Mariz-e-Ishq - 1 in Hindi Love Stories by unknown Writer books and stories PDF | मरीज़-ए-इश्क़ - 1

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मरीज़-ए-इश्क़ - 1

मरीज़-ए-इश्क़" – भाग 1

"बीमारी जिसका इलाज सिर्फ तुम हो"

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एपिसोड 1: शुरुआत

मेरा नाम आदित्य है। मैं एक आम लड़का हूँ, एक आम जिंदगी जीता हूँ। लेकिन कुछ महीने पहले तक मैं बिल्कुल भी आम नहीं था।

क्योंकि तब मैं जीता नहीं था, मैं बस साँस ले रहा था।

फिर एक दिन...

बारिश हो रही थी। मैं बस स्टॉप पर खड़ा था। कॉलेज की किताबें बैग में भीग रही थीं। मूड खराब था, दिन खराब था, जिंदगी खराब थी।

तभी...

"भाई, ये बस नंबर 205 यहाँ से मिलेगी?"

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

एक लड़की। नीली जींस, सफेद शर्ट। बाल बारिश में भीगे हुए। हाथ में एक किताब।

लेकिन उसकी आँखें... काली, गहरी, और कुछ अनकहा लिए हुए।

"हाँ... 205 यहीं से मिलेगी।"

"शुक्रिया।"

वो मेरे बगल में खड़ी हो गई। बारिश तेज़ हो गई। मैंने अपना छाता उसकी तरफ थोड़ा बढ़ा दिया।

"थैंक यू," उसने मुस्कुराकर कहा।

वो मुस्कान... जैसे अंधेरे कमरे में लाइट जल गई हो।

"तुम्हारा नाम?" उसने पूछा।

"आदित्य। तुम्हारा?"

"आइना।"

"आइना? यानी शीशा?"

"हाँ। जैसे शीशा सब सच दिखाता है, वैसे ही मैं भी सच दिखाती हूँ।"

मैं हंसा। पता नहीं क्यों, लेकिन उससे बात करके अच्छा लग रहा था।

बस आ गई। वो चढ़ गई। मैं देखता रहा।

बस ने पलटी मारी और वो चली गई।

लेकिन वो मेरे दिमाग से नहीं गई। और ना ही दिल से।

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एपिसोड 2: दूसरी मुलाकात

अगले दिन। कॉलेज की कैंटीन।

मैं चाय पी रहा था। तभी...

"आदित्य!"

मैंने देखा। वही लड़की। आइना।

वो मेरे सामने आकर बैठ गई।

"तुम यहाँ पढ़ते हो?"

"हाँ। तुम भी?"

"नहीं। मैं पास के कॉलेज में हूँ। लेकिन यहाँ की चाय अच्छी बनती है।"

हम बातें करने लगे। किताबों पर, फिल्मों पर, जिंदगी पर।

उसने पूछा, "तुम्हें इश्क़ पर यकीन है?"

मैंने सोचा। "नहीं। सब झूठ है।"

वो मुस्कुराई। "तुम गलत हो। इश्क़ सबसे सच्ची चीज़ है।"

"क्यों?"

"क्योंकि इश्क़ में आदमी खुद से झूठ बोल सकता है, लेकिन अपने दिल से नहीं।"

मैं चुप हो गया। उसकी बातों में वजन था।

"तुम्हें किसी से इश्क़ हुआ है?" मैंने पूछा।

वो थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, "हाँ। हो रहा है।"

"किससे?"

वो उठी। "फिर कभी बताऊंगी। चलो, मुझे जाना है।"

वो चली गई।

मैं सोचता रहा... वो किससे इश्क़ करती है?

काश मुझे पता होता कि वो शख्स... मैं ही हूँ।

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एपिसोड 3: बीमारी

एक हफ्ता बीत गया। हर दिन हम मिलते। हर दिन बातें होतीं।

मैं उसके बिना रह नहीं सकता था। उसकी हँसी, उसकी बातें, उसकी चुप्पी... सब कुछ चाहिए था मुझे।

एक दिन मैंने खुद से कहा – "यार, तुझे उससे प्यार हो गया है।"

मैं डर गया। प्यार? मुझे? जिसे प्यार पर यकीन नहीं था?

लेकिन दिल तो दिल है। वो नहीं मानता।

मैंने उसे बताने का फैसला किया।

अगले दिन... वो नहीं आई।

दूसरे दिन... नहीं आई।

तीसरे दिन... नहीं आई।

मैं परेशान हो गया। उसका नंबर नहीं था मेरे पास। उसका पता नहीं था। बस नाम था – आइना।

और वो नाम अब मेरे दिल पर लिखा था।

मैं हर रोज़ कैंटीन में बैठता। चाय पीता। उसका इंतज़ार करता।

एक दिन उसका दोस्त मिला। उसने बताया...

"आइना बीमार है। बहुत बीमार। अस्पताल में है।"

मेरे पैर उखड़ गए। "कौन सा अस्पताल?"

उसने नाम बताया। मैं दौड़ा।

अस्पताल पहुँचा। उसका कमरा ढूंढा। दरवाज़े पर खड़ा हो गया।

अंदर झाँका। वो बिस्तर पर लेटी थी। चेहरा पीला पड़ गया था। हाथ में केनुला लगा था।

लेकिन जैसे ही उसने मुझे देखा... वो मुस्कुराई।

वही मुस्कान। वही आँखें।

मैं अंदर गया। उसके पास बैठ गया।

"क्यों नहीं बताया तुमने?" मेरी आँखें नम थीं।

"तुम परेशान हो जाते।"

"तुम्हारे बिना मैं पहले से ही परेशान हूँ।"

वो चुप हो गई। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

"आइना, सुनो। मुझे तुमसे... प्यार है।"

वो चुप रही। फिर बोली, "मुझे पता है।"

"कैसे?"

"क्योंकि मुझे भी तुमसे प्यार है। उस दिन बस स्टॉप पर... पहली बार में ही।"

मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।

लेकिन उसने कहा... "आदित्य, मेरी बीमारी... ठीक नहीं होती। डॉक्टरों ने कहा है... मेरे पास ज़्यादा वक्त नहीं है।"

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क्या आगे होगा?

· क्या आइना ठीक हो पाएगी?
· क्या आदित्य उसके बिना रह पाएगा?
· ये इश्क़ मरेज़ बनेगा या दवा?

भाग 2 जल्द...