कहानी: घर लौटती पगडंडी
मचान पर खड़ा ज्ञान सिंह दूर तक फैले खेत को देख रहा था। गेहूं की सुनहरी फसल अब कटकर ढेरों में बदल चुकी थी। हवा में भूसे की हल्की गंध तैर रही थी। उसने आंखें मिचमिचाकर देखा—कोई पौधा खड़ा तो नहीं रह गया?
“दद्दा… अब तो जाने दो न!” नीचे से एक पतली सी आवाज आई।
ज्ञान सिंह ने झुककर देखा—तीन-चार बच्चे हाथ जोड़कर खड़े थे। उनके मैले-कुचैले कपड़े, सूखी आँखें और उम्मीद से भरे चेहरे किसी भी पत्थर दिल को पिघला सकते थे।
“अरे, तुम लोग अभी तक यहीं हो?” उसने हल्की झुंझलाहट में कहा, पर आवाज में कठोरता नहीं थी।
“हर साल पटेल दद्दा के खेत से बाल बीनने देते हो… इस बार भी दे दो न,” एक लड़के ने आगे बढ़कर कहा। उसकी नाक बह रही थी, पर आँखों में जिद थी।
ज्ञान सिंह ने गहरी सांस ली। एक पल को उसकी नजर खेत पर फिर दौड़ी, फिर बच्चों पर आकर ठहर गई।
“ठीक है… जाओ। पर ध्यान रखना, पूलों को मत छेड़ना, सिर्फ टूटी बाल ही बीनना।”
इतना सुनते ही बच्चे ऐसे दौड़े जैसे किसी ने खजाना खोल दिया हो। उनके छोटे-छोटे हाथ जमीन पर झुकते, बाल उठाते और अपने फटे झोलों में डालते जा रहे थे।
ज्ञान सिंह उन्हें देखता रहा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी—मुस्कान भी, और पीड़ा भी।
ये बच्चे “चेतुआ” मजदूरों के थे। हर साल की तरह इस बार भी सहरिया और दूसरे वंचित वर्ग के लोग बुंदेलखंड से यहां आए थे। दो महीने खेतों में खटते, और मजदूरी के नाम पर हर बीस पूलों पर एक पूला पाते।
“कितना बचा लेंगे ये?” ज्ञान सिंह ने खुद से बुदबुदाया, “साल भर के लिए… बस इतना ही सहारा है इनका।”
उसे अपना बचपन याद आ गया।
वह भी तो ऐसे ही आया था—मां-बाप के साथ। छोटा सा ‘ज्ञानु’, जो भूख में रोता था और खेतों में खेलता था। फिर अचानक एक दिन मलेरिया ने उसके मां-बाप को छीन लिया।
“अम्मा… उठो न…” उसने झिंझोड़ते हुए कहा था।
पर अम्मा नहीं उठी थी।
उस दिन की ठंडी रात और उसका अकेलापन आज भी उसके भीतर कहीं जिंदा था।
“ए ज्ञान! नीचे आओ!” दूर से ठाकुर देवकी सिंह की आवाज आई।
ज्ञान सिंह चौंककर वर्तमान में लौटा। मचान से उतरते हुए बोला, “जी मालिक, आ रहा हूँ।”
नीचे पहुंचते ही ठाकुर ने उसे घूरा—“सारा काम हो गया?”
“जी, एक भी पौधा नहीं बचा।”
“हूं…” ठाकुर ने सिर हिलाया, “और ये बच्चों को क्यों घुसा दिया खेत में?”
ज्ञान सिंह थोड़ा सकपका गया—“मालिक… हर साल…”
“हर साल-हर साल! बहुत रहम आता है तुमको!” ठाकुर ने तीखी नजरों से देखा।
ज्ञान सिंह चुप रहा। उसकी नजरें झुक गईं।
“याद रखो, तुम नौकर हो… मालिक नहीं!” ठाकुर ने कड़वे स्वर में कहा और मुड़कर चल दिया।
ज्ञान सिंह वहीं खड़ा रह गया। उसकी मुट्ठियां अनायास भींच गईं, फिर ढीली पड़ गईं।
शाम को जब मजदूर अपने-अपने झोपड़ों की तरफ लौट रहे थे, ज्ञान सिंह भी धीरे-धीरे उधर चला गया। वहां चूल्हों से धुआं उठ रहा था, बच्चे खेल रहे थे, और औरतें रोटियां सेंक रही थीं।
“आओ भइया!” एक बुजुर्ग सहरिया ने उसे आवाज दी।
“बैठो, आज हमारे साथ खाना खाओ।”
ज्ञान सिंह हल्का सा मुस्कुराया और पास बैठ गया।
“कैसी कटाई रही इस बार?” एक जवान मजदूर ने पूछा।
“बस… जैसे हर साल,” ज्ञान सिंह ने थके स्वर में कहा।
“हम तो सोचते हैं, भइया,” वह मजदूर बोला, “हम मेहनत करते हैं, फसल उगती है… पर पेट हमारा ही खाली रहता है।”
ज्ञान सिंह ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में वही सवाल था, जो बरसों से उसके भीतर पल रहा था।
“तुम लोग तो फिर अपने गांव लौट जाते हो,” ज्ञान सिंह बोला, “मैं तो यहीं का होकर भी कहीं का नहीं रहा।”
“कैसे?” बुजुर्ग ने पूछा।
ज्ञान सिंह कुछ देर चुप रहा, फिर धीमे स्वर में बोला—
“दिन भर मशीन की तरह चलता रहा, पर शाम को मुझे इंसान समझने वाला कोई नहीं था।”
यह कहते हुए उसकी आवाज भर्रा गई।
सन्नाटा छा गया।
चूल्हे की आग की लपटें जैसे उस दर्द को और उजागर कर रही थीं।
“भइया, तुम हमारे साथ चलो न,” वही जवान मजदूर बोला।
ज्ञान सिंह चौंका—“कहाँ?”
“बुंदेलखंड… अपने गांव।”
“मेरा कोई गांव नहीं है,” ज्ञान सिंह ने फीकी हंसी हंसते हुए कहा।
“तो बना लो,” बुजुर्ग ने धीरे से कहा, “हमारे बीच रहोगे, तो अपने हो जाओगे।”
ज्ञान सिंह के भीतर कुछ हिल गया।
“यहां क्या है तुम्हारा?” एक और मजदूर बोला, “दिन-रात काम करो, और बदले में तिरस्कार पाओ?”
उसे ठाकुर के शब्द याद आए—“तुम नौकर हो…”
उसने सिर झुका लिया।
रात को जब वह अपनी भूसा वाली कोठरी में लेटा, तो नींद नहीं आई।
चंदा पास में लेटी थी। उसने धीरे से पूछा—“क्या सोच रहे हो?”
“कुछ नहीं…” ज्ञान सिंह बोला, फिर थोड़ी देर बाद खुद ही बोल पड़ा, “चंदा, अगर हम यहां से चले जाएं तो?”
चंदा ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा—“कहाँ?”
“उनके साथ… बुंदेलखंड।”
चंदा कुछ देर चुप रही। फिर बोली—“जहां इज्जत मिले, वहीं घर होता है।”
ज्ञान सिंह ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी।
सुबह सूरज निकला तो ज्ञान सिंह ने एक फैसला कर लिया था।
वह मजदूरों के पास गया। वे अपना सामान बांध रहे थे—फटे कपड़े, एल्यूमिनियम के बर्तन, और गेहूं की छोटी-छोटी पोटलियां।
“भइया…” ज्ञान सिंह ने धीमे स्वर में कहा।
सबकी नजरें उसकी तरफ उठीं।
“अगर… अगर मैं भी तुम्हारे साथ चलूं, तो…?”
एक पल को सन्नाटा छा गया, फिर सबके चेहरों पर मुस्कान फैल गई।
“हम तो कब से यही चाहते थे!” बुजुर्ग ने हंसते हुए कहा।
“चलो भइया, अब तुम अकेले नहीं हो,” जवान मजदूर ने उसका कंधा थाम लिया।
ज्ञान सिंह की आंखें भर आईं।
उसने एक बार पीछे मुड़कर खेतों की तरफ देखा—वही खेत, जहां उसने जिंदगी गुजारी, पर कभी अपना नहीं पाया।
फिर उसने नजरें फेर लीं।
अब वह “सांस लेती मशीन” नहीं था…वह फिर से एक इंसान बनने जा रहा था।