Bappa Rawal in Hindi Biography by Vihan books and stories PDF | बप्पा रावल

The Author
Featured Books
  • Wisps of Smoke - 38

    Wisps of Smoke (A love, romantic, psychological and paranorm...

  • NAVORA

    NAVORAPrologue — A Flower That Became a DreamSometimes, a bu...

  • The Story of Navaratri

    Navaratri is a nine-day Hindi festival celebrated throughout...

  • Specialz

    "Here you go- master" Yomi sets the cup of tea on the paper...

  • Price Tag on Passion

    The rain lashed against the French windows of Mayur’s pentho...

Categories
Share

बप्पा रावल

बाप्पा रावल (728-758 ईसवी)

पिता नागादित्य एवं माता कमलावती के पुत्र बाप्पा, गुहिलोत वंश के वंशज थे। उनका जन्मनाम कालभोज था। प्रजा के संरक्षक व राष्ट्र के रक्षक होने के नाते मेवाड़ के लोगों ने उन्हें प्रेम से ‘बाप्पा’ अर्थात् पिता की उपाधि दी। जो कालांतर में उनका नाम ही बन गई।

गुहिलोत वंश, श्रीराम के पुत्र लव के वंशजों में से आता है और कालांतर में यह गुहिलोत वंश ही शक्तिशाली सिसोदिया वंश बना, जो 1,400 वर्षों से मेवाड़ पर राज कर रहा है एवं आज भी उदयपुर के राजा इसी महिमाशाली वंश से हैं।

बाप्पा का बाल्यकाल कष्टदायी एवं सुखों से वंचित रहा था। उनकी माता उन्हें मेवाड़ के भींडर स्थित वन में ले आई थीं, जहाँ उनकी रक्षा भीलों एवं यदुवंशियों ने की। भीलों के राजा मांडलीक ने बाप्पा को प्रश्रय दिया। मेवाड़ के राजवंश के साथ भीलों का घनिष्ठ संबंध यहीं से आरम्भ होता है, और यह संबंध गत 1,400 वर्षों से आज भी यथावत् है।

कथानुसार, इन्हीं जंगलों में बाप्पा, शैव साधु हरित ऋषि से मिले, जिन्होंने उन्हें शिव तंत्र की विधियों, राजा के नैतिक मूल्यों व हिंदू धर्म के मौलिक सिद्धांतों की शिक्षा दी।

इस प्रकार उन महर्षि ने बाप्पा के लिए चित्तौड़ पर विजय प्राप्त कर, इस्लाम के विरुद्ध हिंदू शक्ति की वृद्धि एवं मेवाड़ पर राजपूतों के अधिकार का पथ प्रशस्त किया।

जैसे कि पुरातन पुरुषों की कथाओं में होता है, बाप्पा का इतिहास भी कई आश्चर्यजनक चमत्कारों से परिपूर्ण है जो हमारे अन्वेषण का विषय नहीं हैं।

बाप्पा को हरित ऋषि के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण करते हुए भगवान् शिव के ही एक रूप, भगवान् एकलिंग जी में अटूट आस्था हो गई थी। आज तक मेवाड़ राजवंश के कुलदेवता के रूप में एकलिंग जी ही स्थापित हैं।

बाप्पा को माता भवानी भी स्वप्न में दर्शन देती थीं। माँ ने ही बाप्पा को आशीर्वाद दिया एवं चित्तौड़ के मोरी वंश की सेवा करने का आदेश दिया। चित्तौड़ का मोरी वंश उस समय के भारत में सत्ता का एक शक्तिशाली केंद्र था। जब बाप्पा चित्तौड़ पहुँचे तो उस समय चित्तौड़ के मोरी शासक, मानमोरी ने बाप्पा का स्वागत किया एवं उन्हें अपना सामंत बनाकर जागीर प्रदान की। यही वह समय था, जब इस्लाम की भुजाओं ने सिंधु नदी पार कर भारतवर्ष में प्रथम बार प्रवेश किया।

केवल सत्रह वर्ष की आयु में अरब खलीफा के दूत मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध के राजा दाहिर सेन एवं उनके शौर्यवान भाइयों पर आक्रमण किया। कासिम द्वारा किए गए आक्रमणों को दाहिर सेन ने कई बार प्रबल प्रत्युत्तर देकर पराजित किया। किंतु सिंध में बसे बौद्धों ने दाहिर सेन का साथ छोड़कर कासिम का साथ दिया। नेरम के बौद्ध नगर प्रमुख भंडारकर समानी ने कासिम को मार्गदर्शन के अतिरिक्त रसद सामग्री भी दी। बौद्धों के अतिरिक्त एक उपद्रवी 'मेड़' जाति ने भी कासिम से हाथ मिला लिया। उन्होंने ही कासिम को दाहिर के सुरक्षा-चक्र में प्रवेश करवाया, जिससे अरोर के युद्ध में दाहिर की पराजय हुई। यह एक भयंकर युद्ध था, जिसमें दाहिर व उनका सारा परिवार वीरगति को प्राप्त हुआ।

कासिम ने दाहिर और उनके भाइयों का मस्तक काटकर बसरा में अपने खलीफा हज्जाज को भिजवा दिया तथा दाहिर की पुत्रियों का हरण कर उन्हें अपने साथ अरब के दुष्ट खलीफा हज्जाज बिन यूसुफ को यौन-दासियों के रूप में भेंट करने हेतु ले गया। यह मनोवैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय होना चाहिए कि किस प्रकार की धार्मिक शिक्षा ने एक सत्रह वर्ष के बच्चे को इतना क्रूर व हिंसक बनाया।

कासिम के पास अब सिंध से लूटा हुआ धन था। उसने भाड़े के योद्धाओं को एकत्र किया तथा यह सेना लेकर वह पूर्व में मेवाड़ की ओर बढ़ा। जेम्स टॉड का मत है कि दाहिर सेन का पुत्र सिंध से पलायन कर गया एवं बाप्पा की शरण में चित्तौड़ पहुँचकर उसने बाप्पा को सिंध की पराजय एवं अपनी बहनों के यौन दासी बनाने हेतु अपहृत होने के विषय में बताया।

हिंदू जनजीवन एवं सैनिकों के मध्य भी कभी यौन दासता की बात सुनने में नहीं आई थी। हिंदू राजा केवल सत्ता एवं राज्य के विस्तार हेतु युद्ध करते थे। सेनाओं के आपसी संघर्ष हेतु कुछ नैतिक नियम होते थे एवं इन नियमों का उल्लंघन करने का कोई विचार तक नहीं करता था।

दोनों ओर के हिंदू राजाओं की सेनाएँ आपस में युद्ध करती थीं एवं जो युद्ध में विजयी होता था, वह पराजित राजा का राज्य अपने अधिकार में ले लेता था। या तो पराजित राजा को ही वहाँ का जागीरदार बना दिया जाता था अथवा उसे राज्य से निष्कासित कर दिया जाता था। किंतु आमजन, कृषक, व्यापारी वर्ग अथवा कलाकारों को कष्ट नहीं दिया जाता था तथा जनजीवन सामान्य रूप से चलता रहता था। केवल राजाओं में ही सत्ता का हस्तांतरण होता था।

हिंदू परंपराओं के आधार पर राजवंश एवं आमजन की महिलाओं का हरण व बलात्कार करने अथवा उन पर अधिकार करने का तो कोई विचार तक नहीं कर सकता था। इस्लामी अतिवादियों ने महिलाओं पर यौन अत्याचार, उनके अपहरण व अपमान की परिपाटी को हमारी महान वैदिक भूमि पर सर्वप्रथम आरंभ किया एवं उन्होंने ही अरबी सभ्यता में प्रचलित, स्त्रियों के साथ अभद्र व्यवहार की विचारधारा से हमारी महान सभ्यता में वैचारिक प्रदूषण का बीज डाला।

बाप्पा ने जब कासिम द्वारा महिलाओं पर इस प्रकार के अत्याचार के विषय में सुना तो वे क्रोधित हो गए, किंतु वे यह समझ गए थे कि हिंदुओं को इन बाह्य शक्तियों से संघर्ष करने हेतु हिंदू संगठन की आवश्यकता पड़ेगी। बाप्पा ने इस लंबे संघर्ष हेतु स्वयं को तैयार कर लिया, क्योंकि उन्हें समझ आ चुका था कि अरब म्लेच्छ, हिंदुओं की धर्म धरा पर बार-बार आक्रमण करेंगे और इन्हें पराजित कर अपनी धरती को बचाने हेतु सतत संघर्ष करना होगा।

बाप्पा ने मेवाड़ की सेना का नेतृत्व करते हुए गुर्जर प्रतिहार वंश के नागभट्ट के साथ मित्रता की, जो उस समय मालवा क्षेत्र, यानी आज के मध्य प्रदेश पर शासन करते थे। बाप्पा ने गुजरात के जय भट्ट के साथ भी मित्रता की एवं इन सब ने मिलकर हिंदू सेना का एक संगठन बनाया। नागभट्ट ने दक्षिण भारत के चालुक्य सम्राट् जयसिम्हा वर्मन से भी सहायता माँगी, जिन्होंने अपने पुत्र पुलकेसी राजा को हिंदू सेना के लिए भेजा।

कासिम के अरब लौट जाने के बाद, जुन्नैद अल मरीं नाम का एक अरब हत्यारा, भारत की पश्चिमी सीमा पर निरंतर आक्रमण कर रहा था तथा दक्षिणी राजस्थान, मालवा व गुजरात में सफल भी हो रहा था।

वर्तमान के मारवाड़ में मंडोवर के निकट बाप्पा रावल के नेतृत्व में हिंदू सेना के 5-6,000 सैनिकों का 60,000 अरबों के साथ एक भयानक युद्ध हुआ। इस युद्ध में हिंदू सेना ने अपने से बड़ी और क्रूर सेना को निर्णायक तौर पर पराजित किया। जुन्नैद का वध कर दिया गया तथा अरब सेना का पूर्ण सर्वनाश कर दिया गया। अरब के उमैय्यद वंश के विरुद्ध हिंदुओं की यह विजय, एक स्पष्ट संदेश था कि वे भारत की पुण्यभूमि की ओर नहीं लौटें।

जो अरब कुछ ही वर्षों में मध्य-पूर्व एशिया, ईरान, मैसोपोटैमिया, सूर्या, उत्तरी अफ्रीका, यहाँ तक कि पूर्वी यूरोप में पहुँच गए, उन्हें सर्वप्रथम पराजय का स्वाद बाप्पा रावल के हिंदू संगठन ने चखाया।

यह भारतवर्ष या हिंदुओं के इतिहास ही नहीं, बल्कि समूची मानव जाति के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण घटना थी। यदि अरब मुसलमान, भारत की संपदा व जनसंख्या को जीत लेते तो इस्लाम का भौतिक व आर्थिक सशक्तीकरण एक ऐसे स्तर पर हो जाता, जिसे पराजित करना विश्व की किसी सेना के लिए असंभव होता।

वैसे तो किसी राष्ट्र का कोई पिता हो नहीं सकता, क्योंकि राष्ट्र, व्यक्तियों से कहीं अधिक विराट व उच्च इकाई है, परंतु यदि इस देश को किसी को राष्ट्रपिता की उपाधि देनी ही है तो वे केवल बाप्पा रावल हो सकते हैं।

बाप्पा नहीं होते तो भारत इस्लामी खिलाफत का अवयव बन गया होता। न कोई वैदिक धर्म बचता ना सनातन संस्कृति। इस्लामी मतांधता के अंधकार ने समूचे विश्व को ही लील लिया होता।

साथ ही हिंदुओं को ऋणी होना होगा गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट व दक्षिण भारत के जयसिम्हा वर्मन का, जिन्होंने आज से 1300 वर्ष पूर्व इस्लामी खतरे का पूर्वानुमान कर, एक-दूसरे पर पूर्ण विश्वास कर, एक सशक्त हिंदू संघ खड़ा किया।

यदि हमारे ये विलक्षण पूर्वज उस काल में, इतने सीमित साधनों के उपरांत भी अरब हत्यारों को पराजित कर सकते थे, तो आज हिंदू समाज किस जड़ता और संशय में घिरा है?

हम केवल तभी बाप्पा के सच्चे उत्तराधिकारी कहलाने योग्य होंगे, जब बाप्पा तथा उनके सहयोगी राजाओं के समान, हम हिंदू मिलकर इस्लामी साम्राज्यवाद का प्रतिकार करें।

बाप्पा द्वारा अपने साथियों को गोपनीयता एवं निष्ठा की शपथ दिलाने का तरीका आज भी मेवाड़ी भाषा में सुरक्षित है।

एक गड्‌ढा खोदकर, अपने हाथ में एक कंकड़ लेकर वे हुंकार भरते थे, “मेरे साथ गोपनीयता एवं निष्ठा बनाए रखने की शपथ लो; कि जो कुछ तुम सुनोगे, वह मुझे बताओगे और यदि ऐसा नहीं किया, तो तुम्हारे पूर्वजों के सभी पुण्य, इस कंकड़ के समान (कंकड़ को गड्ढे में फेंकते हुए) कुएँ में गिर जाएँगे।” और इस तरह उनके साथी निष्ठा की शपथ लेते थे।

अरब आक्रांताओं को बाप्पा एवं उनके साथियों ने समाप्त कर दिया था, बचे-खुचे भागते हुए अरबों का सौराष्ट्र से गुजरात और सिंध तक पीछा किया। अरब इतिहासकार स्वयं लिखते हैं, “हमें हिंदुओं के क्रोध से सर छिपाने की कोई जगह नहीं मिली।

बाप्पा यहीं शांत नहीं हुए, उन्होंने अरबों को खदेड़ते हुए ईरान तक उनका पीछा किया। बाप्पा ने अफगानिस्तान स्थित गजनी शहर पर धावा बोला, जो उस समय कासिम द्वारा स्थापित सलीम नाम के एक जागीरदार के संरक्षण में था।

उन्होंने सलीम को पराजित कर गजनी पर अधिकार कर लिया एवं उसकी पुत्री से विवाह भी कर लिया। उन्होंने अपने भतीजे को गजनी का संरक्षक बना दिया, ताकि अफगानिस्तान आने वाली कई शताब्दियों तक हिंदू राज्य बना रहे। उन्होंने अरब से लौटते समय, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर हिंदू चौकियाँ स्थापित कीं, ताकि इस्लामी सेनाओं द्वारा भविष्य में होने वाले आक्रमणों को वहीं रोका जा सके। बाप्पा और शेष हिंदू राजाओं की दूरदर्शिता के चलते अगले पाँच सौ वर्षों तक भारतवर्ष अरब इस्लामी आक्रांतों को लगातार पराजित करने में सफल रहा।

उधर, राजा दाहिर के हत्यारे, मोहम्मद बिन कासिम को उसके पापों का फल शीघ्र ही बगदाद में मिल गया।

‘चाचनामा’ में कासिम की मृत्यु, राजा दाहिर की पुत्रियों के कारण होने का उल्लेख इस प्रकार मिलता है—

‘दाहिर की दो पुत्रियों, सूर्या देवी व परिमला देवी को कासिम अपने खलीफा, हज्जाज के पास भोग-दासी बनाकर लाया। दोनों कन्याओं ने कासिम से प्रतिशोध लेने के लिए हज्जाज को असत्य बात कही कि कासिम पहले ही उनका शारीरिक भोग कर चुका है। कासिम को काम वासना से अंधे खलीफा ने एक बैल की खाल में सिलवाकर सीरिया देश भेज दिया। 18 जुलाई, 715 ईसवी को, तिल-तिल कर दम घुटने से कासिम की मृत्यु हो गई। दाहिर की कन्याओं ने अपने पिता के हत्यारे के भयानक अंत पर हँसते हुए हज्जाज को सत्य बता दिया। हज्जाज बहुत पछताया और खीज में दोनों हिंदू ललनाओं को उसने दीवार में जीवित चुनवा दिया।’

यदि दो असहाय बच्चियाँ अपने विवेक से अपने पिता की हत्या का प्रतिकार ले सकती थीं, तो क्या आज के पूरे हिंदू समाज, विशेषकर हिंदू स्त्रियों को शोभा देता है कि अपने पुरखों व परिजनों के हत्यारों के सम्मुख अहिंसा व सहअस्तित्व की व्यर्थ बकवास करें ?

जो हमारे परिजनों को हानि पहुँचाए, जो हमारी बहन-बेटियों के बलात्कार को अपना कर्तव्य समझे, उसका वध न्यायसंगत व धर्मसंगत है।

यही शाश्वत सत्य है। यही उचित है। यही धर्म है।

राक्षसों के समूह से घिरी, अपने घर से हजारों मील दूर, उन कोमल राजकुमारियों ने कैसे अपने विवेक को सँभाला होगा, कैसे योजना बनाई होगी, कैसे हज्जाज को कासिम के विरुद्ध भड़काया होगा, यदि हम विचार करें तो उन प्रज्ञावान ललनाओं के प्रति हृदय सम्मान से भर जाएगा।

राजा दाहिर की पुत्रियों का अमर बलिदान हिंदू इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए।

बाप्पा के अरब अभियान ने उन्हें चमत्कारी योद्धा के रूप में स्थापित कर दिया तथा इसके पश्चात् उन्होंने 726 ईसवी में स्वयं को मेवाड़ का स्वामी घोषित कर मोरी वंश से चित्तौड़ की सत्ता अपने हाथ में ले ली। यह स्पष्ट नहीं है की बाप्पा ने राजा मानमोरी की हत्या की या केवल उन्हें अपदस्थ किया? किंतु वहीं से आज के मेवाड़ के राजवंश की स्थापना हुई। चित्तौड़ में उपलब्ध इतिहास के अनुसार, “बाप्पा ने स्वयं मोरी वंश से चित्तौड़ लेकर स्वयं को इस धरा का सिरमौर बना लिया था।” 'अमरकाव्यम' में बाप्पा द्वारा मानमोरी राजा के वध का उल्लेख है।

किंवदंति है कि बाप्पा को 'रावल' की उपाधि स्थानीय भीलों ने दी, जो उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर अरबों से लड़े थे। राज्यातिपूर्णत्व, वरत्व और लक्ष्मीयत्व, इन तीन शब्दों के आरंभिक अक्षरों से 'रावल' शब्द बना है।

बाप्पा को ‘हिंदुओं का सूर्य’ भी कहा गया है और उन्हें ‘राजगुरु’ की उपाधि भी प्राप्त है। ये उपाधियाँ आज भी मेवाड़ के राजपरिवार को अलंकृत करती हैं। लाहौर एवं पेशावर के हिंदू राजाओं पर भी बाप्पा के इस अभियान का सकारात्मक प्रभाव पड़ा 761 ईसवी में पेशावर एवं किरमान के अफगान, जो मिस्र के ही कॉप्टिक उपनिवेशी थे, ने सिंधु नदी पार कर लाहौर के हिंदू राजा पर आक्रमण किया। केवल पाँच ही महीनों में सत्तर युद्ध लड़े गए, जिनके विभिन्न परिणाम निकले। अंतिम युद्ध में लाहौर के हिंदू राजकुमार अपने शस्त्र लेकर पेशावर गए। वहाँ पर एक संधि हुई। यह संधि आपसी लाभ के लिए की गई। सिंधु नदी के पश्चिम में बसा कोहिस्तान का पूरा क्षेत्र उन्हें दे दिया गया, किंतु इसमें शर्त यह थी कि पश्चिम से होने वाले आक्रमणों का प्रत्युत्तर सबसे पहले इन्हीं लोगों को देना होगा।

राजपूतों ने कोह-ए-दामाँ के निकट खैबर में अपना दुर्ग स्थापित किया। इसके पश्चात् दो शताब्दियों तक, आज के सिंध एवं पंजाब के ऊपरी क्षेत्र में शांति बनी रही। दक्षिणी सिंध ही हिंदुस्तान में आने का एकमात्र मार्ग बचा था, जिससे भारत पर इस्लामी आक्रांताओं के आक्रमण की संभावनाओं पर रोक लगाई जा सकी।

इस प्रकार बाप्पा ने अपनी आने वाली पीढ़ियों के समय में होने वाले इस्लामी आक्रमणों के विरुद्ध हिंदू विरोध की आधारशिला रख दी एवं इस्लामी आक्रांताओं के साथ संधि नहीं करने का नियम बना दिया, जिसे उनके वंशजों ने भी निभाया।

इसके साथ ही इस्लामी साम्राज्यवादियों की योजनाओं के विरोध का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बाप्पा रावल ने अरब धार्मिक विस्तारवाद के कपटी स्वभाव को पहचाना एवं हिंदू राज्यों के साथ मित्रता कर न केवल अरबों को पराजित किया, वरन् एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना की, जिससे कि अरब हमलावर, हिंदुओं को अगली पाँच शताब्दियों तक पराजित नहीं कर पाए। अफगानिस्तान एवं ईरान तक बाप्पा की पहुँच एवं स्थानीय रजवाड़ों से विवाह संबंध स्थापित करने से इन क्षेत्रों में शताब्दियों तक हिंदू धर्म के बने रहने के पथ को प्रशस्त किया।

बाप्पा की विजय-यात्रा के प्रभाव का मूल्यांकन इस बात से किया जा सकता है कि अरब एवं तुर्कों द्वारा चौदह सौ वर्षों तक निरंतर आक्रमण करते रहने के पश्चात् आज भी पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में हिंदू निवास कर रहे हैं। यद्यपि वे अब संख्या में बहुत कम हो चुके हैं, किंतु इस्लामी आक्रांताओं द्वारा हिंदुत्व की अग्नि को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सका, क्योंकि बाप्पा जैसे महान योद्धाओं के सैन्य अभियानों द्वारा उनके मन में जो आत्मविश्वास एवं निष्ठा की भावना स्थापित की गई थी, वह उन्हें पराजित होने ही नहीं देती। पाकिस्तान में इतनी शताब्दियों के उत्पीड़न के उपरांत भी लगभग एक करोड़ हिंदू आज भी बसते हैं।

राजस्थान की पश्चिमी सीमाओं के पार बाप्पा रावल की पहुँच का सबसे बड़ा उदाहरण है कि आज भी पाकिस्तान के इस्लामी गणतंत्र की राजधानी इस्लामाबाद एवं रावलपिंडी हैं। हिंदुओं के विरुद्ध खुली घृणा का भाव रखने वाले पाकिस्तान ने भी अपने प्रमुख नगर का नाम एक ऐसे हिंदू राजा के नाम पर रखा है, जिसने अरबों को बुरी तरह पराजित कर हिंदू धर्म की पताका को उनकी छाती में गाड़ दिया था। अरबों के विरुद्ध उनकी विजय यात्रा के कुशल क्रियान्वयन को ध्यान में रखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारतीय उपमहाद्वीप में यदि वैदिक हिंदू सभ्यता आज भी जीवित है तो वह केवल बाप्पा रावल जैसे महावीरों के कारण।

कर्नल टॉड के अनुसार, सिंध के पश्चिम में अपने सैनिक अभियानों के समय, बाप्पा ने दर्जनों छोटे-मोटे राजाओं को पराजित कर उनकी पुत्रियों से विवाह किया। इस भूभाग में इन स्त्रियों से उनके 130 पुत्र हुए, जो वर्तमान में 'नौशेरा पठान' कहलाते हैं। बाप्पा के मेवाड़ लौट आने के कारण, इन पठानों को उनकी माताओं के वंश के नाम से जाना जाता है।

इतिहासकार डॉ. रामगोपाल मिश्रा ने आठवीं शताब्दी से लेकर 1206 ईसवी तक, प्रारंभिक मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध हिंदुओं के संघर्ष पर एक पुस्तक लिखी है, जिसमें उन्होंने भारतीय इतिहास के इस विस्मृत काल के विषय में विस्तृत शोध कर उसे प्रकाशित किया है। स्वयं डॉ. मिश्रा के अनुसार, यद्यपि उन्होंने अपनी पुस्तक इस्लामी स्रोतों के आधार पर लिखी है, पर वे अपनी पुस्तक में हिंदू प्रशस्तियों का वर्णन भी करते हैं।

यद्यपि हमारा अन्वेषण केवल मेवाड़ के महाराणाओं के जीवन-चरित्र एवं कार्यों पर ही केंद्रित है, किंतु प्रारंभिक अरब मुस्लिम आक्रमणों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले हिंदू राजाओं का उल्लेख यहाँ करना आवश्यक है।

गुर्जर-प्रतिहार राजा नागभट्ट, 725 ईसवी तक अवंती, मालवा पर राज करने वाले पराक्रमी राजा एवं इस वंश के संस्थापक थे।

ग्वालियर में प्राप्त एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि उन्होंने अपने क्षेत्र पर आक्रमण करने वाले एक इस्लामी शासक को बुरी तरह पराजित किया था।

अरब इतिहासकारों ने गुर्जर प्रतिहार राजाओं को 'जुर्ज के राजा' कहा है। ऐसे ही एक राजा के विषय में अरबों ने लिखा है, “भारत के राजाओं में मुहम्मद में आस्था रखने वालों के लिए उससे बड़ा शत्रु और कोई नहीं है।”

ललितादित्य मुक्तापीड़ (725 से 760 ईसवी) भी बाप्पा के समकालीन एक महत्त्वपूर्ण राजा थे। उन्होंने मध्य भारत के यशोवर्मन से मित्रता की थी। ललितादित्य अरबों का संहार करने में एकदम निर्दयी थे। इस्लामी योद्धाओं के मानमर्दन के लिए उन्होंने मुसलमान सेना के सिर के आधे केश मुँड़वाने की परिपाटी चलाई थी। पंजाब व मुलतान के शाहिया वंश ने भी अरबों को खदेड़ा।

इसी प्रकार बाद में हुए अरब आक्रमणों का सिंध के जाटों ने बुरी तरह दमन किया तथा मुलतान में प्रतिहारों ने भी कुछ ऐसा ही किया।

जिस मोहम्मद गोरी ने 1192 ईसवी में महाराज पृथ्वीराज चौहान की हत्या की, उसे चालुक्य राजा, मूलराजा ने 1178 ईसवी में बुरी तरह पराजित करके गुजरात से भगाया था।

जिन अरब साम्राज्यवादी लुटेरों ने फारस, मेसोपोटामिया एवं मिस्त्र को एक दशक में ध्वस्त कर दिया, उनकी जनता को धर्म परिवर्तन करने पर बाध्य कर उस स्थान को ईरान एवं इराक बना दिया। बाप्पा तथा उनके हिंदू संगठन ने न केवल उन लुटेरों को रोका, वरन् उनकी सीमाओं तक उनका पीछा करके उन्हें खदेड़ा। बाप्पा के बाद कोई अन्य हिंदू राजा मुसलमानों पर इतना व्यापक प्रभाव नहीं डाल पाया।

अरब आक्रमण के विरुद्ध भारत भर में हिंदू विरोध का जो ज्वार उठा, उसके परिणामस्वरूप अरब साम्राज्यवादियों को निराशाजनक पराजय का सामना करना पड़ा। अरब इतिहासकार अल बालाधुरी ने लिखा है– “कस्बाह के निवासियों को छोड़, भारत के लोग पुनः मूर्तिपूजा की ओर लौट गए। हमें कहीं सर छुपाने की जगह नहीं मिली। केवल झील के पश्चिमी किनारे पर मुसलमान जागीरदार द्वारा बनवाया गया एक ऐसा स्थान, जो अल हिंद की सीमाओं से लगा था, हमारा ठिकाना बना।”

बालाधुरी का यह कथन ही स्पष्ट कर देता है कि बाप्पा रावल समेत हमारे दर्जनों राजाओं ने पाँच सौ वर्षों तक इस्लामी लुटेरों को भारत में घुसने नहीं दिया।

इन बर्बर साम्राज्यवादियों को पराजित करने एवं भारत में हिंदू धर्म का दीपक प्रज्वलित रखने का महान कार्य दूरद्रष्टा महाराव बाप्पा रावल एवं उनके हिंदू संगठन के साहस एवं शौर्य के कारण ही हो पाया।

यदि बाप्पा रावल इस कार्य को चौदह सौ वर्षों पहले कर सकते थे तो आज इतने सक्षम होने के पश्चात् भी हमें अपने धर्म के लिए युद्ध करने से कौन रोक रहा है ?

यह ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर प्रत्येक हिंदू को अपने अंदर ढूँढ़ना चाहिए।

लगभग चालीस वर्षों तक चित्तौड़ से मेवाड़ पर राज करने के पश्चात् बाप्पा रावल अपने अंतर्मन की पुकार को सुनते हुए राज्य अपने उत्तराधिकारी को सौंपकर शिव आराधना में लीन हो गए।

जगत् प्रसिद्ध एकलिंगजी मंदिर के निकट के वनों में सौ वर्ष की आयु तक तप करते हुए वे परमगति को प्राप्त हुए।

अगले पाँच सौ वर्षों तक विभिन्न राजाओं ने बाप्पा रावल के उत्तराधिकारियों के रूप में मेवाड़ की सेवा की, जिनमें से शक्ति कुमार, खुमाण प्रथम, खुमाण द्वितीय, खुमाण तृतीय, समर सिंह, जैत्र सिंह जैसे योद्धाओं ने मेवाड़ राज्य के विस्तार को जारी रखा।

मेवाड़ में स्थित कैलाशपुरी के निकट एक अज्ञात साधक के रूप में बाप्पा ने अपना शेष जीवन व्यतीत किया एवं मोक्ष को प्राप्त हुए। आज भी वहाँ एक शिव मंदिर है एवं बाप्पा रावल की एक विशाल मूर्ति लगी है, जिसे 'बाप्पा की समाधि' माना जाता है।

दुर्भाग्यवश, आठवीं शताब्दी के इन महान हिंदू राजा का नाम हमारे मानस, हमारे इतिहास व हमारे सार्वजनिक जीवन से ही मिटा दिया गया। यह अत्यधिक दुःख व रहस्यपूर्ण विषय है कि न केवल बाप्पा रावल, बल्कि अरबों के विरुद्ध समूचे हिंदू विरोध को ही गौण कर उसे मिटाने का कुत्सित प्रयास इस देश के वामपंथी व इस्लामिक इतिहासकारों ने किया। एक युग प्रवर्तक घटना को यूँ पोंछ दिया जाना, हिंदू विचारकों व हिंदू नेतृत्व की बौद्धिक जड़ता भी सिद्ध करता है। वामी-जिहादियों ने तो अपनी निष्ठा के प्रति समर्पित हो, अपने खेल खेले। हमें क्या हुआ था ? हिंदू समाज व नेतृत्व की बौद्धिक क्षमता या धर्म के प्रति निष्ठा इतनी निर्बल व निष्क्रिय क्यों रही? जिन देवपुरुषों के कारण हम अपनी भूमि व धर्म बचा पाए, उनका नाम तक हम विस्मृत किए बैठे हैं!

इतिहासविद श्री सी वी वैद्य ने अपनी पुस्तक 'मध्यकालीन हिंदू इतिहास' में बाप्पा की तुलना फ्रान्स के योद्धा चार्ल्स मर्टेल से की है। बाप्पा की ही भाँति मर्टेल भी अति साधारण पृष्ठभूमि से उठ कर पैरिस को जीतते हैं। बाप्पा की अरबों पर विजय की ही भाँति मर्टेल, उमैयद वंश के अब्द अल रहमान अल ग़फ़िकी को पराजित करते हैं । मर्टेल का पुत्र पैपिन फिर फ्रान्स का राज्य पाता है। किंतु जहां बाप्पा का वंश आज भी मेवाड़ को सुशोभित कर रहा है, मर्टेल का वंश कुछ पीढ़ियों के बाद समाप्त हो गया। (वैद्य-पृष्ठ 73-74)

अरबों की हिंसक मतांधता से विश्व के जो भूभाग संक्रमित हुए उनकी आज की दुर्दशा चीख-चीखकर हमें एक ही संदेश दे रही है। यदि बाप्पा रावल सरीखे महापुरुषों ने अरबों को पराजित नहीं किया होता, तो आज हमारे पास भी ना कोई राष्ट्र होता, ना समाज, ना धर्म।

पाँच सौ वर्षों तक निरंतर अरब इस्लाम को सिंधु नदी पर ही रोककर हमारे विलक्षण पुरखों ने ना केवल हिंदू धर्म व भारतवर्ष की, वरन् समूचे स्वतंत्र समाज व वैश्विक चेतना की भी रक्षा की थी।

अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम बाप्पा के नाम, जीवन एवं कार्यों को पुनः स्मरण करें तथा हिंदुत्व के इस महान सपूत को अपनी स्मृति में अमर कर लें, जिन्होंने इस्लामी साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक हजार वर्षों तक चले संघर्ष की अटल आधारशिला रखी।