Raat ka Sannata - 2 in Hindi Horror Stories by Sandhya Devi books and stories PDF | रात का सन्नाटा - 2

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रात का सन्नाटा - 2

रात के लगभग ग्यारह बजे थे। गाँव के बाहर बने बड़े से मैरिज गार्डन में शादी का शोर अब धीरे-धीरे कम होने लगा था। रोशनी से जगमगाता मैदान, तेज़ संगीत और लोगों की भीड़ अब खत्म होने की ओर बढ़ रही थी।
चार दोस्त—अमन, रोहित, विकास और सोनू—भी खाना खाकर घर लौटने की तैयारी कर रहे थे।
"यार, आज तो खाने का मज़ा ही आ गया!" रोहित ने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा।
"खासकर वो गुलाब जामुन..." सोनू हँसते हुए बोला।
अमन की नज़र अभी भी मिठाई वाले स्टॉल पर थी। वहाँ बड़े से बर्तन में गुलाब जामुन बचे हुए थे।
उसने इधर-उधर देखा। कोई ध्यान नहीं दे रहा था।
"रुको, मैं अभी आया।"
"अब क्या हुआ?" विकास ने पूछा।
लेकिन अमन बिना जवाब दिए मिठाई वाले स्टॉल की तरफ़ बढ़ गया।
कुछ मिनट बाद वह वापस लौटा। उसके हाथ में एक काली पॉलिथीन थी।
"क्या है इसमें?" रोहित ने पूछा।
अमन मुस्कुराया।
"गुलाब जामुन।"
"पागल है क्या? शादी से मिठाई चुराकर लाया है?"
"चुराकर नहीं, बची हुई थी। वैसे भी कौन खाने वाला था?"
सब हँस पड़े।
चारों दोस्त पैदल ही घर की ओर चल पड़े। उनका गाँव शादी वाले स्थान से लगभग पाँच किलोमीटर दूर था।
रास्ते में एक घना जंगल पड़ता था।
दिन में तो लोग वहाँ से आराम से गुजरते थे, लेकिन रात में उस जंगल के बारे में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं।
कोई कहता था वहाँ अजीब आवाज़ें सुनाई देती हैं।
कोई कहता था कि रात को वहाँ किसी सफेद साये को देखा गया है।
लेकिन चारों दोस्तों ने कभी इन बातों पर विश्वास नहीं किया था।
"भूत-वूत कुछ नहीं होता," अमन ने कहा।
"हाँ, सब लोगों की कल्पना है," विकास बोला।
धीरे-धीरे वे जंगल के अंदर पहुँच गए।
जंगल असामान्य रूप से शांत था।
न झींगुरों की आवाज़।
न पक्षियों की।
बस उनके कदमों की आहट।
कुछ दूर चलने के बाद अचानक सोनू रुक गया।
"तुम लोगों ने सुना?"
सब रुक गए।
"क्या?"
"जैसे कोई हमारे पीछे चल रहा हो।"
चारों ने पीछे मुड़कर देखा।
अंधेरा।
सिर्फ अंधेरा।
"तू ज़्यादा हॉरर फिल्में देखता है," रोहित हँस पड़ा।
वे फिर आगे बढ़ने लगे।
लेकिन कुछ मिनट बाद वही आवाज़ दोबारा सुनाई दी।
चर्र... चर्र...
जैसे सूखे पत्तों पर कोई चल रहा हो।
इस बार चारों ने साफ़ सुना।
वे तुरंत पीछे मुड़े।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
अमन ने घबराहट छुपाते हुए कहा, "कोई जानवर होगा।"
तभी उसके हाथ की पॉलिथीन हल्की-सी हिलने लगी।
उसने नीचे देखा।
पॉलिथीन बिल्कुल स्थिर थी।
"शायद मेरा वहम है," उसने मन ही मन सोचा।
वे तेज़ी से आगे बढ़ने लगे।
करीब दस मिनट बाद अचानक जंगल में ठंडी हवा चलने लगी।
इतनी ठंडी कि मई की गर्म रात में भी चारों को सिहरन महसूस होने लगी।
सोनू ने काँपते हुए कहा,
"यार... मुझे अच्छा नहीं लग रहा।"
तभी...
दूर अंधेरे में उन्हें कोई खड़ा दिखाई दिया।
एक लंबी काली आकृति।
बिल्कुल स्थिर।
चारों के कदम वहीं रुक गए।
"वो... वो कौन है?" विकास फुसफुसाया।
आकृति हिली नहीं।
बस खड़ी रही।
अमन ने मोबाइल की टॉर्च जलाकर उसकी तरफ़ रोशनी डाली।
लेकिन जैसे ही रोशनी वहाँ पहुँची...
आकृति गायब हो चुकी थी।
चारों के चेहरों का रंग उड़ गया।
और तभी...
उनके पीछे से किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
"मिठाई... वापस कर दो..."
चारों दोस्त एक साथ पलटे।
लेकिन उनके पीछे कोई नहीं था।
और अमन के हाथ में पकड़ी पॉलिथीन अब पहले से कहीं ज़्यादा भारी महसूस हो रही थी...
अमन ने डरते हुए पॉलिथीन की तरफ देखा। उसे सचमुच लग रहा था कि उसका वजन बढ़ गया है।
"यार, अब मज़ाक मत करना," रोहित बोला, "चलो यहाँ से जल्दी निकलते हैं।"
चारों ने कदम तेज़ कर दिए। लेकिन कुछ ही देर बाद उन्हें एहसास हुआ कि वे जिस रास्ते पर चल रहे थे, वह पहले भी देख चुके हैं।
सामने वही टूटा हुआ पेड़ खड़ा था, जिसके पास से वे दस मिनट पहले गुजरे थे।
"ये कैसे हो सकता है?" सोनू की आवाज़ काँप गई।
"शायद हम गलत मुड़ गए होंगे," विकास ने खुद को समझाने की कोशिश की।
तभी अमन की पॉलिथीन से किसी चीज़ के टपकने की आवाज़ आई।
टप...
टप...
टप...
अमन ने नीचे देखा।
पॉलिथीन से चाशनी की बूंदें गिर रही थीं।
लेकिन बूंदें जमीन पर गिरकर गायब नहीं हो रही थीं।
वे मिलकर एक अजीब निशान बना रही थीं।
चारों झुककर उसे देखने लगे।
धीरे-धीरे वह निशान किसी चेहरे जैसा बन गया।
एक लंबा चेहरा...
खोखली आँखें...
और एक भयानक मुस्कान।
अचानक पास की झाड़ियों में जोर से सरसराहट हुई।
चारों उछल पड़े।
अगले ही पल झाड़ियों के पीछे से किसी के हँसने की आवाज़ आई।
"ही... ही... ही..."
वह इंसान की हँसी नहीं थी।
और फिर अंधेरे में दो चमकती हुई आँखें दिखाई दीं...।
जारी रहेगा... (भाग 2)