When the likes ran out in Hindi Moral Stories by Anshika Naithani books and stories PDF | जब लाइक्स खत्म हो गए

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जब लाइक्स खत्म हो गए

मेरा नाम साक्षी है, और अगर आप मेरे सोशल मीडिया प्रोफाइल को देखेंगे तो आपको लगेगा कि मेरी जिंदगी बिल्कुल परफेक्ट है। हर फोटो में मुस्कान, हर स्टोरी में खुशी और हर पोस्ट में एक ऐसा पल जो देखने वालों को लगे कि मैं बहुत खुश हूँ। लेकिन सच यह है कि उन तस्वीरों के पीछे एक ऐसी सच्चाई छुपी थी, जिसे मैं खुद भी नजरअंदाज करती रही।


मैं हर दिन उठते ही सबसे पहले अपना फोन चेक करती थी। कितने लाइक्स आए, कितने कमेंट आए, किसने मेरी स्टोरी देखी—यही मेरी सुबह की शुरुआत होती थी। अगर लाइक्स ज्यादा आते तो मुझे लगता मैं खास हूँ, और अगर कम आते तो पूरा दिन खराब हो जाता था।


धीरे-धीरे यह आदत मेरी जरूरत बन गई। मैं हर चीज पोस्ट करने लगी, चाहे वो असली खुशी हो या सिर्फ दिखावा। कई बार मैं सिर्फ फोटो के लिए हँसती थी, जबकि अंदर से मैं बिल्कुल खाली महसूस करती थी।


एक दिन मैंने अपनी सबसे अच्छी फोटो पोस्ट की। उसे एडिट करने में मैंने घंटों लगाए थे। मुझे पूरा भरोसा था कि इस बार मुझे बहुत लाइक्स मिलेंगे। लेकिन जब मैंने कुछ समय बाद फोन चेक किया, तो लाइक्स बहुत कम थे।


मुझे अजीब सा झटका लगा। मैं बार-बार फोन खोलकर देखती रही, लेकिन कुछ बदल नहीं रहा था। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी ऐसी दौड़ में हार गई हूँ, जिसका कोई असली मतलब ही नहीं था।


उस दिन मैं बहुत उदास थी। मैं कमरे में बैठी थी, तभी माँ मेरे पास आईं। उन्होंने पूछा, “क्या हुआ?” मैंने कहा, “कुछ नहीं।” लेकिन माँ समझ गईं कि कुछ ठीक नहीं है।


उन्होंने बस इतना कहा, “बेटा, असली खुशी वो होती है जो दिल में होती है, फोन में नहीं।”


उनकी बात मेरे दिमाग में घूमती रही। उसी शाम मैंने अपना फोन साइड में रखा और छत पर चली गई। बहुत दिनों बाद मैंने आसमान को ध्यान से देखा। हवा को महसूस किया।


उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी चीजें मिस कर रही थी। असली जिंदगी मेरे सामने थी, लेकिन मैं उसे देख ही नहीं रही थी।


अगले दिन मैं अपनी एक पुरानी दोस्त से मिली। उसने मुझे देखकर कहा, “तू पहले जैसी नहीं रही। पहले तू सच में खुश रहती थी, अब सिर्फ दिखाती है।”


उसकी बात सुनकर मुझे पहली बार अपनी गलती समझ आई। मैं अपनी जिंदगी दूसरों को दिखाने में इतनी व्यस्त थी कि खुद जीना ही भूल गई थी।


उस दिन के बाद मैंने एक फैसला लिया। मैंने सोशल मीडिया को अपनी जिंदगी से हटाया नहीं, लेकिन उसे अपनी जिंदगी पर हावी होने से रोक दिया।


अब मैं पोस्ट करती हूँ, लेकिन सिर्फ तब जब मैं सच में खुश होती हूँ। अब मुझे लाइक्स की उतनी परवाह नहीं होती, क्योंकि मुझे पता है कि मेरी असली खुशी किसी नंबर से तय नहीं होती।


आज भी लोग मेरी पोस्ट देखते हैं और कहते हैं कि मैं खुश लगती हूँ। लेकिन अब फर्क यह है कि मैं सच में खुश हूँ।


क्योंकि अब मैंने समझ लिया है कि असली जिंदगी स्क्रीन के बाहर होती है, जहां लाइक्स नहीं, बल्कि सच्चे रिश्ते और सच्ची मुस्कान मायने रखते हैं।