Mariz-e-Ishq - 2 in Hindi Love Stories by unknown Writer books and stories PDF | मरीज़-ए-इश्क़ - 2

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मरीज़-ए-इश्क़ - 2



"बीमारी बढ़ती गई, इलाज कहीं ना मिला"

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एपिसोड 4: अस्पताल की वो रातें

आइना के बिस्तर के पास मैं बैठा था। उसका हाथ मेरे हाथ में था। बाहर बारिश हो रही थी। अस्पताल की मशीनें बीप-बीप कर रही थीं।

"तुम यहाँ कितनी देर से हो?" उसने कमजोर आवाज़ में पूछा।

"दो घंटे।"

"घर जाओ, आदित्य।"

"नहीं जाऊंगा।"

वो मुस्कुराई। वही मुस्कान। लेकिन अब उसमें दर्द था।

"तुम बहुत जिद्दी हो।"

"तुम्हारे सामने से यही सीखा है।"

वो चुप हो गई। फिर बोली, "कोई कहानी सुनाओ मुझे।"

"कैसी कहानी?"

"हमारी। जो अभी लिखी जा रही है।"

मैंने उसे बताना शुरू किया। उस पहली बारिश से, उस पहली चाय से, उस पहली मुलाकात से।

वो सुनती रही। आँखें बंद किए। चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।

मैंने पूछा, "तुम डरती नहीं हो?"

"किससे?"

"मौत से।"

उसने आँखें खोलीं। "नहीं। लेकिन एक चीज़ से डरती हूँ।"

"किससे?"

"तुम्हें अधूरा छोड़कर जाने से।"

मेरा दिल टूट गया। मैंने उसका हाथ और मजबूती से पकड़ लिया।

"तुम कहीं नहीं जाओगी। मैं नहीं जाने दूंगा।"

वो फिर मुस्कुराई। "आदित्य... कोई भी किसी को नहीं रोक सकता। जाना तो होता है।"

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एपिसोड 5: आखिरी चाय

अगले दिन डॉक्टर ने बताया – "हमने कोशिश की, लेकिन... अब समय बहुत कम है।"

मैं बाहर आया। आसमान की तरफ देखा। बादल थे। बारिश होने वाली थी।

मैं वापस उसके कमरे में गया।

"आइना, एक बात बताऊँ?"

"बता।"

"मैं तुम्हें चाय पिलाना चाहता हूँ। असली चाय। कैंटीन वाली।"

वो हंसी। "मुझे डॉक्टर ने मना किया है।"

"डॉक्टर को मैं मना लूंगा।"

मैं डॉक्टर के पास गया। बहुत मिन्नत की। डॉक्टर मान गया – "बस एक कप।"

मैं कैंटीन गया। दो कप चाय लेकर आया।

हमने चाय पी। उसी अस्पताल के बिस्तर पर। उसी मशीनों के बीच।

"याद है पहली बार?" उसने पूछा।

"बस स्टॉप पर?"

"हाँ। तुमने अपना छाता मेरी तरफ बढ़ा दिया था।"

"तुम भीग रही थीं।"

"तब से पता था मुझे।"

"क्या पता था?"

"कि तुम एक अच्छे इंसान हो। और अच्छे इंसान से प्यार करना... सबसे आसान काम है।"

मैं चुप था। मेरी आँखों में आँसू थे।

"रोना मत," उसने कहा, "मैंने ज़िंदगी में बहुत कुछ पाया। लेकिन सबसे खूबसूरत चीज़... तुम हो।"

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एपिसोड 6: वो दिन

और फिर वो दिन आ गया।

सुबह के 4 बजे थे। फ़ोन बजा। आइना के पापा का फ़ोन था।

"बेटा... वो... अब नहीं रही।"

मैं फ़ोन रखकर बैठ गया। दिल में कुछ टूटा। आवाज़ नहीं निकली। आँसू नहीं निकले। बस एक सन्नाटा था।

मैं उठा। अस्पताल गया। उसका कमरा खाली था। बिस्तर बना हुआ था। खिड़की पर वो गुलाब का फूल रखा था जो मैं लाया था।

मैंने वो फूल उठा लिया। अपनी जेब में रख लिया।

बाहर बारिश हो रही थी। मैं बारिश में खड़ा हो गया। छाता नहीं खोला।

मैंने आसमान की तरफ देखा।

"तूने कहा था न... जाना तो होता है। मैंने नहीं माना था। लेकिन आज मान रहा हूँ। तू चली गई। लेकिन..."

मैं रुका।

"...मैं तुझे जाने नहीं दूंगा। तू मेरे अंदर रहेगी। हर शब्द में। हर कहानी में। हर एपिसोड में।"

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एपिसोड 7: उसके बाद (आज)

आज मैं ये सब लिख रहा हूँ। मेरी उँगलियाँ काँप रही हैं। आँखों से पानी टपक रहा है। लेकिन मैं लिखे जा रहा हूँ।

क्योंकि उसने कहा था – "लिखते रहना। मैं तुम्हारी हर कहानी में रहूंगी।"

तो ये कहानी... उसके नाम।

हर लफ्ज़ उसकी याद है।
हर सन्नाटा उसकी आवाज़ है।

"मरीज़-ए-इश्क़" सिर्फ एक कहानी नहीं है।
ये उस बीमारी का नाम है जो मुझे हमेशा रहेगी।
और इस बीमारी का इलाज... सिर्फ वो थी।
जो अब नहीं है।

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भाग -3 जल्द...