the Roots in Hindi Short Stories by राज बोहरे books and stories PDF | जड़ें

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जड़ें

जड़ें

 सावित्री देवी अक्सर खिड़की के पास बैठ जातीं। बाहर लगे नीम के पेड़ को देखतीं और सोचतीं— “जैसे इस पेड़ की जड़ें मिट्टी से जुड़ी हैं, वैसे ही इंसान की जड़ें उसके परिवार से जुड़ी होती हैं। अगर जड़ें कट जाएँ, तो पेड़ सूख जाता है।”

वृद्धाश्रम की लंबी गलियों में अक्सर सन्नाटा पसरा रहता था। दीवारों पर टंगे कैलेंडर और घड़ी की टिक-टिक समय के बीतने का अहसास कराते थे। इन्हीं गलियों में एक कमरे में रहती थी सावित्री देवी, सत्तर वर्ष की एक वृद्ध माँ।

सावित्री देवी का चेहरा झुर्रियों से भरा था, लेकिन उन झुर्रियों में जीवन के अनुभवों की गहरी लकीरें थीं। सफेद बालों को वह हमेशा तेल से संवारकर जूड़े में बाँधती। आँखों में हल्की धुंधलाहट थी, पर उनमें अब भी एक चमक थी—अपने पुराने घर और बच्चों की स्मृतियों की। उनकी चाल धीमी थी, हाथों में हल्का कंपन रहता था। लेकिन जब बोलतीं, तो आवाज़ में एक अजीब दृढ़ता और अपनापन होता।

वृद्धाश्रम में उनके साथ और भी बुज़ुर्ग रहते थे। कोई अख़बार पढ़ता, कोई रेडियो सुनता, कोई खामोश बैठा रहता। हर शाम सावित्री देवी को अपने पुराने घर की याद आती। वह घर, जहाँ आँगन में तुलसी का चौरा था, जहाँ दीवारों पर बच्चों की हँसी गूँजती थी। उनके पाँच बच्चे थे—तीन बेटे और दो बेटियाँ। बड़े बेटे रमेश का चेहरा हमेशा गंभीर रहता था, चश्मा लगाए वह नौकरी में व्यस्त रहता। मंझला बेटा सुरेश हँसमुख था, लेकिन महत्वाकांक्षी भी। छोटा बेटा अजय पढ़ाई में तेज़ था, पर आधुनिक सोच का था। दो बेटियाँ—रीना और किरण—घर की रौनक थीं।

सावित्री देवी को याद आता कि कैसे वह सबको पढ़ाई के लिए प्रेरित करती थीं। “बेटा, मेहनत से पढ़ो, तभी जीवन में आगे बढ़ोगे।” बच्चे हँसते, कभी झुँझलाते, पर उनकी बात मानते।

अब वही बच्चे बड़े हो गए थे। सबकी अपनी-अपनी दुनिया थी। रमेश महानगर में नौकरी करता था, सुरेश व्यापार में व्यस्त था, अजय विदेश चला गया था। रीना और किरण अपने-अपने परिवार में रम गई थीं। शुरू में सब माँ को अपने साथ रखना चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे जिम्मेदारियाँ और व्यस्तताएँ बढ़ीं। आख़िरकार, यह तय हुआ कि माँ वृद्धाश्रम में रहेंगी—“वहाँ देखभाल भी होगी और सुविधा भी।”

सावित्री देवी ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप चली आईं। लेकिन उनके भीतर एक दीवार खड़ी हो गई थी—बच्चों और उनके बीच की दीवार।

एक दिन वृद्धाश्रम में उनके कमरे में बेटा रमेश मिलने आया। रमेश का चेहरा थका हुआ था, आँखों में मोबाइल की स्क्रीन की थकान झलक रही थी। सावित्री देवी ने मुस्कुराकर कहा— “कैसे हो बेटा? बच्चों की पढ़ाई ठीक चल रही है?”

रमेश ने संक्षिप्त उत्तर दिया— “हाँ माँ, सब ठीक है। बस काम बहुत है।”

सावित्री देवी ने धीरे से कहा— “याद है, जब तुम छोटे थे तो मैं तुम्हें हर रात कहानी सुनाती थी। आज तुम्हारे बच्चों को भी सुनाओ।”

रमेश ने हँसते हुए कहा— “माँ, अब बच्चों को कहानियों की ज़रूरत नहीं। उनके पास इंटरनेट है।”

सावित्री देवी की आँखों में नमी उतर आई। उन्होंने खिड़की की ओर देखा। नीम का पेड़ हवा में झूम रहा था।

एक रात वृद्धाश्रम में बिजली चली गई। तूफान आ गया झाड़ियाँ और छोटे पेड़ तेजी से हिलने लगे। कुछ तो चरमराहट के साथ टूट भी गये। सब बुज़ुर्ग बेचैन हो उठे। सावित्री देवी ने सबको आँगन में बुलाया। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया— “जब मैं छोटी थी, मेरे पिता हर रात हमें किस्से सुनाते थे। उन्हीं किस्सों ने हमें जीवन का साहस दिया। आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ।”

उन्होंने एक किसान की कहानी सुनाई, जिसने कठिनाइयों के बावजूद अपनी ज़मीन की जड़ों को बचाए रखा, तो किसान अकाल मे भी बच गया। बुज़ुर्ग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। कहानी ख़त्म होते ही सबकी आँखों में चमक थी।

अगले दिन सावित्री देवी ने खिड़की से बाहर देखा। नीम का पेड़ अब भी खड़ा था—मजबूत और स्थिर जड़ों  के साथ । उन्होंने मन ही मन कहा— “जड़ों से कटकर कोई भी वृक्ष फलदायी नहीं रह सकता। इंसान भी अपने परिवार से कटकर अधूरा हो जाता है।”

उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान थी। क्योंकि उन्होंने समझ लिया था—भले ही वह वृद्धाश्रम में हों, उनकी जड़ें अब भी उनके बच्चों और घर से जुड़ी हैं।

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