कर्ज़
हेड क्लर्क नागर ने अपनी मेज़ पर रखी पीतल की पुरानी घंटी को उँगलियों से दो बार थपथपाया—“टन्… टन्…”।
दफ्तर की दीवारों से टकराकर वह आवाज़ बाहर बरामदे तक पहुँची, जहाँ दोपहर की ढलती धूप फर्श पर लकीरों की तरह पसरी हुई थी।
लेकिन उस आवाज़ का बिसुन पर कोई असर नहीं हुआ।
वह बरामदे में रखे लकड़ी के पुराने स्टूल पर बैठा था—झुकी हुई पीठ, ढीले कंधे, और आँखें जैसे किसी अनदेखे क्षितिज में गड़ी हुईं। उसके होंठ हल्के-हल्के हिल रहे थे, मानो वह कोई हिसाब बुदबुदा रहा हो—पर वह हिसाब कागज़ पर नहीं, भीतर कहीं चल रहा था।
नागर बाबू ने चश्मा उतारकर आँखें मल लीं और दरवाज़े की चौखट से टिककर उसे देखने लगे।
“बिसुन!” उन्होंने थोड़ा ऊँचा स्वर किया। पर कोई जवाब नहीं।
“अरे बिसुन!” इस बार आवाज़ में झुंझलाहट थी। फिर भी कोई हरकत नहीं।
नागर के चेहरे पर खीझ उतर आई— “काम के वक्त समाधि लगाता है…” बुदबुदाते हुए उन्होंने फाइल उठाई और खुद ही अफसर के चेंबर की ओर बढ़ गए।
चेंबर से लौटते समय भी बिसुन वैसे ही बैठा था।
बड़े बाबू तेज कदमों से बगल से गुजरे—फाइलों का पुलिंदा हाथ में, माथे पर तनाव—पर बिसुन ने सिर उठाकर देखा तक नहीं।
नागर को अब यह केवल अजीब आदत नहीं लग रही थी—यह कुछ गहरा था, जो उनकी समझ से बाहर था। यह व्यवहार जिज्ञासा और चिंता का विषय बन चुका था।
उन्होने पियून डब्बू को बुलवाया । डब्बू फर्श पर बैठा एक पुरानी रजिस्टर की जिल्द बाँधता उनसे बात करता जा रहा था।
“डब्बू,” नागर ने आवाज़ धीमी रखी, “इस बिसुन को क्या हो जाता है? कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे वह सुन ही नहीं सकता।दिमाग बंद हो गया हो इसका ।”
डब्बू ने हाथ रोक दिए। उसकी आँखों में एक क्षण को ठहराव आया— “साहब… वह सुनता सब है… बस जवाब देने की ताकत नहीं बचती।दिमाग बंद नहीं होता ... जिंदगी बंद होने लगती है !”
“मतलब क्या है तुम्हारा ?” नागर ने भौंहें चढ़ाईं।
डब्बू ने गहरी साँस लेकर धीरे से कहा—“कर्ज़… भारी कर्ज़ है उस पर।”
“कर्ज़?” नागर कुर्सी खींचकर बैठ गए “ कितना कर्ज होगा जो भला आदमी यूँ पत्थर बन जाये ?”
“इतना कर्ज़ कि आदमी दुनिया से कट जाए?”डब्बू ने हल्की हँसी हँसी—पर उसमें व्यंग्य से ज्यादा दर्द था“साहब, कर्ज़ आदमी को धीरे-धीरे काटता है… पहले जेब से, फिर आत्मा से।कर्ज आदमी की सांसो में उतर जाता है !”
“सीधे-सीधे बताओ, किस -किस का कर्ज़ है उस पर?” नागर ने पूछा।
“गाँव के महाजन चमन सेठ, सरपंच जी, और एक बिल्लू नाम का गुंडा… सबका।”
“इतनों से?” नागर चौंके—“कोई बुरी आदत होगी इसकी ।”
डब्बू ने सिर झुका कर मुस्कुराया— “वो तो साहब अपने बच्चों को दूध दिलाने के लिए खुद भूखा रह जाता है… आदतें नहीं, मजबूरियाँ उसे खा रही हैं।”
डब्बू ने अपनी बात को धीरे-धीरे खोलना शुरू किया— “आपको शायद पता नहीं… इसके पिता की लगातार 3 साल तक फसलें खराब ही गई थी। कभी ओला और अतिवृष्टि, कभी अकाल तो कभी गलत खाद-बीज के उपयोग की वजह से… वे हर साल गाँव के अलग-अलग आदमियों से कर्ज लेते चले गए थे। घर के रोजाना के खर्च, हर साल के शादी-ब्याह, और बिसुन के दो भाइयों का नाकारापन… उन्हें तोड़ देने के लिए काफी था।”
नागर की आँखें अब गंभीर हो चुकी थी, उनके चेहरे का कठोर पन अब धीरे धीरे पिघलने लगा था, “फिर?” उन्होंने पूछा।
डब्बू की नज़र नीची और आवाज़ धीमी हो गई—“फिर एक दिन… उन्होंने पेड़ से लटककर अपनी जिंदगी खत्म कर ली।”
कमरे में कुछ क्षण के लिये सन्नाटा छा गया। नागर का गला सूख गया।
“उस दिन के बाद,” डब्बू बोला, “बिसुन हमारे विभाग का उत्साही और मस्त चपरासी था, जो इस घटना के बाद बुद्धि से युवक नहीं रहा। उसकी उम्र एक रात में पंद्रह वर्ष बढ़ गई।”
“माँ, बहन, दो भाई… सब उसकी जिम्मेदारी बन गए। सरकारी नौकरी थी… पर छोटी।” फिर उसने नागर की आँखों में देखते हुए कहा—“छोटे कर्मचारियों को कम वेतन और बढ़ती आवश्यकताएँ सामाजिक रूप से भी कमजोर और मानसिक रूप से तनावग्रस्त बना देती हैं।”
नागर ने नजरें झुका लीं। धीरे से कहा—“पर मेहनत करने वाला आदमी डूबता नही निकल ही आता है !”
डब्बू ने तुरंत जवाब दिया—“साहब, कामकाजी व्यक्ति केवल अपनी मेहनत से ही नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक संरचना की असमानता से भी प्रभावित होता है।”
नागर चुप हो गए।
“आजकल वह चमन सेठ पर निर्भर है,” डब्बू बोला।
“ कौन है यह ?”
“ गांव का सबसे बड़ा महाजन ब्याज पर पैसा देता है ...और बदले में जमीन निगल जाता है।”
“और वह शोषण करता है?” नागर ने पूछा।
डब्बू ने गंभीर होकर कहा—“साहब… निर्भरता कर्ज़ के स्वाभाविक अंजाम के रूप में सामने आती है। निर्भर व्यक्ति न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सामाजिक और नैतिक रूप से भी शक्तिहीन हो जाता है। वह अन्याय को पहचानता तो है, किंतु उसके विरुद्ध खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाता। यह उसकी कमजोरी नहीं, सामाजिक व्यवस्था की देन है।”
डब्बू रुका नहीं—“कर्ज़ केवल पैसे की वापसी तक सीमित नहीं रहता… वह आदमी के श्रम, समय और आत्मसम्मान तक फैल जाता है। कर्ज़ लेने वाला धीरे-धीरे यह मान लेता है कि उसका जीवन अब उसके फैसलों का नहीं, दूसरों के आदेशों का पालन करने के लिए है… यही निर्भरता शोषण को जन्म देती है।”
नागर ने गहरी साँस ली।
“तुम्हें ये सब कैसे पता?”
डब्बू मुस्कुराया— “मैं भी किसान का बेटा हूँ साहब… फर्क बस इतना है कि मैं शहर भाग आया।”
नागर अब और नहीं रुक सके। वे उठे और सीधे बिसुन के पास पहुँचे।
“बिसुन!” उन्होंने कंधा झकझोरा।
बिसुन चौंककर उठा—“जी… साहब!”
“कहाँ खो जाते हो तुम?”
बिसुन ने नजरें झुका लीं—“बस… हिसाब लगा रहा था।”
“किसका?”
बिसुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—“कर्ज़ का…”
वह वाक्य इतना वेधक था कि , नागर उसके सामने बैठ गए—“बताओ… कितना कर्ज़ है?”
बिसुन कुछ देर चुप रहा… फिर बोला—“साहब… कर्ज़ का बोझ सिर पर नहीं, साँसों पर होता है, इसलिए उतारने से पहले ही आदमी थक जाता है।”
नागर स्तब्ध रह गए।लगा भीतर कुछ टूट गया ।
“ इतना डर लगता है ?”
“ डर नहीं साहब उसकी तो आदत हो गई है !” बिसुन की आवाज़ काँप रही थी,“कभी-कभी लगता है… भाग जाऊँ या खुद को खत्म कर दू…” ।
“फिर?” नागर ने पूछा।
“फिर माँ की खाँसी सुनाई देती है… बच्चों की भूख दिखती है… और मैं वापस जीने लगता हूँ… मरते हुए।”
उस दिन नागर देर तक सो नहीं सके। उन्होंने योजनाएँ देखीं, नियम पढ़े… और एक रास्ता खोजा।
कुछ दिनों बाद वे बोले , “बिसुन, तुम्हारे लिए सहकारी बैंक से लोन पास हो सकता है।“
बिसुन की आँखें फैल गईं—“सच साहब?”
“हाँ… लेकिन अब किसी महाजन के पास नहीं जाओगे।”
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महीनों बाद…
बिसुन बदल चुका था। अब वह गुमसुम नहीं रहता था। काम में मन लगाता, समय पर जवाब देता।एक दिन उसने कहा—“साहब… कर्ज़ अभी भी है… लेकिन अब डर नहीं है।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब मैं आदेश नहीं… निर्णय लेता हूँ।”
शाम की लालिमा दफ्तर की दीवारों पर फैल रही थी। बिसुन बाहर खड़ा आसमान देख रहा था।
डब्बू पास आया—“आज फिर खो गए?”
बिसुन मुस्कुराया—“नहीं… आज खुद को पा लिया है। कर्ज़ केवल आर्थिक नहीं होता…यह मन, आत्मा और जीवन पर चढ़ी हुई एक परत है।लेकिन जब आदमी उस परत को पहचान लेता हैतो वह उसे हटाने की शुरुआत कर देता है।“
“और तब…? “
‘कर्ज़ नहीं…मनुष्य जीतता है।‘
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