देखते हुए कहा।"साले! शादी कर ली और बताया तक नहीं। भाभी तो बहुत खूबसूरत हैं।" किशन ने मज़ाक में उसकी कोहनी मारते हुए कहा।"आओ, परिचय करा देता हूँ। हर्षदा, ये किशन है, कॉलेज के दिनों का मेरा सबसे अच्छा दोस्त। और किशन, ये मेरी पत्नी हर्षदा।""आप लोग हमारे साथ ही क्यों नहीं बैठ जाते? साथ में खाना खाते हैं।" हर्षदा ने मुस्कुराकर कहा।"हाँ यार, भाभी सही कह रही हैं।" रवि ने भी हामी भरी।"नहीं यार, तुम लोग अपना समय बिताओ। हम क्यों बीच में आएँ?" किशन थोड़ा झिझकते हुए बोला।"अरे, सिर्फ खाना ही तो है। उसके बाद हम दोनों तो साथ ही हैं।" हर्षदा हँसते हुए बोली।"ठीक है फिर।"कुछ देर बाद चारों लोग साथ बैठकर खाने लगे। कॉलेज के दिनों की बातें, पुरानी यादें और मज़ाक चलता रहा।अचानक रवि को कुछ याद आया।"अरे हाँ, बताना तो भूल ही गया। मैंने नया फ्लैट खरीदा है। जल्द ही उसकी गृहप्रवेश पूजा होगी। तुम्हें ज़रूर आना पड़ेगा।""वाह! लगता है भाभी के कदम बहुत शुभ हैं। लेकिन फ्लैट कहाँ लिया है?" किशन ने पूछा।"मालाड में, राधाकृष्ण अपार्टमेंट। पाँचवीं मंज़िल पर तीन कमरों का फ्लैट है। काफी सस्ते में मिल गया।"राधाकृष्ण अपार्टमेंट का नाम सुनते ही किशन के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने तुरंत पानी का पूरा गिलास खाली कर दिया।"क्या हुआ? सब ठीक है ना?" रवि ने चिंतित होकर पूछा।"हाँ... सब ठीक है। लेकिन एक बात कहूँ? बुरा मत मानना... वहाँ घर मत लेना। वो जगह ठीक नहीं है।""ठीक नहीं है मतलब?" हर्षदा ने चिंता से पूछा।किशन कुछ पल चुप रहा, फिर धीमे स्वर में बोला,"भाभी, कैसे बताऊँ... लोग कहते हैं कि वह जगह शापित है। कई लोगों ने वहाँ एक औरत को अपने छोटे बच्चे के साथ घूमते देखा है। कहा जाता है कि इमारत का निर्माण चल रहा था, तब एक दुर्घटना में उसकी और उसके बच्चे की मौत हो गई थी। तब से उसकी आत्मा वहीं भटकती रहती है।"हर्षदा हँस पड़ी।"भैया, मुझे इन बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं है। लोग यूँ ही अफवाहें फैलाते रहते हैं।""हो सकता है।" किशन बोला, "लेकिन मैंने अपना फर्ज़ समझकर बता दिया।""चलो छोड़ो ये सब। अब घर तो खरीद लिया है। देखते हैं आगे क्या होता है।" रवि ने बात खत्म करते हुए कहा।उसके बाद सबने अपना दिन खुशी-खुशी बिताया।कुछ दिनों बाद उनका सारा सामान नए फ्लैट में शिफ्ट हो गया। नया फर्नीचर भी आ गया था। दो दिन बाद दोनों अपने नए घर में रहने आ गए।शुरुआती दो हफ्ते बहुत अच्छे बीते।लेकिन फिर एक रात...ऑफिस से लौटकर रवि गहरी नींद में सो गया था। आधी रात के करीब अचानक उसकी आँख खुल गई।उसने बगल में देखा।हर्षदा वहाँ नहीं थी।उसने होंठों पर जीभ फेरी। वहाँ हल्की सी चोट महसूस हुई। वह हल्का सा मुस्कुराया और उठकर बाथरूम की ओर गया।बाथरूम का दरवाज़ा खुला था, लेकिन अंदर कोई नहीं था।वह बाहर हॉल में आया।तभी उसने देखा कि हर्षदा बालकनी में खड़ी नीचे किसी चीज़ को देख रही है।रवि ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा।हर्षदा बुरी तरह चौंक गई।"अरे... अरे... मैं हूँ।" रवि ने उसे शांत करते हुए कहा।"रवि! तुमने तो डरा ही दिया।" हर्षदा की आवाज़ काँप रही थी।"लेकिन तुम यहाँ रात के दो बजे क्या कर रही हो?"हर्षदा ने नीचे इशारा किया।"मुझे नींद नहीं आ रही थी, इसलिए यहाँ आ गई। तभी मैंने नीचे देखा। वहाँ एक औरत खड़ी थी। अँधेरा था इसलिए चेहरा साफ नहीं दिख रहा था, लेकिन उसकी गोद में एक बच्चा था।"वह बोलते-बोलते काँपने लगी।"और जब मैं बालकनी में आई... तो वो मुझे ही देख रही थी।"रवि का चेहरा गंभीर हो गया।"रवि... कहीं किशन की बात सच तो नहीं? कहीं ये जगह सचमुच...""बस!" रवि ने उसकी बात काट दी।"तुम शांत हो जाओ। किशन ने जो बताया था वो सब बकवास है। शायद तुम्हें भ्रम हुआ है।""लेकिन...""मैं खुद देखता हूँ।"यह कहकर रवि बालकनी में गया।उसने नीचे झाँका।और अगले ही पल उसका दिल जोर से धड़कने लगा।नीचे सचमुच एक औरत खड़ी थी...उसकी गोद में एक छोटा बच्चा था...और वह सीधे उनके फ्लैट की ओर देख रही थी।भाग 3नीचे वह औरत बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसकी गोद में एक छोटा बच्चा था और वह बिना पलक झपकाए उनकी बालकनी की ओर देख रही थी।उसे देखकर रवि दो कदम पीछे हट गया। उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।उसने तुरंत बालकनी का दरवाज़ा बंद कर दिया।"क्या हुआ?" हर्षदा ने घबराकर पूछा।"कुछ नहीं... तुम एक काम करो, अंदर बेडरूम में जाओ और दरवाज़ा बंद करके बैठो। मैं नीचे जाकर देखता हूँ कि वह औरत कौन है।""लेकिन...""कोई लेकिन नहीं। और जब तक मैं वापस न आ जाऊँ, दरवाज़ा मत खोलना।"रवि जल्दी से फ्लैट से बाहर निकल गया।लिफ्ट से नीचे उतरते समय उसके दिमाग में किशन की बातें गूँज रही थीं।"वह जगह शापित है...""एक औरत अपने बच्चे के साथ भटकती है..."उसने सिर झटका।"नहीं... ये सब बकवास है।" लेकिन दिल उसकी बात मानने को तैयार नहीं था।वह इमारत के पीछे की ओर बढ़ने लगा, जहाँ वह औरत दिखाई दी थी।अचानक किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया।रवि डर के मारे उछल पड़ा।पीछे मुड़कर देखा तो बिल्डिंग का चौकीदार खड़ा था।"क्या हुआ साहब? इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हैं?" चौकीदार ने पूछा।रवि के माथे पर पसीना चमक रहा था।"वो... एक औरत खड़ी है पीछे। उसकी गोद में बच्चा है। मैं देखने आया हूँ कि वह कौन है।"चौकीदार हैरानी से उसकी ओर देखने लगा।"औरत? इस समय?""हाँ, अभी हमारे फ्लैट की तरफ देख रही थी।"चौकीदार कुछ पल चुप रहा।"साहब, अभी-अभी मैं उसी तरफ से आ रहा हूँ। वहाँ कोई नहीं है।""क्या मतलब कोई नहीं है?" रवि झल्लाकर बोला।"मैं और मेरी पत्नी दोनों ने उसे देखा है।""मुझे नहीं पता साहब, लेकिन पिछले पंद्रह मिनट से मैं पूरी बिल्डिंग के चक्कर लगा रहा हूँ। वहाँ कोई औरत नहीं थी।"रवि को गुस्सा आ गया।"चलो मेरे साथ। अभी देखते हैं।"दोनों उस जगह की ओर बढ़े। लेकिन वहाँ पहुँचकर रवि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।वहाँ कोई नहीं था।न औरत...न बच्चा...कुछ भी नहीं।चारों तरफ सिर्फ सन्नाटा और अंधेरा था।"ये कैसे हो सकता है?" रवि बड़बड़ाया।"साहब, मैंने कहा था ना... शायद आपको भ्रम हुआ होगा।"रवि कुछ नहीं बोला।दोनों वापस लौटने लगे।कुछ कदम चलने के बाद रवि अचानक रुक गया।"एक बात बताओ।""जी?""क्या इस बिल्डिंग में कभी किसी औरत और उसके बच्चे की मौत हुई थी?"चौकीदार ने तुरंत सिर हिला दिया।"नहीं साहब। मैं इस इमारत की नींव पड़ने के समय से यहाँ काम कर रहा हूँ। ऐसा कोई हादसा कभी नहीं हुआ।""पक्का?""बिल्कुल पक्का। किसी ने आपको गलत कहानी सुनाई है।"रवि ने राहत की साँस ली।"ठीक है।"वह वापस बिल्डिंग की ओर चल पड़ा।लेकिन उसके जाते ही चौकीदार की मुस्कान गायब हो गई।उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।अंधेरे में वही औरत अपने बच्चे को गोद में लिए खड़ी थी।वह दूर जाते हुए रवि को देख रही थी।चौकीदार के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।वह धीमे स्वर में बुदबुदाया,"अगर इन्हें सच्चाई पता चल गई... तो ये भी बाकी लोगों की तरह यह घर छोड़कर भाग जाएँगे..." रवि ऊपर पहुँचा तो हर्षदा दरवाज़े पर उसका इंतज़ार कर रही थी।"मिली वो औरत?" उसने डरते हुए पूछा।"नहीं। जब मैं नीचे पहुँचा तब वहाँ कोई नहीं था। चौकीदार भी कह रहा था कि उसने किसी को नहीं देखा।""तो फिर वो गई कहाँ?"हर्षदा की आवाज़ काँप रही थी।रवि ने उसका चेहरा देखा।वह सचमुच डरी हुई थी।उसने उसे अपने पास खींच लिया।"बस... अब इस बारे में मत सोचो।"उसने हर्षदा को बाँहों में भर लिया।धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे में खो गए।उसी समय...बिल्डिंग के नीचे...वही रहस्यमयी औरत अपने बच्चे को गोद में लिए खड़ी थी।वह ऊपर उनकी बालकनी की ओर देख रही थी।और धीरे-धीरे अपना सिर नकारात्मक रूप से हिला रही थी...मानो वह किसी आने वाले खतरे की चेतावनी दे रही हो।अगली सुबह रवि नहाने के लिए बाथरूम में गया। जैसे ही पानी उसकी पीठ और छाती पर पड़ा, उसके मुँह से दर्द भरी कराह निकल गई।"आह...!"वह तुरंत आईने के सामने खड़ा हो गया।उसकी छाती और पीठ पर कई जगह दाँतों के निशान बने हुए थे। कुछ जगहों पर तो हल्की चोट भी आ गई थी।रवि हैरान रह गया।उसे याद आया कि पिछली रात हर्षदा उसके साथ कितनी ज्यादा उत्तेजित हो गई थी।किसी तरह नहाकर वह बाहर आया और तैयार होकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।हर्षदा उसे देखकर खुश हो गई।वह दौड़कर आई और उसे गले लगा लिया।लेकिन जैसे ही उसने रवि को छुआ, उसके शरीर में दर्द की लहर दौड़ गई।वह हल्का सा पीछे हट गया।"क्या हुआ?" हर्षदा ने पूछा।"क्या हुआ?" रवि मुस्कुराया, "रात भर मुझे काटती रहोगी और सुबह पूछोगी कि क्या हुआ?"हर्षदा का चेहरा शर्म से लाल हो गया।"ओह... क्या मैंने सच में इतना जोर से काट लिया?""थोड़ा नहीं, बहुत ज्यादा।""सॉरी..." वह मासूमियत से बोली, "मुझे होश ही नहीं रहा था।""कोई बात नहीं। लेकिन अगली बार थोड़ा कंट्रोल रखना।"हर्षदा मुस्कुरा दी।फिर अचानक उसने रवि को चूम लिया।और इस बार भी उसने उसके होंठ को हल्का सा काट लिया।रवि हँस पड़ा।उस दिन ऑफिस में रवि बहुत व्यस्त था।एक बड़ी कंपनी का इवेंट उसके पास आया था, इसलिए उसे घर लौटने में देर हो गई।रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजे वह बिल्डिंग पहुँचा।उसने गेट के पास हॉर्न बजाया, लेकिन कोई नहीं आया।झुंझलाकर वह खुद नीचे उतरा, गेट खोला और कार अंदर ले गया।पार्किंग बेसमेंट में थी।बेसमेंट का एक कोना काफी अंधेरे में डूबा हुआ था।कार मोड़ते समय उसे लगा जैसे वहाँ कोई हरकत हुई हो।लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया।उसने कार पार्क की और बाहर निकलने के लिए दरवाज़ा खोला।लेकिन दरवाज़ा खुला ही नहीं।उसने दोबारा कोशिश की।फिर तीसरी बार।फिर चौथी बार।लेकिन दरवाज़ा जाम हो चुका था।रवि के माथे पर पसीना आ गया।उसी समय...अंधेरे से एक आकृति बाहर निकली।एक औरत...जिसकी गोद में एक बच्चा था।रवि की साँस अटक गई।वह वही औरत थी।लेकिन इस बार उसका रूप पहले से कहीं ज्यादा भयानक था।उसने पीली साड़ी पहन रखी थी, जो जगह-जगह खून से लाल हो चुकी थी।उसका माथा फटा हुआ था।जमे हुए खून की धार उसके चेहरे पर बहती हुई दिखाई दे रही थी।उसकी गोद में जो बच्चा था, उसकी गर्दन एक ओर लटकी हुई थी।उसका शरीर भी खून से सना हुआ था।रवि डर के मारे सुन्न हो गया।वह औरत धीरे-धीरे कार की ओर बढ़ रही थी।उसकी आँखें सीधे रवि पर टिकी थीं।वह कार के सामने आकर रुक गई।फिर उसने अपना खून से सना हाथ कार के शीशे पर रख दिया।रवि पागलों की तरह दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने लगा।लेकिन दरवाज़ा नहीं खुल रहा था।औरत कुछ बोल रही थी।उसके होंठ हिल रहे थे।लेकिन बंद कार के कारण उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी।रवि अब लगभग रोने की हालत में पहुँच चुका था।उसने पूरी ताकत से दरवाज़े का लॉक खींचा।और अचानक...दरवाज़ा खुल गया।रवि तुरंत कार से बाहर निकला और भागता हुआ लिफ्ट की ओर दौड़ पड़ा।तभी पहली बार उसे उस औरत की आवाज़ सुनाई दी।एक भारी, खुरदुरी और डरावनी आवाज़—"साहब... सावधान रहिए..."रवि भागता रहा।"आपको खतरा है..."उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।"मुझसे नहीं..."वह लिफ्ट के पास पहुँच गया।काँपते हाथों से उसने बटन दबाया।लिफ्ट तुरंत खुल गई।रवि अंदर कूद गया।दरवाज़ा बंद होने ही वाला था कि वह औरत फिर सामने आ गई।इस बार उसकी आवाज़ और साफ थी।"साहब... खतरा मुझसे नहीं है...""वो आपका शिकार करने आई है...""सावधान रहिए..."लिफ्ट का दरवाज़ा बंद हो गया।लेकिन वह आवाज़ अब भी रवि के कानों में गूँज रही थी।"वो आपका शिकार करने आई है...""सावधान रहिए..."भाग 2लिफ्ट का दरवाज़ा बंद हो चुका था, लेकिन उस रहस्यमयी औरत की आवाज़ अब भी रवि के कानों में गूँज रही थी।"आपको खतरा है...""वो आपका शिकार करने आई है...""सावधान रहिए..."रवि का पूरा शरीर काँप रहा था।कुछ ही क्षणों बाद वह अपने फ्लैट के सामने पहुँचा। उसने घबराहट में लगातार तीन-चार बार डोरबेल बजा दी।दरवाज़ा खुलते ही हर्षदा सामने दिखाई दी।रवि की हालत देखकर वह घबरा गई।उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था और साँसें तेज़ चल रही थीं।"रवि! क्या हुआ? तुम ठीक तो हो?" उसने चिंतित होकर पूछा।हर्षदा उसे अंदर ले आई और पानी का गिलास दिया।रवि ने एक ही साँस में पूरा पानी पी लिया।कुछ देर बाद उसकी साँसें सामान्य हुईं।लेकिन अचानक वह उठकर बालकनी की ओर दौड़ा।उसने नीचे झाँककर देखा।और उसका दिल फिर से दहल गया।वही औरत...वही मृत बच्चा...वह फिर नीचे खड़ी थी।रवि ने तुरंत बालकनी का दरवाज़ा बंद कर दिया।"क्या हुआ?" हर्षदा लगभग रोते हुए बोली।"वो औरत..." रवि ने काँपती आवाज़ में कहा, "वो अभी भी नीचे खड़ी है।""उसने तुम्हें कुछ किया तो नहीं?""नहीं... लेकिन..."रवि कुछ पल चुप रहा।"उसने कहा कि मुझे खतरा है।""क्या?" हर्षदा का चेहरा सफेद पड़ गया।"और उसने कहा कि कोई मेरा शिकार करना चाहता है।""रवि, हम यहाँ नहीं रहेंगे। कल ही ये घर छोड़ देंगे। मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा।"हर्षदा रोते हुए उसके गले लग गई।रवि ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसे शांत करने की कोशिश की।लेकिन अचानक उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।उसे ऐसा लगा जैसे हर्षदा की पीठ पर कोई उभरा हुआ हिस्सा है...मानो कुबड़ हो।वह चौंक गया।उसने दोबारा हाथ फेरा।लेकिन इस बार सब सामान्य था।"शायद मेरा भ्रम होगा..." उसने मन ही मन सोचा।"अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं कैसे जिऊँगी?" हर्षदा रोते हुए बोली।"मुझे कुछ नहीं होगा। और जल्द ही मैं इस सबका सच पता लगा लूँगा।"इतना कहकर रवि पीछे मुड़ा।सामने दीवार पर लगा बड़ा आईना था।और उसी आईने में...उसे कुछ ऐसा दिखाई दिया कि उसके रोंगटे खड़े हो गए।आईने में हर्षदा का प्रतिबिंब वैसा नहीं था जैसा होना चाहिए था।एक पल के लिए उसे लगा कि वहाँ कोई दूसरी आकृति खड़ी है।एक बूढ़ी, झुकी हुई औरत।रवि ने झटके से पीछे मुड़कर देखा।लेकिन वहाँ सिर्फ हर्षदा ही खड़ी थी।"क्या हुआ?" उसने पूछा।"क... कुछ नहीं।"रवि ने नज़रें फेर लीं।हर्षदा मुस्कुराई।"तुम फ्रेश हो जाओ। मैं खाना गरम करती हूँ।"वह किचन में चली गई।लेकिन रवि की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।उस रहस्यमयी औरत की आवाज़ उसके दिमाग में लगातार गूँज रही थी—"आपको उससे खतरा है...""वो आपका शिकार करेगी..."उस रात रवि को देर से नींद आई।लेकिन आधी रात के बाद अचानक उसकी आँख खुल गई।कमरे में हर्षदा नहीं थी।रवि उठकर बाहर आया।हर्षदा फिर बालकनी में खड़ी थी।चाँदनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।एक पल के लिए रवि को लगा कि उसकी आँखें लाल चमक रही हैं।लेकिन जब वह थोड़ा और पास गया, तो सब सामान्य दिखाई दिया।"हर्षा... तुम यहाँ क्या कर रही हो?"हर्षदा मुस्कुराई।"नींद नहीं आ रही थी। बाहर कितना अच्छा मौसम है ना?"वह धीरे-धीरे उसके करीब आई।फिर उसने दोनों हाथ रवि के गले में डाल दिए।लेकिन इस बार रवि ने उसे हल्के से दूर कर दिया।"आज नहीं, हर्षा।""क्यों?""मुझे समझ नहीं आ रहा कि मेरे साथ क्या हो रहा है।"रवि ने सिर पकड़ लिया।"जो चीज़ें मैं देख रहा हूँ... वो सच हैं या भ्रम... कुछ समझ नहीं आता।"हर्षदा उसके पास बैठ गई।"तुम ज्यादा सोच रहे हो।"फिर उसने उसके कान के पास फुसफुसाया—"सब कुछ मुझ पर छोड़ दो..."वह फिर उसके होंठों के करीब आने लगी।लेकिन इस बार रवि ने खुद को पीछे कर लिया।"सॉरी... आज मेरा मूड नहीं है।"हर्षदा कुछ पल उसे देखती रही।फिर मुस्कुरा दी।"ठीक है। मैं तुम्हारे लिए ड्रिंक लेकर आती हूँ।"वह अंदर चली गई।रवि अकेला बैठा सोचता रहा।"क्या वो औरत सच कह रही थी?""क्या सचमुच मुझे हर्षदा से खतरा है?""नहीं... ऐसा नहीं हो सकता..."लेकिन आईने में दिखी वह भयानक आकृति उसे बार-बार याद आ रही थी।और तभी...उसके कानों में फिर वही आवाज़ गूँजी—"सावधान रहिए...""वो आपका शिकार करने आई है..."कुछ ही देर में हर्षदा ड्रिंक लेकर वापस आई।"लो, इसे पी लो। इससे तुम्हें आराम मिलेगा।"रवि ने उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह वही मोहक मुस्कान थी।रवि ने ग्लास हाथ में लिया और कुछ ही घूँट में पूरा ड्रिंक खत्म कर दिया।धीरे-धीरे उसकी आँखें भारी होने लगीं।सामने बैठी हर्षदा का चेहरा धुंधला पड़ने लगा।और कुछ ही क्षणों में उसे गहरी नींद आ गई।सुबह जब रवि की आँख खुली तो वह अपने बिस्तर पर था।हर्षदा उसके सामने बैठी मुस्कुरा रही थी।"जाग गए?""हाँ... लेकिन मैं यहाँ कैसे आया? मैं तो बालकनी में था।"हर्षदा हँस पड़ी।"तुम्हें वहीं नींद आ गई थी। पहले तो सोचा कि तुम्हें उठाकर लाऊँ, फिर तुम्हें जगाया और तुम खुद ही चलते हुए यहाँ आ गए।"रवि भी मुस्कुरा दिया।लेकिन उसके मन में शंका अब भी बनी हुई थी।"आज ऑफिस नहीं जाऊँगा," उसने कहा, "आज पूरा दिन हम साथ बिताएँगे।""सच?""हाँ।"हर्षदा खुश हो गई।रवि बाथरूम में चला गया।लेकिन दरवाज़ा बंद करने के बाद वह एक छोटी सी दरार से बाहर झाँकने लगा।उसकी नज़र हर्षदा पर थी।हर्षदा ने बिस्तर ठीक किया, अपने बाल संवारे और सामान्य तरीके से कमरे में घूमती रही।उसके व्यवहार में कुछ भी असामान्य नहीं था।रवि ने राहत की साँस ली।"शायद मैं बेवजह उस पर शक कर रहा हूँ..."इतना सोचकर उसने बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर दिया।उधर बाहर खड़ी हर्षदा ने धीरे से बाथरूम की ओर देखा।और उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान उभर आई।कुछ देर बाद दोनों बाहर जाने के लिए तैयार हो गए।जैसे ही वे दरवाज़े तक पहुँचे, रवि ने अपना मोबाइल निकाला और हर्षदा की तस्वीर लेने लगा।"रवि!" हर्षदा अचानक नाराज़ हो गई।"तुम जानते हो ना कि मुझे फोटो खिंचवाना पसंद नहीं है।""अरे, बस एक फोटो...""नहीं।"उसकी आवाज़ इस बार थोड़ी तेज़ थी।"हमारी शादी की भी कोई तस्वीर है क्या? मैंने तब भी मना किया था।"रवि चुप हो गया।"ठीक है, नहीं खींचता।"दोनों बाहर निकलने लगे।लेकिन तभी रवि को याद आया कि वह कार की चाबी भूल गया है।"तुम यहीं रुको, मैं अभी चाबी लेकर आता हूँ।"वह वापस फ्लैट में चला गया।हर्षदा बाहर खड़ी उसका इंतज़ार करने लगी।उसी समय दो आदमी एक बड़ा सा आईना उठाकर वहाँ आए।"माफ कीजिए मैडम," उनमें से एक बोला, "शिंदे जी का फ्लैट कौन-सा है?""ऊपर वाली मंज़िल पर।"हर्षदा उन्हें रास्ता बताने लगी।इधर रवि चाबी लेकर बाहर आया।उसकी नज़र उन लोगों पर पड़ी।फिर अचानक उसकी नज़र उस बड़े आईने पर गई।और अगले ही पल उसकी साँस रुक गई।आईने में हर्षदा का प्रतिबिंब दिखाई ही नहीं दे रहा था।उसकी जगह...एक भयानक बूढ़ी औरत दिखाई दे रही थी।सफ़ेद बाल...झुर्रियों से भरा चेहरा...सफ़ेद आँखें...और एक डरावनी मुस्कान।रवि के हाथ से लगभग चाबी गिर गई।उसके कानों में फिर वही आवाज़ गूँजने लगी—"वो आपका शिकार करेगी...""सावधान रहिए...""वो आपको नहीं छोड़ेगी..."रवि वहीं जड़ हो गया।"रवि!" हर्षदा ने आवाज़ दी।"क्या हुआ? चाबी मिल गई ना?"रवि जैसे किसी गहरे सदमे से बाहर आया।"ह... हाँ।"वह धीरे-धीरे उसके पास आया।लेकिन अब उसके मन में कोई संदेह नहीं बचा था।कुछ न कुछ बहुत बड़ा रहस्य जरूर था।दोनों नीचे पहुँचे।रवि का दिमाग तेज़ी से काम कर रहा था।अगर हर्षदा सचमुच इंसान नहीं थी, तो उसे इसका पक्का सबूत चाहिए था।"हर्षा, आज कार तुम चलाओ।""मैं?""हाँ।""नहीं, मेरा ड्राइविंग बहुत खराब है।""कोई बात नहीं, मैं साथ हूँ।"काफी कहने के बाद आखिरकार हर्षदा मान गई।वह ड्राइवर सीट पर बैठ गई।बैठते ही उसने रियर-व्यू मिरर इस तरह सेट किया कि उसमें सिर्फ उसका चेहरा दिखाई दे।यह देखकर रवि का शक और गहरा हो गया।"क्या वह आईने से बचना चाहती है?"उसने मन ही मन सोचा।कुछ देर बाद वे एक पेट्रोल पंप पर रुके।"तुम पेट्रोल भरवा लो," रवि बोला, "मैं वॉशरूम होकर आता हूँ।"लेकिन वह वॉशरूम नहीं गया।थोड़ी दूरी पर जाकर उसने मोबाइल निकाला।और चुपके से कार में बैठी हर्षदा की कुछ तस्वीरें खींच लीं।फिर उसने तस्वीरें खोलीं।और उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।तस्वीरों में हर्षदा नहीं थी।ड्राइवर सीट पर वही भयानक बूढ़ी औरत बैठी थी...सफ़ेद बाल...झुर्रियों से भरा चेहरा...सफ़ेद आँखें...और एक डरावनी मुस्कान...रवि की आँखों में आँसू भर आए।जिस स्त्री से उसने प्यार किया था...जिससे उसने शादी की थी...वह इंसान नहीं थी।वह एक चुड़ैल थी।रवि की आँखों में आँसू भर आए थे।जिस लड़की से उसने प्यार किया था...जिसके साथ उसने अपने जीवन के सपने देखे थे...वह इंसान नहीं थी।वह एक चुड़ैल थी।लेकिन उसने अपने चेहरे पर डर का कोई भाव नहीं आने दिया।वह वापस कार के पास पहुँचा और मुस्कुराते हुए हर्षदा के बगल में बैठ गया।पूरा दिन उसने सामान्य रहने का अभिनय किया।दोनों घूमे, खाना खाया, बातें कीं।लेकिन अंदर ही अंदर रवि कोई रास्ता सोच रहा था।उसे अपनी जान बचानी थी।रात को लगभग ग्यारह बजे दोनों वापस बिल्डिंग पहुँचे।रवि ने कार पार्किंग में लगा दी।हर्षदा उसके कंधे पर सिर रखते हुए बोली,"रवि, तुम जानते हो? तुम बहुत अच्छे पति हो।""अच्छा?""हाँ। जितना प्यार और सुख तुमने मुझे दिया है, उतना शायद कोई और कभी नहीं दे पाता।"यह कहते हुए वह उसके और करीब आ गई।वह उसे चूमने ही वाली थी कि अचानक...ठक!किसी ने कार की खिड़की पर दस्तक दी।दोनों चौंक गए।रवि ने खिड़की की ओर देखा।और उसका चेहरा पीला पड़ गया।बाहर वही औरत खड़ी थी।उसकी गोद में वही मृत बच्चा था।लेकिन इस बार कुछ अलग था।औरत के चेहरे पर डर नहीं था।बल्कि वह बेचैनी और चिंता से रवि को देख रही थी।उधर हर्षदा के चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।"चलो... जल्दी चलो!" रवि घबराकर बोला।दोनों कार से बाहर निकले और भागते हुए लिफ्ट की ओर दौड़े।पीछे से वह औरत चीख रही थी—"साहब! उसके साथ मत रहिए!""वही आपका बलि लेगी!""उससे दूर हो जाइए!"उसकी आवाज़ पूरे बेसमेंट में गूँज रही थी।रवि और हर्षदा लिफ्ट में घुस गए।दरवाज़ा बंद हो गया।लिफ्ट ऊपर जा रही थी।हर्षदा काँप रही थी।"रवि... हम यहाँ नहीं रहेंगे।""हाँ।""कल ही यह घर छोड़ देंगे।""हाँ।""यह जगह अभिशप्त है।"रवि ने उसकी ओर देखा।अगर वह सच जानती, तो शायद यह बात कभी नहीं कहती।लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।सिर्फ इतना बोला,"कल सुबह यहाँ से निकल जाएँगे।"रात किसी तरह बीत गई।लगभग दो बजे अचानक हर्षदा की आँख खुली।वह उठने लगी।लेकिन उठ नहीं पाई।उसके हाथ-पैर बँधे हुए थे।वह बिस्तर पर कसकर बंधी हुई थी।उसके सामने एक कुर्सी पर रवि बैठा था।उसके हाथ में एक बड़ा चाकू था।"र... रवि?"हर्षदा घबरा गई।"यह क्या है?""जाग गई?" रवि की आवाज़ बर्फ जैसी ठंडी थी।"मुझे खोलो!""ताकि तुम मुझे मार सको?"हर्षदा की आँखें फैल गईं।"तुम क्या कह रहे हो?""मैं सब जान चुका हूँ।"रवि ने मोबाइल निकाला।और एक-एक करके तस्वीरें उसके सामने रख दीं।पेट्रोल पंप वाली तस्वीर...आईने वाली तस्वीर...और कुछ दूसरी तस्वीरें...हर तस्वीर में हर्षदा की जगह वही डरावनी बूढ़ी औरत दिखाई दे रही थी।कुछ क्षणों तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा।फिर...अचानक...हर्षदा हँसने लगी।धीरे-धीरे...फिर ज़ोर-ज़ोर से...उसकी हँसी पूरे कमरे में गूँजने लगी।"तो आखिर तुम्हें सच पता चल ही गया..."उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी।वह भारी और भयानक हो चुकी थी।"हाँ... मैं इंसान नहीं हूँ।"उसकी आँखें चमक उठीं।"मैं एक चुड़ैल हूँ।"रवि की मुट्ठियाँ भींच गईं।हर्षदा मुस्कुराई।"मैं लोगों को अपने सौंदर्य के जाल में फँसाती हूँ।""उनसे प्यार का नाटक करती हूँ।""और फिर धीरे-धीरे उनका खून पीकर अपनी जवानी और सुंदरता बनाए रखती हूँ।"रवि को अब समझ आ गया था।उसके होंठों पर चोट क्यों लगती थी...उसकी पीठ और छाती पर दाँतों के निशान क्यों थे...सब कुछ साफ हो चुका था।"हर रात..." चुड़ैल हँसी,"मैं तुम्हारा थोड़ा-थोड़ा खून पीती रही।""लेकिन अब मैं थक चुकी थी।""जल्द ही तुम्हारा पूरा खून पीकर तुम्हें खत्म कर देती।"रवि के चेहरे पर गुस्सा उभर आया।"और वह औरत?"चुड़ैल का चेहरा अचानक विकृत हो गया।"उसने मेरा खेल बिगाड़ दिया।""उसने मुझे पहचान लिया था।""जब भी वह नीचे दिखाई देती थी, मैं उसे यहाँ से भगाने की कोशिश करती थी।""लेकिन वह नहीं गई।""और उसने तुम्हें चेतावनी दे दी।"रवि की आँखों में आग उतर आई।"अब तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है।"उसने हाथ में पकड़ा चाकू कसकर थाम लिया।और हर्षदा की ओर बढ़ा...रवि की आँखों में आग उतर आई थी।उसने चाकू को और कसकर पकड़ लिया।"अब तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है।"यह कहकर वह हर्षदा की ओर झपटा और पूरी ताकत से उसके सीने में चाकू घोंप दिया।लेकिन...कुछ भी नहीं हुआ।चाकू ऐसे भीतर गया मानो किसी इंसान के शरीर में नहीं, बल्कि किसी निर्जीव वस्तु में घुसा हो।हर्षदा ज़ोर से हँसने लगी।"तुम सच में सोचते हो कि मुझे इससे मार दोगे?"उसकी आँखें पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं।"मैं इंसान नहीं हूँ, रवि...""मैं चुड़ैल हूँ..."अगले ही पल उसने अपने हाथों में बंधी रस्सियों को जोर से खींचा।चर्रर्र...!मोटी रस्सियाँ ऐसे टूट गईं जैसे सूत का धागा हों।रवि पीछे हट गया।उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।हर्षदा धीरे-धीरे बिस्तर से उठी।उसका शरीर बदलने लगा।उसके सुंदर चेहरे की जगह झुर्रियों से भरा भयावह चेहरा दिखाई देने लगा।सफेद बाल बिखर गए।लाल रंग के लंबे नुकीले दाँत बाहर निकल आए।वह अब अपने असली रूप में थी।रवि भागने के लिए मुड़ा।लेकिन इससे पहले कि वह दरवाज़े तक पहुँचता, हर्षदा ने बिजली की गति से उसका गला पकड़ लिया।उसने रवि को हवा में उठा लिया।और पूरी ताकत से उसका सिर बिस्तर के लोहे के कोने पर दे मारा।धड़ाम!रवि के सिर से खून बहने लगा।उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।हर्षदा के चेहरे पर पागलपन भरी मुस्कान फैल गई।उसने अपनी लंबी जीभ बाहर निकाली।और रवि के सिर से बहते खून को चाटने लगी।"गरम खून...""ताज़ा खून..."वह किसी पिशाच की तरह बड़बड़ा रही थी।कुछ ही क्षणों में रवि की चेतना खत्म होने लगी।उसके हाथ से चाकू गिर गया।हर्षदा ने वह चाकू उठाया।फिर बहुत प्यार से उसकी गर्दन पर फेरने लगी।मानो कोई प्रेमिका अपने प्रेमी को सहला रही हो।और अगले ही पल...उसने उसकी गर्दन काट दी।खून की तेज धार निकल पड़ी।हर्षदा झुक गई।और पागलों की तरह उसका खून पीने लगी।कमरे में सिर्फ उसकी भयानक हँसी गूँज रही थी।कुछ देर बाद...रवि की निश्चल लाश बिस्तर पर पड़ी थी।उसकी आँखें खुली थीं।मानो मरते समय भी उसे यकीन नहीं हुआ था कि उसकी पत्नी ही उसकी मौत बनेगी।हर्षदा ने अपने चेहरे पर लगा खून पोंछा।फिर आईने में खुद को देखा।उसका चेहरा फिर से जवान और सुंदर हो चुका था।उसने संतोष से मुस्कुराते हुए अपने बाल ठीक किए।और फ्लैट से बाहर निकल गई।शायद...अपने अगले शिकार की तलाश में...कुछ साल बाद...मुंबई में एक भव्य इवेंट चल रहा था।चारों ओर रोशनी, संगीत और लोगों की भीड़ थी।एक हैंडसम युवक एक खूबसूरत युवती के पास आया।"हैलो ब्यूटीफुल..."उसने मुस्कुराकर कहा।"मेरा नाम किरण है। इस कार्यक्रम को मैंने स्पॉन्सर किया है।"युवती ने उसकी ओर देखा।उसके होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान उभर आई।"हैलो हैंडसम..."वह मधुर स्वर में बोली।"मैं हर्षदा हूँ..."किरण उसकी खूबसूरती में खो गया।उसे क्या पता था...कि उसके सामने खड़ी लड़की इंसान नहीं...बल्कि सदियों से जिंदा एक खूँखार चुड़ैल थी।और शायद...उसका अगला शिकार भी तय हो चुका था।