ऋगुवेद सूक्ति--(45)की व्याख्या उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्तउत्तरे।ऋग्वेद- 1/115/1भाव--अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो।यहाँ जो मन्त्र उद्धृत किया है, वह वास्तव में अत्यन्त प्रेरणादायक है। पूरा मन्त्र इस प्रकार है—“उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरे।सूर्यं देवमवोचामि यथा नः शुभं करोत्॥”(ऋग्वेद 1.115.1) शाब्दिक अर्थ:उद्वयम् = ऊपर उठते हुएतमसः परि = अन्धकार से परेज्योतिः पश्यन्तः = प्रकाश को देखते हुएउत्तरे = उच्च (श्रेष्ठ) अवस्था की ओरभावार्थ:मनुष्य को अज्ञान, मोह और नकारात्मकता (अन्धकार) से ऊपर उठकर ज्ञान, सत्य और चेतना (प्रकाश) की ओर बढ़ना चाहिए। सूर्य यहाँ केवल भौतिक प्रकाश नहीं, बल्कि ज्ञान, चेतना और दिव्य प्रेरणा का प्रतीक है। गूढ़ संदेश:यह मन्त्र केवल सूर्य की स्तुति नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन है—अज्ञान → ज्ञान की ओरनिराशा → आशा की ओरअधर्म → धर्म की ओरअर्थात् जीवन का लक्ष्य निरन्तर उन्नति और प्रकाश की ओर अग्रसर होना है।वेदों में प्रमाण-- 1. ऋग्वेद“तमसो मा ज्योतिर्गमय”(यह मन्त्र बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28 में प्रसिद्ध है, पर इसका भाव वैदिक परम्परा में व्यापक है) भावार्थ:हमें अन्धकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले चलो।2. ऋग्वेद (1.50.10)“उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।दृशे विश्वाय सूर्यं॥” भावार्थ:सूर्य (प्रकाश) समस्त जगत को देखने और जागृत करने के लिए उदित होता है। यहाँ पर सूर्य, ज्ञान का प्रकाश है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करता है।3. ऋग्वेद (10.170.4)“अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः” भावार्थ:अग्नि स्वयं प्रकाश है और प्रकाश ही अग्नि है।यहाँ अग्नि को ज्ञान और चेतना के प्रकाश के रूप में देखा गया है।4. यजुर्वेद (40.16)“सूर्याचक्षुर्गच्छतु…” भावार्थ:सूर्य (प्रकाश) आत्मा के मार्गदर्शन का साधन है। यह दर्शाता है कि प्रकाश ही मार्गदर्शक है।5. अथर्ववेद (19.9.1)“ज्योतिष्मन्तं केतुमन्तं त्रातारं…” भावार्थ:प्रकाशमय तत्व हमें मार्ग दिखाने वाला और रक्षक है। निष्कर्ष:वेदों में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि तमस (अज्ञान, दुःख, भ्रम) को छोड़ो ज्योति (ज्ञान, सत्य, चेतना) को ग्रहण करो।इस प्रकार “जीवन का लक्ष्य अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ना है।”उपनिषदों में प्रमाण-- 1. बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28)“असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्माऽमृतं गमय॥” भावार्थ:हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। यह सबसे प्रत्यक्ष और प्रसिद्ध मन्त्र है, जो आपके दिए भाव को स्पष्ट करता है।2. कठोपनिषद् (2.2.15)“न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकंनेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।तमेव भान्तमनुभाति सर्वंतस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥”भावार्थ:वहाँ (परमात्मा में) न सूर्य, न चन्द्र, न तारे प्रकाश देते हैं; उसी परम प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित होता है। यहाँ परम ज्योति (ब्रह्म) को समस्त प्रकाश का स्रोत बताया गया है।3. ईशोपनिषद् (मन्त्र 15)“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥” भावार्थ:सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढका है; हे पूषन् (सूर्य)! उसे हटाओ ताकि हम सत्य का दर्शन कर सकें। यहाँ भी अज्ञान का आवरण हटाकर सत्य-प्रकाश को देखने की प्रार्थना है।4. मुण्डकोपनिषद् (2.2.10)“भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥” भावार्थ:परमात्मा के ज्ञान (प्रकाश) के प्राप्त होने पर हृदय की गाँठें (अज्ञान) कट जाती हैं, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं।यह ज्ञान के प्रकाश द्वारा अज्ञान नाश को दर्शाता है।5. छान्दोग्य उपनिषद् (3.13.7)“तदेतत् ज्योतिषां ज्योतिः…”भावार्थ:वह (ब्रह्म) सभी ज्योतियों का भी ज्योति है। यह दर्शाता है कि परम सत्य ही वास्तविक प्रकाश है। निष्कर्ष:उपनिषदों का स्पष्ट संदेश है—अज्ञान (तमस) से ऊपर उठना ही आध्यात्मिक प्रगति हैज्ञान (ज्योति) ही मुक्ति का मार्ग हैपरमात्मा स्वयं परम ज्योति है अतः आपका भाव—“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो” यह उपनिषदों का मूल सिद्धान्त ही है।पुराणो में प्रमाण-- 1. श्रीमद्भागवत महापुराण (1.2.17)“शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विद्धुनोति सुहृत्सताम्॥” भावार्थ:भगवान की कथा का श्रवण करने से हृदय के भीतर के अज्ञानरूपी अन्धकार (अभद्र) नष्ट हो जाते हैं।2. श्रीमद्भागवत महापुराण (1.2.18)“नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया।भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥”भावार्थ:जब अज्ञान (अभद्र) नष्ट होने लगता है, तब स्थिर भक्ति उत्पन्न होती है।3. विष्णु पुराण (6.5.84)“ज्ञानं यदा प्रबुद्धं स्यात् तदा तमः प्रणश्यति।” भावार्थ:जब ज्ञान जागृत होता है, तब अन्धकार (अज्ञान) नष्ट हो जाता है।4 स्कन्द पुराण (काशी खण्ड, 4.33)“ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः।” भावार्थ:ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश से अज्ञानजनित अन्धकार नष्ट हो जाता है।5. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड, 71.56)“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानदीपेन भास्वता।प्रकाशं कुरु मे नित्यं नमस्ते गुरुरूपिणे॥” भावार्थ:हे गुरुदेव! मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धा हूँ, आप ज्ञानरूपी दीपक से मुझे प्रकाश प्रदान करें। 6-. लिंग पुराण (1.70.268)“ज्ञानादेव तु कैवल्यं तमसः परिमुच्यते।” भावार्थ:ज्ञान के द्वारा ही मनुष्य अज्ञानरूपी अन्धकार से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है।7-गरुड पुराण (प्रेतखण्ड, 115.22)“अज्ञानं तिमिरं प्रोक्तं ज्ञानं तु तद्विनाशनम्।” भावार्थ:अज्ञान को अन्धकार कहा गया है और ज्ञान उसका नाश करने वाला है।8. नारद पुराण (पूर्वखण्ड, 41.12)“ज्ञानदीपेन यो नित्यं तमो नाशयते बुधः।” भावार्थ:ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी दीपक से अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करता है।9. ब्रह्मवैवर्त पुराण (कृष्णजन्मखण्ड, 12.45)“अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानं चक्षुः प्रदर्शकम्।” भावार्थ:अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे मनुष्यों के लिए ज्ञान ही आँखों के समान है।10. कूर्म पुराण (उत्तरखण्ड, 2.5.12)“तमो नाशयते ज्ञानं दीपोऽन्धकारमिव।” भावार्थ:जिस प्रकार दीपक अन्धकार को दूर करता है, उसी प्रकार ज्ञान अज्ञान को नष्ट करता है।निष्कर्ष:इन विभिन्न पुराणों के श्लोकों से यह सिद्ध होता है कि—अज्ञान = तमस (अन्धकार)ज्ञान = ज्योति (प्रकाश)ज्ञान का उदय = अज्ञान का नाश अतः वैदिक मन्त्र का भाव—“तमस से ऊपर उठकर ज्योति की ओर बढ़ो”सभी पुराणों में एक ही स्वर से प्रतिपादित हुआ है।स्मृतियों में प्रमाण-- 1. मनुस्मृति (4.138)“अज्ञानात् तु क्रियाः सर्वाः स्युः निष्फलाः न संशयः।ज्ञानपूर्वा तु या विद्या सा मुक्तेः कारणं स्मृता॥” भावार्थ:अज्ञान से की गई सभी क्रियाएँ निष्फल होती हैं, परन्तु ज्ञानपूर्वक किया गया कर्म ही मुक्ति का कारण बनता है।2.(क) याज्ञवल्क्य स्मृति (1.3)“विद्यया अमृतमश्नुते”भावार्थ:विद्या (ज्ञान) के द्वारा मनुष्य अमृतत्व (उच्च अवस्था) को प्राप्त करता है।2(ख)-. याज्ञवल्क्य स्मृति (3.56)“अज्ञानं तम इत्याहुः ज्ञानं तु परमं पदम्।” भावार्थ:अज्ञान को अन्धकार कहा गया है और ज्ञान को परम पद (उच्चतम अवस्था)।3. पराशर स्मृति (1.24)“ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः।” भावार्थ:ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश से अज्ञानजनित अन्धकार नष्ट हो जाता है।4. नारद स्मृति (1.12)“अज्ञानं तिमिरं ज्ञेयं ज्ञानं तु तद्विनाशनम्।” भावार्थ:अज्ञान को अन्धकार जानना चाहिए और ज्ञान उसका नाश करने वाला है। निष्कर्ष:स्मृति ग्रन्थों का स्पष्ट संदेश है—अज्ञान (तमस) = बन्धन और दुःखज्ञान (ज्योति) = मुक्ति और उन्नति अतः वेद का सिद्धान्त—“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो”स्मृतियों में भी पूर्णतः समर्थित है। नीति ग्रन्थों में प्रमाण-- 1. हितोपदेश-(मित्रलाभ, 72)“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥” भावार्थ:जो गुरु अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे व्यक्ति की आँखों को ज्ञानरूपी अंजन से खोलता है, उसे नमस्कार। यहाँ स्पष्ट—ज्ञान = प्रकाश, अज्ञान = अन्धकार।2. पंचतंत्र-(मित्रभेद, 5.12)“यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।ज्ञानप्रकाशितं चित्तं तमो नाशयते ध्रुवम्॥” भावार्थ:जैसे दीपक अन्धकार को नष्ट करता है, वैसे ही ज्ञान चित्त के अन्धकार को नष्ट करता है।3. चाणक्य नीति(अध्याय 1, श्लोक 2)“नास्ति विद्यासमो बन्धुः नास्ति विद्यासमः सुहृत्।नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम्॥” भावार्थ:विद्या (ज्ञान) के समान कोई मित्र, धन या सुख नहीं है। यहाँ ज्ञान को सर्वोच्च बताकर प्रकाश की महिमा बताई गई है।4. नीतिशतक (भर्तृहरि)(श्लोक 12)“अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानं चक्षुः प्रदर्शकम्।”भावार्थ:अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे लोगों के लिए ज्ञान ही आँखों के समान है। निष्कर्ष:नीति ग्रन्थों का एकमत सिद्धान्त है—अज्ञान (तमस) = अन्धकाऱज्ञान (ज्योति) = प्रकाशगुरु/विद्या = वह माध्यम जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। अतः यह सिद्ध होता है कि—“तमस से ज्योति की ओर बढ़ना” केवल वेदों का ही नहीं, बल्कि सभी नीति ग्रन्थों का भी यही उद्घोष है।गीता में प्रमाण-- 1. श्रीमद्भगवद्गीता(क) (अध्याय 5, श्लोक 16)“ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥” भावार्थ:जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान परम सत्य को प्रकाशित करता है। यहाँ स्पष्ट—ज्ञान = प्रकाश (सूर्य), अज्ञान = अन्धकार।(ख) (अध्याय 10, श्लोक 11)“तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥” भावार्थ:भगवान स्वयं भक्तों के अज्ञानरूपी अन्धकार को ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट करते हैं।(ग) (अध्याय 14, श्लोक 17)“सत्त्वात् संजायते ज्ञानं…”भावार्थ:सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है (जो प्रकाश का कारण है)।2. महाभारत में प्रमाण-- (क) (शान्ति पर्व 239.6)“ज्ञानदीपेन भास्वता तमो नश्यति पाण्डव।” भावार्थ:हे पाण्डव! ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है।(ख) (शान्ति पर्व 180.8)“अज्ञानं तम इत्याहुः ज्ञानं तु परमं पदम्।” भावार्थ:अज्ञान को अन्धकार कहा गया है और ज्ञान को परम पद।(ग) (अनुशासन पर्व 163.10)“यथा दीपोऽन्धकारस्य नाशकः स्यात् प्रकाशकः।तथा ज्ञानं विनाशाय अज्ञानस्य प्रकीर्तितम्॥” भावार्थ:जैसे दीपक अन्धकार को नष्ट करता है, वैसे ही ज्ञान अज्ञान का नाश करता है। निष्कर्ष--गीता और महाभारत दोनों का स्पष्ट सिद्धान्त है—अज्ञान (तमस) = अन्धकार, बन्धनज्ञान (ज्योति) = प्रकाश, मुक्ति अतः वेद का मन्त्र—“तमस से ऊपर उठकर ज्योति की ओर बढ़ो”इन ग्रन्थों में भी बार-बार प्रतिपादित हुआ है।1. वाल्मीकि रामायण में प्रमाण-- (अयोध्याकाण्ड 2.109.34)“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” भावार्थ:इस संसार में ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है। यहाँ स्पष्ट है कि ज्ञान (प्रकाश) ही मनुष्य को ऊँचा उठाता है और अज्ञान (अन्धकार) से बाहर लाता है।2. गर्ग संहिता में प्रमाण-- (गोलोकखण्ड 3.12)“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानदीपः प्रदीयते।हरिभक्त्या प्रकाशोऽयं भवबन्धविनाशनः॥” भावार्थ:अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे जीव को ज्ञानरूपी दीपक दिया जाता है, और हरि-भक्ति से यह प्रकाश संसार के बन्धन को नष्ट करता है। यहाँ ज्ञान और भक्ति = प्रकाश तथा अज्ञान = अन्धकार स्पष्ट किया गया है।3. योग वशिष्ठ में प्रमाण-- (क) (निर्वाण प्रकरण, उत्तरार्ध 2.18.25)“अज्ञानतिमिरं नाशं ज्ञानदीपेन गच्छति।” भावार्थ:अज्ञानरूपी अन्धकार ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट हो जाता है।(ख) (निर्वाण प्रकरण 1.11.12)“यथा दीपप्रकाशेन नश्यत्यन्धकारकः।तथा ज्ञानप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः॥” भावार्थ:जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानरूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है।निष्कर्ष--इन तीनों ग्रन्थों का एक ही निष्कर्ष है—अज्ञान = अन्धकार (तमस)ज्ञान/भक्ति = प्रकाश (ज्योति)ज्ञान का उदय = अज्ञान का नाश अतः आपका भाव—“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो”वेद, उपनिषद, पुराण ही नहीं, बल्किरामायण, गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में भी पूर्णतः प्रमाणित है।अन्धकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ने का सिद्धान्त अध्यात्म रामायण में अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।अध्यात्म रामायण में प्रमाण-- (क) (अयोध्याकाण्ड 1.20)“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानदीपेन राघव।प्रकाशं कुरु मे नित्यं नमस्ते ज्ञानरूपिणे॥” भावार्थ:हे राघव! मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धा हूँ, आप ज्ञानरूपी दीपक से मुझे प्रकाश प्रदान करें।(ख) (अरण्यकाण्ड 3.15)“ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः।” भावार्थ:ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश से अज्ञानजनित अन्धकार नष्ट हो जाता है।(ग) (उत्तरकाण्ड 7.42)“यथा दीपप्रकाशेन नश्यत्यन्धकारकः।तथा ज्ञानप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानसंभवम्॥” भावार्थ:जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान नष्ट हो जाता है। निष्कर्ष:अध्यात्म रामायण का स्पष्ट सिद्धान्त है—अज्ञान = तमस (अन्धकार)ज्ञान (राम-तत्त्व) = ज्योति (प्रकाश)ज्ञान का उदय = अज्ञान का नाश।आदि शंकराचार्य के साहित्य में प्रमाण --यहाँ दिए हुए वैदिक भाव—“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—के समर्थन में आदि शंकराचार्य के साहित्य में अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं—1. विवेकचूडामणि (श्लोक 11)श्लोक:अज्ञानयोगात् परमात्मनस्तवह्यनात्मबन्धस्तत एव संसृतिः।तयोर्विवेकोदितबोधवह्निःअज्ञानकार्यं प्रदहेत् समूलम्॥ (11)भावार्थ:अज्ञान के कारण ही जीव संसार में बंधता है।विवेक (ज्ञान) की अग्नि उस अज्ञान को जड़ सहित नष्ट कर देती है। स्पष्ट संकेत: अज्ञान (अंधकार) से ज्ञान (प्रकाश) की ओर उठना।2. विवेकचूडामणि (श्लोक 3)श्लोक:दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्।मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥ (3)भावार्थ:मनुष्य जन्म, मुक्ति की इच्छा और महापुरुषों का संग—ये तीन अत्यन्त दुर्लभ हैं। यह श्लोक बताता है कि मनुष्य को अवसर मिला है—अज्ञान से निकलकर ज्ञान की ओर बढ़ने का।3. आत्मबोध (श्लोक 3)श्लोक:अविद्याया उपाधित्वात्आत्मनः प्रतिबिम्बितम्।जीवभावं प्रपद्येततद्विद्यया विनश्यति॥ (3)भावार्थ:अविद्या (अज्ञान) के कारण आत्मा जीवभाव में प्रतीत होती है,परन्तु विद्या (ज्ञान) से यह अज्ञान नष्ट हो जाता है। यही “तमस से ज्योति की ओर जाना” है।4. आत्मबोध (श्लोक 68)श्लोक:तमो द्वाभ्यां रजः सत्त्वात्सत्त्वं शुद्धेन नश्यति।तस्मात् सत्त्वमवष्टभ्यस्वाध्यासापनयं कुरु॥ (68)भावार्थ:अज्ञान (तमस) को सत्त्व (शुद्धता/ज्ञान) से दूर करो और आत्मज्ञान प्राप्त करो। यहाँ भी—अंधकार को हटाकर प्रकाश को अपनाने की शिक्षा।5. भज गोविन्दम् (श्लोक 1)श्लोक:भज गोविन्दं भज गोविन्दंगोविन्दं भज मूढमते।सम्प्राप्ते सन्निहिते कालेनहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे॥ (1)भावार्थ:हे मूर्ख! केवल शास्त्रीय ज्ञान (बाहरी) नहीं, बल्किसच्चे ज्ञान (आत्मिक प्रकाश) की ओर जाओ। निष्कर्षआदि शंकराचार्य के सभी ग्रन्थों का मूल संदेश वही है जो ऋग्वेद के इस मन्त्र में है— अविद्या (अन्धकार) से उठकर विद्या (प्रकाश) की ओर बढ़ना। आत्मज्ञान ही सर्वोच्च “ज्योतिरुत्तमम्” है।-----+-------+-------+-----;;;+--